संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१५६ श्रीमन्नसिंहपुराण [ अध्याय ४३ प्रह्लादं चाब्धिमध्यस्थं तमौर्वाग्निमिवापरम् ॥ ३४ बीच समुद्रमें पड़े हुए प्रह्लादको भगवान्के तेजसे दूसरे वडवानलकी भाँति प्रज्वलित देख अत्यन्त भयके ज्वलन्तं तेजसा विष्णोर्ग्राह्या भूरिभियात्यजन्। कारण ग्राहोंने उन्हें दूरसे ही त्याग दिया। प्रह्लाद भी स चाभिन्नचिदानन्दसिन्धुमध्ये समाहितः ॥ ३५ अपनेसे अभिन्न चिदानन्दमय समुद्र (परमेश्वर)-में समाहित होनेके कारण यह न जान सके कि 'मैं बाँधकर खारे न वेद बद्धमात्मानं लवणाम्बुधिमध्यगम्। पानीके सागरमें डाल दिया गया हूँ।' मुनि (प्रह्लाद) जब अथ ब्रह्मामृताम्भोधिमये स्वस्मिन् स्थिते मुनौ ॥ ३६ ब्रह्मानन्दामृतके समुद्ररूप अपने आत्मामें स्थित हो गये, ययौ क्षोभं द्वितीयाब्धिप्रवेशादिव सागरः । उस समय समुद्र इस प्रकार क्षुब्ध हो उठा, मानो उसमें क्लेशात् क्लेशानि वोद्धूय प्रह्लादमथ वीचयः ॥ ३७ दूसरे महासागरका प्रवेश हो गया हो। फिर समुद्रकी लहरें प्रह्लादको धीरे-धीरे कठिनाईसे ठेलकर उस नौकारहित निन्युस्तीरेऽप्लवाम्भोधेः गुरूक्तय इवाम्बुधेः । सागरके तटकी ओर ले गयीं—ठीक उसी प्रकार, जैसे ध्यानेन विष्णुभूतं तं भगवान् वरुणालयः ॥ ३८ ज्ञानी गुरुके वचन क्लेशोंका उन्मूलन करके शिष्यको भवसागरसे पार पहुँचा देते हैं। ध्यानके द्वारा विष्णुरूप विन्यस्य तीरे रत्नानि गृहीत्वा द्रष्टुमाययौ । हुए उन प्रह्लादजीको तीरपर पहुँचाकर भगवान् वरुणालय तावद् भगवताऽऽदिष्टः प्रहृष्टः पन्नगाशनः ॥ ३९ (समुद्र) बहुत-से रत्न ले उनका दर्शन करनेके लिये आये। इतनेमें ही भगवान्की आज्ञा पाकर सर्पभक्षी बन्धनाहीन् समभ्येत्य भक्षयित्वा पुनर्ययौ । गरुडजी वहाँ आ पहुँचे और बन्धनभूत सर्पोंको अत्यन्त अथाबभाषे प्रह्लादं गम्भीरध्वनिरर्णवः ॥ ४० हर्षपूर्वक खाकर चले गये ॥ ३४—३९१/२ ॥ प्रणम्य दिव्यरूपः सन् समाधिस्थं हरेः प्रियम् । तत्पश्चात् गम्भीर घोषवाला दिव्यरूपधारी समुद्र प्रह्लाद भगवद्भक्त पुण्यात्मन्नर्णवोऽस्म्यहम् ॥ ४१ समाधिनिष्ठ भगवद्भक्त प्रह्लादको प्रणाम करके यों बोला— 'भगवद्भक्त प्रह्लाद! पुण्यात्मन् ! मैं समुद्र हूँ। अपने पास चक्षुर्भ्यामथ मां दृष्ट्वा पावयार्थिनमागतम् । आये हुए मुझ प्रार्थीको अपने नेत्रोंद्वारा देखकर पवित्र इत्यम्बुधिगिरः श्रुत्वा स महात्मा हरेः प्रियः ॥ ४२ कीजिये।' समुद्रके ये वचन सुनकर भगवान्के प्रिय भक्त महात्मा असुर-नन्दन प्रह्लादने सहसा उनकी ओर उद्वीक्ष्य सहसा देवं तं नत्वाऽऽहासुरात्मजः । देखकर प्रणाम किया और कहा—'श्रीमन् कब पधारे?' कदाऽऽगतं भगवता तमथाम्बुधिरब्रवीत् ॥ ४३ तब उनसे समुद्रने कहा— ॥ ४०—४३ ॥ योगिन्नज्ञातवृत्तस्त्वमपराध्दं तवासुरैः । 'योगिन्! आपको यह बात ज्ञात नहीं है, असुरोंने बद्धस्त्वमहिभिर्दैत्यैर्मयि क्षिप्तोऽद्य वैष्णव ॥ ४४ आपका बड़ा अपराध किया है। वैष्णव! आपको साँपोंसे बाँधकर दैत्योंने आज मेरे भीतर फेंक दिया; तब मैंने ततस्तूर्णं मया तीरे न्यस्तस्त्वं फणिनश्च तान् । तुरंत ही आपको किनारे लगाया और उन साँपोंको इदानीमेव गरुडो भक्षयित्वा गतो महान् ॥ ४५ अभी-अभी महात्मा गरुडजी भक्षण करके गये हैं। महात्मन् ! मैं सत्सङ्गका अभिलाषी हूँ, आप मुझपर महात्मन्ननुगृहीष्व त्वं मां सत्संगमार्थिनम् । अनुग्रह करें और इन रत्नोंको भेंटरूपमें स्वीकार गृहाणेमानि रत्नानि पूज्यस्त्वं मे हरैर्यथा ॥ ४६ करें। मेरे लिये आप भगवान् विष्णुके समान ही पूज्य हैं। यद्यपि आपको इन रत्नोंकी कोई आवश्यकता यद्यप्येतैर्न ते कृत्यं रत्नैर्दास्याम्यथाप्यहम् । नहीं है, तथापि मैं तो इन्हें आपको दूँगा ही; क्योंकि दीपान्निवेदयत्येव भास्करस्यापि भक्तिमान् ॥ ४७ भगवान् सूर्यका भक्त उन्हें दीप निवेदन करता ही है। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth