संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 162, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४२ ] प्रह्लादपर हिरण्यकशिपुका कोप और प्रह्लादका वध करनेके लिये प्रयत्न १५१ वैष्णवं बलमालोक्य राजा नूनं भयं दधौ। वैष्णवोंका बल देखकर राजा हिरण्यकशिपुको अवश्य पुनस्तस्य वधोपायं चिन्तयन् स सुदुर्मतिः॥ २७ ही महान् भय हुआ; किंतु उस दुर्बुद्धिने पुनः प्रह्लादके समादिशत् समाहूय दंदशूकान् सुदुर्विषान्। वधका उपाय सोचते हुए, अत्यन्त भयंकर विषवाले अशस्त्रवधयोग्योऽयमस्मयो हरितोषकृत्॥ २८ सर्पोंको बुलाकर उन्हें आदेश दिया—'गरलायुधो*! तर द् भवद्भिरचिराद् हन्यतां गरलायुधाः। विष्णुको संतुष्ट करनेवाला यह निश्शङ्क बालक किसी हि. ण्यकशिपोः श्रुत्वा वचनं ते भुजंगमाः। शस्त्रसे नहीं मारा जा सकता; अतः तुम सभी मिलकर तस्याज्ञां जगृहुर्मूर्ध्ना प्रहर्षार्दिशवर्तिनः॥ २९ इसे अति शीघ्र मार डालो।' हिरण्यकशिपुकी यह बात अथ ज्वलद्दशनकरालदंष्ट्रिण सुनकर उसकी आज्ञा माननेवाले सभी सर्पोंने उसके स्फुटस्फुरद्दशनसहस्रभीषणाः । आदेशको हर्षपूर्वक शिरोधार्य किया॥ २७-२९॥ अकर्णका हरिमहिस्वकर्णका तदनन्तर जिनके दाँत विषसे जल रहे हैं तथा जिनकी हरिप्रियं द्रुततरमापतन्नुषा॥ ३० दाढ़ें विकराल हैं, जो स्फुट दिखायी देनेवाले हजारों गरायुधास्त्वचमपि भेत्तुमल्पिकां चमकीले दाँतोंके कारण भयानक जान पड़ते हैं, ऐसे वपुष्यजस्मृतिबलदुर्भिदाकृतेः । सर्पगण क्रोधसे फुफकारते हुए बड़े वेगसे उस हरिभक्तके अलं न ते हरिवपुषं तु केवलं ऊपर टूट पड़े। भगवान्के स्मरणके बलसे जिनका आकार विदश्य तं निजदशनैर्विना कृताः॥ ३१ दुर्भेद्य हो गया था, उन प्रह्लादजीके शरीरका थोड़ा-सा ततः स्रवत्क्षतजविषण्णमूर्तयो चमड़ा भी काटनेमें वे विषधर सर्प समर्थ न हो सके। द्विधाकृताद्भुतदशनां भुजंगमाः। इतना ही नहीं, जिनका शरीर भगवन्मय हो गया था, उन समेत्य ते दितिजपतिं व्यजिज्ञपन् प्रह्लादजीको केवल डँसनेमात्रसे वे सर्प अपने सारे दाँत विनिःश्वसत्प्रचलफणा भुजंगमाः॥ ३२ खो बैठे। तदनन्तर रक्तकी धारा बहनेसे जिनका आकार प्रभो महीध्रानपि भस्मशेषां- विषादग्रस्त हो रहा है, जिनके अद्भुत दाँतोंके दो-दो टुकड़े स्तस्मिन्नशक्तास्तु तदैव वध्याः। हो गये हैं तथा बार-बार उच्छ्वास लेनेके कारण जिनके महानुभावस्य तवात्मजस्य फन चञ्चल हो रहे हैं, उन भुजंगमोंने परस्पर मिलकर वधे नियुक्त्वा दशनैर्विना कृताः॥ ३३ दैत्यराज हिरण्यकशिपुको सूचित किया—॥ ३०-३२॥ इत्थं द्विजिह्वाः कठिनं निवेद्य 'प्रभो! हम पर्वतोंको भी भस्म करनेमें समर्थ हैं, यदि ययुर्विसृष्टाः प्रभुणाकृतार्थाः। उनमें हमारी शक्ति न चले तो आप तत्काल हमारा वध विचिन्तयन्तः पृथुविस्मयेन कर सकते हैं। परंतु आपके महानुभाव पुत्रका वध करनेमें प्रह्लादसामर्थ्यनिदानमेव ॥ ३४ लगाये जाकर तो हम अपने दाँतोंसे भी हाथ धो बैठे!' इस मार्कण्डेय उवाच प्रकार बड़ी कठिनाईसे निवेदन करके स्वामी हिरण्यकशिपुके अथासुरेशः सचिवैर्विचार्य आदेश देनेपर भी अपने कार्यमें असफल हुए वे सर्प निश्चित्य सूनुं तमदण्डसाध्यम्। अत्यन्त आश्चर्यके साथ प्रह्लादके अद्भुत सामर्थ्यका क्या आहूय साम्ना प्रणतं जगाद कारण है, इसका विचार करते हुए चले गये॥ ३३-३४॥ वाक्यं सदा निर्मलपुण्यचित्तम्। मार्कण्डेयजी कहते हैं—इसके बाद असुरराज प्रह्लाद दुष्टोऽपि निजाङ्गजातो हिरण्यकशिपुने मन्त्रियोंके साथ विचारकर अपने पुत्रको न वध्य इत्यद्य कृपा ममाभूत्॥ ३५ दण्डसे अजेय मानकर उसे शान्तिपूर्वक अपने पास बुलाया और जब वह आकर प्रणाम करके खड़ा हो गया, तब उस निर्मल एवं पवित्र हृदयवाले अपने पुत्रसे कहा—'प्रह्लाद! अपने शरीरसे यदि दुष्ट पुत्र भी उत्पन्न हो जाय तो वह वधके योग्य नहीं है, यह सोचकर अब तुझपर मुझे दया आ गयी है'॥ ३५॥
- विष ही जिनका शस्त्र है, उन्हें 'गरलायुध' (सर्प) कहा है। In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth