संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३४ ] भगवान् विष्णुके पूजनका फल १२५ घृतेन वाथ तैलेन दीपं प्रज्वालयेन्नरः । | है। जो मनुष्य विधिपूर्वक भक्तिके साथ घी अथवा तेलसे विष्णवे विधिवद्भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ २७ | भगवान् विष्णुके लिये दीप प्रज्वलित करता है, उस विहाय पापकलिलं सहस्रादित्यसप्रभः । | पुण्यका फल सुनिये। वह पाप-पङ्कसे मुक्त होकर हजारों ज्योतिष्मता विमानेन विष्णुलोकं स गच्छति ॥ २८ | सूर्यके समान कान्ति धारणकर ज्योतिर्मय विमानसे हविः शाल्योदनं विद्वानाज्ययुक्तं सशर्करम् । | विष्णुलोकको जाता है। जो विद्वान् हविष्य, घी-शक्करसे निवेद्य नरसिंहाय यावकं पायसं तथा ॥ २९ | युक्त अगहनीका चावल, जौकी लपसी और खीर भगवान् समास्तन्दुलसंख्याया यावतीस्तावतीर्नृप । | नरसिंहको निवेदन करता है, वह वैष्णव चावलोंकी विष्णुलोके महाभोगान् भुञ्जन्त्रास्ते स वैष्णवः ॥ ३० | संख्याके बराबर वर्षोतक विष्णुलोकमें महान् भोगोंका बलिना वैष्णवेनाथ तृप्ताः सन्तो दिवौकसः । | उपभोग करता है। भगवान् विष्णुसम्बन्धी बलिसे सम्पूर्ण शान्तिं तस्य प्रयच्छन्ति श्रियमरोग्यमेव च ॥ ३१ | देवता तृप्त होकर पूजा करनेवालेको शान्ति, लक्ष्मी तथा प्रदक्षिणेन चैकेन देवदेवस्य भक्तितः । | आरोग्य प्रदान करते हैं ॥ २४-३१ ॥ कृतेन यत्फलं नृणां तच्छृणुष्व नृपात्मज ॥ ३२ | राजकुमार! भक्तिपूर्वक देवदेव विष्णुकी एक बार पृथ्वीप्रदक्षिणफलं प्राप्य विष्णुपुरे वसेत् । | प्रदक्षिणा करनेसे मनुष्योंको जो फल मिलता है, उसे नमस्कारः कृतो येन भक्त्या वै माधवस्य च ॥ ३३ | सुनिये। वह सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करनेका फल प्राप्त धर्मार्थकाममोक्षाख्यं फलं तेनासमञ्जसा । | करके वैकुण्ठधाममें निवास करता है। जिसने कभी स्तोत्रैर्जपैश्च देवाग्रे यः स्तौति मधुसूदनम् ॥ ३४ | भक्तिभावसे भगवान् लक्ष्मीपतिको नमस्कार किया है, सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते । | उसने अनायास ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप फल गीतवाद्यादिकं नाट्यं शङ्खतूर्यादिनिःस्वनैः ॥ ३५ | प्राप्त कर लिया। जो स्तोत्र और जपके द्वारा मधुसूदनकी यः कारयति वै विष्णोः स याति मन्दिरं नरः । | उनके समक्ष होकर स्तुति करता है, वह समस्त पापोंसे पर्वकाले विशेषेण कामगः कामरूपवान् ॥ ३६ | मुक्त होकर विष्णुलोकमें पूजित होता है। जो भगवान्के सुसंगीतविदैश्चैव सेव्यमानोऽप्सरोगणैः । | मन्दिरमें शङ्ख, तुरही आदि बाजोंके शब्दसे युक्त गाना- महार्हमणिचित्रेण विमानेन विराजता ॥ ३७ | बजाना और नाटक कराता है, वह मनुष्य विष्णुधामको स्वर्गात् स्वर्गमनुप्राप्य विष्णुलोके महीयते । | प्राप्त होता है। विशेषतः पर्वके समय उक्त उत्सव करनेसे ध्वजं तु विष्णवे यस्तु गरुडेन समन्वितम् ॥ ३८ | मनुष्य कामरूप होकर सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त होता है दद्यात्सोऽपि ध्वजाकीर्णाविमानेन विराजता । | और सुन्दर संगीत जाननेवाली अप्सराओंसे शोभायमान विष्णुलोकमवाप्नोति सेव्यमानोऽप्सरोगणैः ॥ ३९ | बहुमूल्य मणियोंसे जड़े हुए देदीप्यमान विमानके द्वारा सुवर्णाभरणैर्दिव्यैर्हारकेयूरकुण्डलैः । | एक स्वर्गसे दूसरे स्वर्गको प्राप्त होकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित मुकुटाभरणाद्यैश्च यो विष्णुं पूजयेन्नृप ॥ ४० | होता है। जो भगवान् विष्णुके लिये गरुडचिह्नसे युक्त सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वभूषणभूषितः । | ध्वजा अर्पण करता है, वह भी ध्वजामण्डित जगमगाते इन्द्रलोके वसेद्धीमान् यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥ ४१ | हुए विमानपर आरूढ़ हो, अप्सराओंसे सेवित होकर | विष्णुलोकको प्राप्त होता है ॥ ३२-३९ ॥ | नरेश्वर! जो सुवर्णके बने हुए दिव्य हार, केयूर, कुण्डल | और मुकुट आदि आभूषणोंसे भगवान् विष्णुकी पूजा करता | है, वह बुद्धिमान् सब पापोंसे मुक्त और सब आभूषणोंसे | भूषित होकर जबतक चौदह इन्द्र राज्य करते हैं, तबतक | (अर्थात् पूरे एक कल्पतक) इन्द्रलोकमें निवास करता है। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth