संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 168, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५७ त्वमापत्स्वपि घोरासु विष्णुनेव हि रक्षितः। घोर आपत्तियोंमें भी भगवान् विष्णुने ही आपकी रक्षा त्वादृशा निर्मलात्मानो न सन्ति बहवोऽर्कवत्॥ ४८ की है। सूर्यकी भाँति आप-जैसे शुद्धचित्त महात्मा बहुना किं कृतार्थोऽस्मि यत्तिष्ठामि त्वया सह। संसारमें अधिक नहीं हैं। बहुत क्या कहूँ? आज मैं आलपामि क्षणमपि नेक्षे ह्येतत्फलोपमाम्॥ ४९ कृतार्थ हो गया; क्योंकि आज मुझे आपके साथ स्थित इत्यब्धिना स्तुतः श्रीशमाहात्म्यवचनैः स्वयम्। होनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस समय क्षणभर भी जो ययौ लज्जां प्रहर्षं च प्रह्लादो भगवत्प्रियः॥ ५० आपके साथ बातचीत कर रहा हूँ, इससे प्राप्त होनेवाले प्रतिगृह्य स रत्नानि वत्सलः प्राह वारिधिम्। फलकी उपमा मैं कहीं नहीं देखता'॥४४–४९॥ महात्मन् सुतरां धन्यः शेते त्वयि हि स प्रभुः॥५१ इस प्रकार समुद्रने साक्षात् भगवान् लक्ष्मीपतिके कल्पान्तेऽपि जगत्कृत्स्नं ग्रसित्वा स जगन्मयः। माहात्म्यसूचक वचनोंद्वारा जब उनकी स्तुति की, तब त्वय्येवैकार्णवीभूते शेते किल महात्मनि॥५२ भगवान्के प्रिय भक्त प्रह्लादजीको बड़ी लज्जा हुई और हर्ष लोचनाभ्यां जगन्नाथं द्रष्टुमिच्छामि वारिधे। भी। स्नेही प्रह्लादने समुद्रके दिये हुए रत्न ग्रहणकर उनसे त्वं पश्यसि सदा धन्यस्तत्रोपायं प्रयच्छ मे॥५३ कहा—'महात्मन्! आप विशेष धन्यवादके पात्र हैं; क्योंकि उक्तेति पादावनतं तूर्णमुत्थाप्य सागरः। भगवान् आपके ही भीतर शयन करते हैं। यह प्रसिद्ध है प्रह्लादं प्राह योगीन्द्र त्वं पश्यसि सदा हृदि॥५४ कि जगन्मय प्रभु प्रलयकालमें भी सम्पूर्ण जगत्को अपनेमें द्रष्टुमिच्छस्यथाक्षिभ्यां स्तुहि तं भक्तवत्सलम्। लीन करके एकार्णवरूपमें स्थित आप महात्मा महासागरमें उक्तेति सिन्धुः प्रह्लादमात्मनः स जलेऽविशत्॥५५ ही शयन करते हैं। समुद्र! मैं इन स्थूल नेत्रोंसे भगवान् गते नदीन्द्रे स्थित्वैको हरिं रात्रौ स दैत्यजः। जगन्नाथका दर्शन करना चाहता हूँ। आप धन्य हैं; क्योंकि भक्त्यास्तौदिति मन्वानस्तद्दर्शनमसम्भवम्॥ ५६ सदा भगवान्का दर्शन करते रहते हैं। कृपया मुझे भी प्रह्लाद उवाच उनके दर्शनका उपाय बताइये'॥ ५०-५३॥ वेदान्तवाक्यशतमारुतसम्पवृद्ध- यों कहकर प्रह्लादजी समुद्रके चरणोंपर गिर पड़े। वैराग्यवह्निशिखया परिताप्य चित्तम्। तब समुद्रने उनको शीघ्र ही उठाकर कहा—'योगीन्द्र! संशोधयन्ति यदवेक्षणयोग्यतायै आप तो सदा ही अपने हृदयमें भगवान्का दर्शन करते धीराः सदैव स कथं मम गोचरः स्यात्॥ ५७ हैं; तथापि यदि इन नेत्रोंसे भी देखना चाहते हैं तो उन मात्सर्यरोषस्मरलोभमोह- भक्तवत्सल भगवान्का स्तवन कीजिये।' यों कहकर मदादिभिर्वा सुदृढैः सुषड्भिः। समुद्रदेव अपने जलमें प्रविष्ट हो गये॥५४-५५॥ उपर्युपर्यावरणैः सुबद्ध- समुद्रके चले जानेपर दैत्यनन्दन प्रह्लादजी रात्रिमें वहाँ मन्धं मनो मे क्व हरिः क्व वाहम्॥ ५८ अकेले ही रहकर भगवान्के दर्शनको एक असम्भव यं धातृमुख्या विबुधा भयेषु कार्य मानते हुए भक्तिपूर्वक श्रीहरिकी स्तुति करने लगे ॥ ५६ ॥ शान्त्यर्थिनः क्षीरनिधेरुपान्तम्। प्रह्लादजी बोले—धीर पुरुष जिनके दर्शनकी योग्यता गत्वोत्तमस्तोत्रकृतः कथंचित् प्राप्त करनेके लिये सदा ही सैकड़ों वेदान्त-वाक्यरूप पश्यन्ति तं द्रष्टुमहो ममाशा॥ ५९ वायुद्वारा अत्यन्त बढ़ी हुई वैराग्यरूप अग्निकी ज्वालासे अपने चित्तको तपाकर भलीभाँति शुद्ध किया करते हैं, वे भगवान् विष्णु, भला, मेरे दृष्टिपथमें कैसे आ सकते हैं। एकके ऊपर एकके क्रमसे ऊपर-ऊपर जिनका आवरण पड़ा हुआ है—ऐसे मात्सर्य, क्रोध, काम, लोभ, मोह, मद आदि छः सुदृढ़ बन्धनोंसे भलीभाँति बँधा हुआ मेरा मन अंधा (विवेकशून्य) हो रहा है। कहाँ भगवान् श्रीहरि और कहाँ मैं! भय उपस्थित होनेपर उसकी शान्तिके लिये क्षीरसागरके तटपर जाकर ब्रह्मादि देवता उत्तम रीतिसे स्तवन करते हुए किसी प्रकार जिनका दर्शन कर पाते हैं, उन्हीं भगवान्के दर्शनकी मुझ-जैसा दैत्य आशा करे— यह कैसा आश्चर्य है!॥ ५७-५९॥
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