संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 137, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१२६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३४ यो गां पयस्विनीं विष्णोः कपिलां सम्प्रयच्छति । जो विष्णुकी आराधना करके उनके लिये दुधार कपिला आराध्य तमथाग्रे तु यत्किंचिद्दुग्धमुत्तमम् ॥ ४२ गौ दान करता है और उन भगवान् नृसिंहके समक्ष तद्दत्त्वा नरसिंहाय विष्णुलोके महीयते । उसका उत्तम दूध थोड़ा-सा भी अर्पण करता है, वह पितरस्तस्य मोदन्ते श्वेतद्वीपे चिरं नृप ॥ ४३ विष्णुलोकमें सम्मानित होता है तथा राजन्! उसके एवं यः पूजयेद्राजन् नरसिंहं नरोत्तमः । पितर चिरकालतक श्वेतद्वीपमें आनन्द भोगते हैं। भूपाल! तस्य स्वर्गापवर्गौ तु भवतो नात्र संशयः ॥ ४४ इस प्रकार जो नरश्रेष्ठ नरसिंहस्वरूप भगवान् विष्णुका यत्रैवं पूज्यते विष्णुर्नरसिंहो नरैर्नृप । पूजन करता है, उसे स्वर्ग और मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते न तत्र व्याधिदुर्भिक्षराजचौरादिकं भयम् ॥ ४५ हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ४०-४४ ॥ नरसिंहं समाराध्य विधिनानेन माधवम् । नृप! जहाँ मनुष्योंद्वारा इस प्रकार भगवान् नरसिंहका पूजन नानास्वर्गसुखं भुक्त्वा न भूयः स्तनपो भवेत् ॥ ४६ होता है, वहाँ रोग, अकाल और राजा तथा चोर आदिका भय नित्यं सर्पिस्तिलैर्होमो ग्रामे यस्मिन् प्रवर्तते । नहीं होता। इस विधिसे लक्ष्मीपति नरसिंहकी आराधना करके न भवेत्तस्य ग्रामस्य भयं वा तत्र कुत्रचित् ॥ ४७ मनुष्य नाना प्रकारके स्वर्ग-सुख भोगता है और पुनः उसे अनावृष्टिर्महामारी दोषा नो दाहका नृप । [संसारमें जन्म लेकर] माताका दूध नहीं पीना पड़ता [वह नरसिंहं समाराध्य ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ॥ ४८ मुक्त हो जाता है]। जिस गाँवमें [भगवान्के मन्दिरके निकट] कारयेल्लक्षहोमं तु ग्रामे यत्र पुराधिपः । प्रतिदिन घी और तिलसे होम होता है, उस गाँवमें अनावृष्टि, कृते तस्मिन्मयोक्ते तु आगच्छति न तद्भयम् ॥ ४९ महामारी आदि दोष तथा अग्निदाह आदि किसी प्रकारका भय दृष्टोपसर्गमरणं प्रजानामात्मनश्च हि । नहीं होता। जिस गाँवमें गाँवका मालिक वेदवेत्ता ब्राह्मणोंद्वारा सम्यगाराधनीयं तु नरसिंहस्य मन्दिरे ॥ ५० नरसिंहकी आराधना कराकर एक लक्ष होम कराता है, वहाँ शङ्करायतने चापि कोटिहोमं नराधिप । मेरे कथनानुसार यह कार्य सम्पन्न होनेपर महामारी कारयेत् संयतैर्विप्रैः सभोजनसदक्षिणैः ॥ ५१ आदि प्रत्यक्ष उपद्रवसे कर्ताका तथा उस गाँवमें रहनेवाली कृते तस्मिन्नृपश्रेष्ठ नरसिंहप्रसादतः । प्रजाका अकालमरण नहीं होता। इसलिये भगवान् नरसिंहके उपसर्गादिमरणं प्रजानामुपशाम्यति ॥ ५२ मन्दिरमें भली प्रकारसे आराधना करनी चाहिये ॥ ४५-५० ॥ दुःस्वप्नदर्शने घोरे ग्रहपीडासु चात्मनः । नरेश! इसी प्रकार शङ्करजीके मन्दिरमें भी संयमशील होमं च भोजनं चैव तस्य दोषः प्रणश्यति ॥ ५३ ब्राह्मणोंके द्वारा उन्हें भोजन और दक्षिणा देकर एक अयने विषुवे चैव चन्द्रसूर्यग्रहे तथा । करोड़की संख्यामें हवन कराना चाहिये। नृपश्रेष्ठ ! उसके नरसिंहं समाराध्य लक्षहोमं तु कारयेत् ॥ ५४ करनेपर भगवान् नरसिंहके प्रसादसे प्रजावर्गका आकस्मिक शान्तिर्भवति राजेन्द्र तस्य तत्स्थानवासिनाम् । उपद्रव तथा मृत्युभय शान्त हो जाता है। घोर दुःस्वप्न एवमादिफलोपेतं नरसिंहार्चनं नृप ॥ ५५ देखनेपर और अपने ऊपर ग्रहजन्य कष्ट आनेपर होम कुरु त्वं भूपतेः पुत्र यदि वाञ्छसि सद्गतिम् । और ब्राह्मणभोजन करानेसे उसका दोष मिट जाता है। अतः परतरं नास्ति स्वर्गमोक्षफलप्रदम् ॥ ५६ दक्षिणायन या उत्तरायण आरम्भ होनेपर, विषुवकालमें*, अथवा चन्द्रमा तथा सूर्यका ग्रहण होनेपर भगवान् नरसिंहकी आराधना करके लक्षहोम कराना चाहिये। राजेन्द्र ! यों करनेसे उस स्थानके निवासियोंके विघ्नकी शान्ति हो जाती है। नरेश्वर ! भगवान् नरसिंहकी पूजाके ऐसे अनेकों फल हैं। भूपालनन्दन ! यदि तुम सद्गति चाहते हो तो नृसिंहका पूजन करो। इससे बढ़कर कोई भी कार्य ऐसा नहीं है, जो स्वर्ग और मोक्षरूप फल देनेवाला हो ।
- जिस दिन दिन-रात बराबर हों, वह विषुवकाल कहा गया है। ऐसा समय सालमें दो बार आता है। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth