भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 318 में से

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पृष्ठ 160

अध्याय ४२ ] प्रह्लादपर हिरण्यकशिपुका कोप और प्रह्लादका वध करनेके लिये प्रयत्न १४९ प्रायेण कौमारमवाप्य लोकः | हुए। संसारके अन्य लोग कौमार अवस्थाको पाकर पुष्णाति नास्तिक्यमसद्रतिं च। | प्रायः नास्तिक विचार और बुरे आचार-व्यवहारके पोषक तस्मिन् वयःस्थस्य बहिर्विरक्ति- | बन जाते हैं, परंतु उसी उम्रमें प्रह्लादको बाह्य विषयोंसे र्भवत्यभूच्चित्रमजे च भक्तिः॥ २ | वैराग्य हुआ और भगवान्‌में उनकी भक्ति हो गयी—यह | अद्भुत बात है। तदनन्तर जब प्रह्लादने गुरुके यहाँ अपनी अथ सम्पूर्णविद्यं तं कदाचिद्दितिजेश्वरः। | पढ़ाई समाप्त कर ली, तब एक दिन दैत्यराजने उन्हें अपने आनाय्य प्रणतं प्राह प्रह्लादं विदितेश्वरम्॥ ३ | पास बुलवाया और ईश्वर-तत्त्वके ज्ञाता प्रह्लादको अपने | सामने प्रणाम करके खड़े देख उनसे कहा— ॥ १-३॥ साध्वज्ञाननिधेर्बाल्यान्मुक्तोऽसि सुरसूदन। | सुरसूदन ! तुम अज्ञानकी निधिरूपा बाल्यावस्थासे मुक्त इदानीं भ्राजसे भास्वान् नीहारादिव निर्गतः ॥ ४ | हो गये—यह बहुत अच्छा हुआ। इस समय तुम कुहिरेसे | निकले हुए सूर्यकी भाँति अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे हो। बाल्ये वयं च त्वमिव द्विजैर्जाड्याय मोहिताः । | पुत्र ! बचपनमें तुम्हारी ही तरह हमें भी जडबुद्धि सिखानेके वयसा वर्धमानेन पुत्रकैवं सुशिक्षिताः ॥ ५ | लिये ब्राह्मणोंने मोहित कर रखा था; किंतु अवस्था बढ़नेपर | जब हम समझदार हुए, तब इस प्रकार अपने कुलके अनुरूप तदद्य त्वयि धुर्येऽहं संसकण्टकताधुरम्। | सुन्दर शिक्षा ग्रहण कर सके थे। अतः शत्रुरूपी काँटोंसे युक्त विन्यस्य स्वां चिरधृतां सुखी पश्यन् श्रियं तव ॥ ६ | इस राज्य-शासनके भारको, जिसे मैंने बहुत दिनोंसे धारण कर | रखा है, अब तुझ सामर्थ्यवान् पुत्रपर रखकर मैं तुम्हारी राज्य- यदा यदा हि नैपुण्यं पिता पुत्रस्य पश्यति । | लक्ष्मीको देखते हुए सुखी होना चाहता हूँ। पिता जब-जब तदा तदाऽऽधिं त्यक्त्वा नु महत्सौख्यमवाप्नुयात् ॥ ७ | अपने पुत्रकी निपुणता देखता है, तब-तब अपनी मानसिक | चिन्ता त्यागकर महान् सुखका अनुभव करता है। तुम्हारे गुरुने गुरुश्चातीव नैपुण्यं ममाग्रेऽवर्णयत्तव । | भी मेरे समक्ष तुम्हारी योग्यताका बड़ा बखान किया है। यह न चित्रं पुत्र तच्छ्रोतुं किं नु मे वाञ्छतः श्रुती ॥ ८ | तुम्हारे लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। आज मेरे कान तुम्हारी | कुछ बातें सुनना चाहते हैं। नेत्रोंके सामने शत्रु की दरिद्रता नेत्रयोः शत्रुदारिद्र्यं श्रोत्रयोः सुतसूक्तयः । | देखना, कानोंमें पुत्रकी सुन्दर वाणीका पड़ना और अङ्गोंमें युद्धव्रणं च गात्रेषु मायिनां च महोत्सवः॥ ९ | युद्धके आघातसे घाव होना—यह सब ऐश्वर्यवान् वीरों अथवा | मायावी दैत्योंके लिये महान् उत्सवके समान है ॥ ४-९॥ श्रुत्वेति निकृतिप्रज्ञं दैत्याधिपवचस्ततः। | उस समय दैत्यराजके ये शठतापूर्ण वचन सुनकर जगाद योगी निश्शङ्कं प्रह्लादः प्रणतो गुरुम् ॥ १० | योगी प्रह्लादने पिताको प्रणाम करके निर्भीकतापूर्वक | कहा— ॥ १०॥ सूक्तयः श्रोत्रयोः सत्यं महाराज महोत्सवः। | 'महाराज! आपका यह कथन सत्य है कि अच्छी किंतु ता वैष्णवीर्वाचो मुक्त्वा नान्या विचारयेत् ॥ ११ | बातें सुनना कानोंके लिये महान् उत्सवके समान है; किंतु | वे बातें भगवान् विष्णुसे सम्बन्ध रखनेवाली हों, तभी ऐसा नीतिःसूक्तिःकथाःश्राव्याःश्राव्यं काव्यं च तद्वचः। | होता है। उनको छोड़कर दूसरी बातें सुननेका विचार भी यत्र संसृतिदुःखौघकक्षाग्निर्गोयिते हरिः॥ १२ | नहीं करना चाहिये। जो संसारके दुःखसमुदायरूपी तृणोंको | भस्म करनेके लिये अग्निके समान हैं, उन भगवान् विष्णुका | जिसमें गुणगान किया जाता हो, वही वचन नीतियुक्त है, | वही सूक्ति (सुन्दर वाक्य) है, वही सुनने योग्य कथा