भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 318 में से

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पृष्ठ 164

अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५३ धनजनतरुणीविलासरम्यो | सुनो। यह जो धन, जन और स्त्री-विलास आदिसे भवविभवः किल भाति यस्तमेनम्। | अत्यन्त रमणीय प्रतीत होनेवाला सांसारिक वैभव दृष्टिगोचर विमृशत सुबुधैरुतैष सेव्यो | हो रहा है, इसपर विचार करो। क्या यह लोक-वैभव द्रुतमथ वा परिवर्ज्य एव दूरात् ॥ ४ | विद्वानोंके सेवन करने योग्य है या जल्दी-जल्दी दूरसे ही | त्याग देनेयोग्य? अहो! जिनके अङ्ग गर्भाशयमें टेढ़े-मेढ़े प्रथममिह विचार्यतां यदम्बा- | पड़े हैं, जो जठरानलकी ज्वालासे संतप्त हो रहे हैं तथा जठरगतैरनुभूयते सुदुःखम्। | जिन्हें अपने अनेक पूर्वजन्मोंका स्मरण हो रहा है, वे सुकुटिलतनुभिस्तदग्नितप्तै- | माताके गर्भमें पड़े हुए जीव जिस महान् कष्टका अनुभव र्विविधपुराजन्मनानि संस्मरद्भिः॥ ५ | करते हैं, पहले उसपर तो विचार करो ॥ ३-५॥ कारागृहे दस्युरिवास्मि बद्धो | 'गर्भमें पड़ा हुआ दुःखी जीव कहता है— 'हाय! जरायुणा विट्कृमिमूत्रगेहे। | कारागारमें बँधे हुए चोरकी भाँति मैं विष्ठा, कृमियों और पश्यामि गर्भेऽपि सकृन्मुकुन्द- | मूत्रसे भरे हुए इस [देहरूपी] घरमें जरायु (झिल्ली)- पादाब्जयोरस्मरणेन कष्टम्॥ ६ | से बँधा पड़ा हूँ। मैंने जो एक बार भी भगवान् मुकुन्दके | चरणारविन्दोंका स्मरण नहीं किया, उसीके कारण तस्मात्सुखं गर्भशयस्य नास्ति | होनेवाले कष्टको आज मैं इस गर्भमें भोग रहा हूँ।' अतः बाल्ये तथा यौवनवार्द्धके वा। | गर्भमें सोनेवाले जीवको बचपन, जवानी और बुढ़ापेमें भी एवं भवो दुःखमयः सदैव | सुख नहीं है। दैत्यकुमारो! जब इस प्रकार यह संसार सेव्यः कथं दैत्यसुताः प्रबुद्धैः। | सदा दुःखमय है, तब विज्ञ पुरुष इसका सेवन कैसे कर एवं भवेऽस्मिन् परिमृग्यमाणा | सकते हैं ? इस तरह इस संसारमें ढूँढ़नेपर हमें सुखका वीक्षामहे नैव सुखांशलेशम्॥ ७ | लेशमात्र भी दिखायी नहीं देता। हम जैसे-जैसे इसपर | ठीक विचार करते हैं, वैसे-ही-वैसे इस जगत्को यथा यथा साधु विचारयाम- | अत्यन्त दुःखमय समझते हैं। इसलिये ऊपरसे सुन्दर स्तथा तथा दुःखतरं च विद्मः। | दिखायी देनेवाले इस दुःखपूर्ण संसारमें साधु पुरुष तस्माद्बवेऽस्मिन् किल चारुरूपे | आसक्त नहीं होते। जो तत्त्वज्ञानसे रहित अत्यन्त मूढ़ दुःखाकरे नैव पतन्ति सन्तः॥ ८ | लोग हैं, वे ही देखनेमें सुन्दर दीपकपर गिरकर नष्ट | होनेवाले पतंगोंकी भाँति सांसारिक भोगोंमें आसक्त होते पतन्त्यथोऽतत्त्वविदः सुमूढा | हैं। यदि सुखके लिये कोई दूसरा सहारा न होता, तब वह्नौ पतंगा इव दर्शनीये। | तो सुखमय-से प्रतीत होनेवाले इस जगत्में आसक्त यद्यस्ति नान्यच्छरणं सुखाय | होना उचित था—जैसे अन्न न पानेके कारण जो अत्यन्त युक्तं तदैतत्पतनं सुखाभे॥ ९ | दुबले हो रहे हैं, उनके लिये खली-भूसी आदि खा | लेना ठीक हो सकता है; परंतु भगवान् लक्ष्मीपतिके अविन्दतामन्नमहो कृशानां | युगल चरणारविन्दोंकी सेवासे प्राप्त होनेवाला आदि, युक्तं हि पिण्याकतुषादिभक्षणम्। | अविनाशी, अजन्मा एवं नित्य सुख (परमात्मा) तो अस्ति त्वजं श्रीपतिपादपद्म- | है ही, फिर इस क्षणिक संसारका आश्रय क्यों लिया द्वन्द्वार्चनप्राप्यमनन्तमाद्यम् ॥१० | जाय ? ॥ ६-१०॥