भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 318 में से

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पृष्ठ 165

१५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३ अक्लेशतः प्राप्यमिदं विसृज्य | ''जो बिना कष्टके ही प्राप्त होनेयोग्य इस महान् सुख महासुखं योऽन्यसुखानि वाञ्छेत्। | (परमेश्वर)-को त्यागकर अन्य तुच्छ सुखोंकी इच्छा राज्यं करस्थं स्वमसौ विसृज्य | करता है, वह दीनहृदय मूर्ख पुरुष मानो हाथमें आये हुए भिक्षामटेद्दीनमनाः सुमूढः॥ ११ | अपने राज्यको त्यागकर भीख माँगता है। भगवान् लक्ष्मीपतिके तच्चार्च्यते श्रीपतिपादपद्म- | युगल-चरणारविन्दोंका यथार्थ पूजन वस्त्र, धन और परिश्रमसे द्वन्द्वं न वस्त्रैर्न धनैः श्रमैर्न। | नहीं होता; किंतु मनुष्य यदि अनन्यचित्त होकर 'केशव', अनन्यचित्तेन नरेण किंतु | 'माधव' आदि भगवन्नामोंका उच्चारण करे तो वही उनकी उच्चार्यते केशव माधवेति॥ १२ | वास्तविक पूजा है। दैत्यकुमारो! इस प्रकार संसारको एवं भवं दुःखमयं विदित्वा | दुःखमय जानकर भगवान्का ही भलीभाँति भजन करो। दैत्यात्मजाः साधु हरिं भजध्वम्। | इस प्रकार करनेसे ही मनुष्यका जन्म सफल हो सकता एवं जनो जन्मफलं लभेत | है; नहीं तो (भगवद्भजन न करनेके कारण) अज्ञानी पुरुष नो चेद्भवब्धौ प्रपतेदधोऽधः॥ १३ | भवसागरमें ही नीचेसे और नीचे स्तरमें ही गिरता रहता तस्माद्भवेऽस्मिन् हृदि शङ्खचक्र- | है। इसलिये इस संसारमें समस्त कामनाओंसे रहित हो गदाधरं देवमनन्तमीड्यम्। | तुम सभी लोग अपने हृदयके भीतर विराजमान शङ्ख- स्मरन्तु नित्यं वरदं मुकुन्दं | चक्र-गदाधारी, वरदाता, अविनाशी स्तवनीय भगवान् सद्भक्तियोगेन निवृत्तकामाः॥ १४ | मुकुन्दका सच्चे भक्तिभावसे सदा चिन्तन करो। भवसागरमें अनास्तिकत्वात् कृपया भवद्द्व्यो | पड़े हुए दैत्यपुत्रो! तुम लोग नास्तिक नहीं हो, इसलिये वदामि गुह्यं भवसिन्धुसंस्थाः। | दयावश मैं तुमसे यह गोपनीय बात बतलाता हूँ-समस्त सर्वेषु भूतेषु च मित्रभावं | प्राणियोंके प्रति मित्रभाव रखो; क्योंकि सबके भीतर भजन्वयं सर्वगतो हि विष्णुः॥ १५ | भगवान् विष्णु ही विराजमान हैं''॥ ११-१५॥ दैत्यपुत्रा ऊचुः | दैत्यपुत्र बोले-महाबुद्धिमान् प्रह्लादजी! बचपनसे प्रह्लाद त्वं वयं चापि बालभावान्महामते। | लेकर आजतक आप और हम भी षण्डामर्कके सिवा षण्डामर्कात्परं मित्रं गुरुं चान्यं न विद्महे॥ १६ | दूसरे किसी गुरु तथा मित्रको नहीं जान सके। फिर त्वयैतच्छिक्षितं कुत्र तथ्यं नो वद निस्तुषम्। | आपने यह ज्ञान कहाँ सीखा? हमसे पर्दा न रखकर | सच्ची बात बताइये॥ १६ १/२॥ प्रह्लाद उवाच | प्रह्लादजी बोले-कहते हैं, जिस समय मेरे पिताजी यदा तातः प्रयातो मे तपोऽर्थं काननं महत्॥ १७ | तपस्या करनेके लिये महान् वनमें चले गये, उसी समय तदा चेन्द्रः समागत्य पुरं तस्य रुरोध ह। | इन्द्रने यहाँ आकर पिता दैत्यराज हिरण्यकशिपुको मरा मृतं विज्ञाय दैत्येन्द्रं हिरण्यकशिपुं तदा॥ १८ | हुआ समझकर उनके इस नगरको घेर लिया। इन्द्र इन्द्रो मे जननीं गृह्य प्रयातो मन्मथाग्निना। | कामाग्निसे पीड़ित हो मेरी महाभागा माताजीको पकड़कर दह्यमानो महाभागां मार्गे गच्छति सत्वरम्॥ १९ | यहाँसे चल दिये। वे मार्गमें बड़ी तेजीसे पैर बढ़ाते तदा मां गर्भंगं ज्ञात्वा नारदो देवदर्शनः। | हुए चले जा रहे थे। इसी समय देवदर्शन नारदजी मुझे आगत्येन्द्रं जगादोच्चैर्मूढ मुञ्च पतिव्रताम्॥ २० | माताके गर्भमें स्थित जान सहसा वहाँ पहुँचे और | चिल्लाकर इन्द्रसे बोले-'मूर्ख! इस पतिव्रताको छोड़ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth