संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 163, कुल 318 में से
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१५२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३ ततस्तूर्णं समागत्य दैत्यराजपुरोहिताः । तत्पश्चात् तुरंत ही वहाँ दैत्यराजके पुरोहित आये। मूढाः प्राञ्जलयः प्राहुर्द्विजाः शास्त्रविशारदाः ॥ ३६ शास्त्रविशारद होनेपर भी वे मूढ ही रह गये थे। उन ब्राह्मणोंने हाथ जोड़कर कहा— 'देव ! तुम्हारी युद्धविषयक त्रैलोक्यं कम्पते देव भृशं त्वय्यभिकाङ्क्षिणि । इच्छा होते ही सारा त्रिभुवन थरथर काँपने लगता है। प्रह्लादस्त्वां न जानाति क्रुद्धं स्वल्पो महाबलम् ॥ ३७ यह अल्प बलवाला प्रह्लाद कुपित हुए आप महान् बलशालीको नहीं जानता। अतः देव ! आपको क्रोधका परित्याग करके इसपर दया करनी चाहिये; क्योंकि पुत्र तदलं देव रोषेण दयां कर्तुं त्वमर्हसि । भले ही कुपुत्र हो जाय, परंतु माता-पिता कभी कुमाता पुत्रः कुपुत्रतामेति न मातापितरौ कदा ॥ ३८ अथवा कुपिता नहीं होते' ॥ ३६-३८ ॥ दैत्यराजके पुरोहितोंने उस दुर्बुद्धि दैत्य हिरण्यकशिपुसे उक्त्वेति कुटिलप्रज्ञं दैत्यं दैत्यपुरोहिताः । यों कहकर उसकी आज्ञासे प्रह्लादको साथ लेकर अपने आदाय तदनुज्ञातं प्रह्लादं धीधनं ययुः ॥ ३९ भवनको चले गये ॥ ३९ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे नरसिंहप्रादुर्भावे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'नरसिंहावतारविषयक' बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥ तैंतालीसवाँ अध्याय प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना; हिरण्यकशिपुकी आज्ञासे प्रह्लादका समुद्रमें डाला जाना तथा वहीं उन्हें भगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन होना मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले— तदनन्तर सकल शास्त्रोंके अथ स गुरुगृहेऽपि वर्तमानः ज्ञाता प्रह्लादजी गुरुके घरमें रहकर भी अपने पवित्र सकलविदच्युतसक्तपुण्यचेताः । मनको भगवान् विष्णुमें लगाये रहनेके कारण सम्पूर्ण जड इव विचचार बाह्यकृत्ये जगत्को नारायणका स्वरूप समझकर बाह्य-लौकिक सततमनान्तमयं जगत्प्रपश्यन् ॥ १ कर्मोंमें जडकी भाँति व्यवहार करते हुए विचरते थे। सहगुरुकुलवासिनः कदाचि- एक दिन, उनके साथ ही गुरुकुलमें निवास करनेवाले च्छुतिविरता ह्यवदन् समेत्य बालाः । छात्र-बालक पाठ-श्रवण बंद करके, एकत्र हो, प्रह्लादसे तव चरितमहो विचित्रमेतत् कहने लगे— 'राजकुमार ! अहो ! आपका चरित्र बड़ा ही क्षितिपत्तिपुत्र यतोऽस्य भोगलुब्धः । विचित्र है; क्योंकि आपने विषय-भोगोंका लोभ त्याग हृदि किमपि विचिन्त्य हृष्टरोमा दिया है। प्रिय ! आप अपने हृदयमें किसी अनिर्वचनीय भवसि सदा च वदाङ्ग यद्यगुह्यम् ॥ २ वस्तुका चिन्तन करके सदा पुलकित रहते हैं। यदि वह वस्तु छिपानेयोग्य न हो तो हमें भी बताइये' ॥ १-२॥ इति गदितवतः स मन्त्रिपुत्रा- नृप ! प्रह्लादजी सबपर स्नेह करनेवाले थे, अतः इस नवददिदं नृप सर्ववत्सलत्वात् । प्रकार पूछते हुए मन्त्रिकुमारोंसे वे यों बोले— “हे दैत्यपुत्रो! शृणुत सुमनसः सुरारिपुत्रा एकमात्र भगवान्में अनुराग रखनेवाला मैं तुम्हारे पूछनेपर यदहमनन्यरतिर्वदामि पृष्टः ॥ ३ जो कुछ भी बता रहा हूँ, उसे तुमलोग प्रसन्नचित्त होकर In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth