भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 318 में से

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पृष्ठ 166

अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५५

अस्या गर्भे स्थितो योऽसौ स वै भागवतोत्तमः । तच्छ्रुत्वा नारदवचो मातरं प्रणिपत्य मे ॥ २१ विष्णुभक्त्या प्रमुच्याथ गतः स्वं भुवनं हरिः । नारदस्तां समानीय आश्रमं स्वं शुभव्रतः ॥ २२ मामुद्दिश्य महाभागामेतद्वै कथितं तदा । तथा मे विस्मृतं नैव बालाभ्यासाद्हनोः सुताः ॥ २३ विष्णोश्चानुग्रहेणैव नारदस्योपदेशतः । मार्कण्डेय उवाच एकदा गुप्तचर्यायां गतोऽसौ राक्षसाधिपः ॥ २४ शृणोति रात्रौ नगरे जय रामेति कीर्तनम् । अवैत्पुत्रकृतं सर्वं बलवान् दानवेश्वरः ॥ २५ अथाहूयाह दैत्येन्द्रः क्रोधान्धः स पुरोहितान् । रे रे क्षुद्रद्विजा यूयमतिमुमूर्षतां गताः ॥ २६ प्रह्लादोऽयं मृषालापान् वक्तव्यान्यान् पाठयत्यपि । इति निर्भर्त्स्य तान् विप्रान् श्वसन राजाविशद् गृहम् ॥ २७ न च पुत्रवधे चिन्तां जहौ स्ववधकारिणीम् । आसन्नमरणोऽमर्षात्कृत्यमेकं विमृश्य सः ॥ २८ अकृत्यमेव दैत्यादीनाहूयोपादिशद्रहः । अद्य क्षपायां प्रह्लादं प्रसुप्तं दुष्टमुल्बणैः ॥ २९ नागपाशैर्दृढं बद्ध्वा मध्ये निक्षिपताम्बुधेः । तदाज्ञां शिरसाऽऽदाय ददृशुस्तमुपेत्य ते ॥ ३० रात्रिप्रियं समाधिस्थं प्रबुद्धं सुप्तवत् स्थितम् । संछिन्नरागलोभादिमहाबन्धं क्षपाचराः ॥ ३१ बबन्धुस्तं महात्मानं फल्गुभिः सर्परज्जुभिः । गरुडध्वजभक्तं तं बद्ध्वाहिभिरबुद्धयः ॥ ३२ जलशायिप्रियं नीत्वा जलराशौ निचिक्षिपुः । बलिनस्तेऽचलान् दैत्या तस्योपरि निधाय च ॥ ३३ शशंसुस्तं प्रियं राज्ञे द्रुतं तान् सोऽप्यमानयत् ।

दो। इसके गर्भमें जो बालक है, वह भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ है।' नारदजीका कथन सुनकर इन्द्रने विष्णुभक्तिके कारण मेरी माताको प्रणाम करके छोड़ दिया और वे अपने लोकको चले गये। फिर शुभ सङ्कल्पवाले नारदजी मेरी माताको अपने आश्रममें ले आये और मेरे उद्देश्यसे मेरी महाभागा माताके प्रति इस पूर्वोक्त ज्ञानका वर्णन किया। दानवो! बाल्यकालके अभ्यास, भगवान्की कृपा तथा नारदजीका उपदेश होनेसे वह ज्ञान मुझे भूला नहीं है॥ १७-२३१/२ ॥ मार्कण्डेयजी बोले-एक दिन राक्षसराज हिरण्य- कशिपु रात्रिके समय गुप्तरूपसे नगरमें घूम रहा था। उस समय उसे 'जय राम' का कीर्तन सुनायी देने लगा। तब बलवान् दानवराजने यह सब अपने पुत्रकी ही करतूत समझी। तब उस दैत्यराजने क्रोधान्ध होकर पुरोहितोंको बुलाया और कहा-'नीच ब्राह्मणो! जान पड़ता है, तुमलोग मरनेके लिये अत्यधिक उत्सुक हो गये हो। तुम्हारे देखते-देखते यह प्रह्लाद स्वयं तो व्यर्थकी बातें बकता ही है, दूसरोंको भी यही सिखाता है।' इस प्रकार उन ब्राह्मणोंको फटकारकर राजा हिरण्यकशिपु लम्बी साँसें खींचता हुआ घरमें आया। उस समय भी वह पुत्रवधके विषयमें होनेवाली चिन्ताको, जो उसका ही नाश करनेवाली थी, नहीं छोड़ सका। उसकी मृत्यु निकट थी; अतः उसने अमर्षवश एक ऐसा काम सोचा, जो वास्तवमें न करने योग्य ही था। हिरण्यकशिपुने दैत्यादिकोंको बुलाया और उनसे एकान्तमें कहा-'देखो, आज रातमें प्रह्लाद जब गाढी नींदमें सो जाय, उस समय उस दुष्टको भयंकर नागपाशोंद्वारा खूब कसकर बाँध दो और बीच समुद्रमें फेंक आओ'॥ २४-२९१/२ ॥ उसकी आज्ञा शिरोधार्य करके उन दैत्योंने प्रह्लादजीके पास जाकर उन्हें देखा। वे रात्रिके ही प्रेमी थे (क्योंकि रातमें ही उन्हें ध्यान लगानेकी सुविधा रहती थी)। प्रह्लादजी समाधिमें स्थित होकर जाग रहे थे, फिर भी खूब सोये हुएके समान स्थित थे। उन्होंने राग और लोभ आदिके महान् बन्धनोंको काट डाला था, तो भी उन महात्मा प्रह्लादको निशाचरोंने तुच्छ नागपाशोंसे बाँध दिया। जिनकी ध्वजामें साक्षात् गरुडजी विराजमान हैं, उन भगवान्के भक्त प्रह्लादको उन मूर्खोंने सर्पोंद्वारा बाँधा और जलशायीके प्रियजनको ले जाकर जलराशि समुद्रमें डाला। तदनन्तर उन बली दैत्योंने प्रह्लादके ऊपर पर्वतकी चट्टानें रख दीं और तुरंत ही जाकर राजा हिरण्यकशिपुको यह प्रिय संवाद कह सुनाया। उसे सुनकर उस दैत्यराजने भी उन सबका सम्मान किया॥ ३०-३३१/२ ॥

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