संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 169, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३ अयोग्यमात्मानमितीशदर्शने राजन्! इस प्रकार अपनेको भगवान्का दर्शन पानेके स मन्यमानस्तदनासिकातरः । योग्य न मानते हुए प्रह्लादजी उनकी अप्राप्तिके दुःखसे उद्वेगदुःखार्णवमग्नमानसः कातर हो उठे। उनका चित्त उद्वेग और अनुतापके समुद्रमें स्रुताश्रुधारो नृप मूर्च्छितोऽपतत् ॥ ६० डूब गया। वे नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए मूर्च्छित होकर गिर पड़े। भूप! फिर तो क्षणभरमें ही भक्तजनोंके अथ क्षणात्सर्वगतश्चतुर्भुजः एकमात्र प्रियतम सर्वव्यापी कृपानिधान भगवान् विष्णु शुभाकृतिर्भक्तजनैकवल्लभः । सुन्दर चतुर्भुज रूप धारणकर दुःखी प्रह्लादको अमृतके दुःस्थं तमाश्लिष्य सुधामयैर्भुजै- समान सुखद स्पर्शवाली अपनी भुजाओंसे उठाकर गोदमें स्तत्रैव भूपाविरभूद्दयानिधिः ॥ ६१ लगाते हुए वहाँ प्रकट हो गये ॥ ६०-६१ ॥ स लब्धसंज्ञोऽथ तदङ्गसङ्गा- उनके अङ्गस्पर्शसे होशमें आनेपर प्रह्लादने सहसा नेत्र दुन्मीलिताक्षः सहसा ददर्श । खोलकर भगवान्को देखा। उनका मुख प्रसन्न था। नेत्र प्रसन्नवक्त्रं कमलायताक्षं कमलके समान सुन्दर और विशाल थे। भुजाएँ बड़ी- सुदीर्घबाहुं यमुनासवर्णम् ॥ ६२ बड़ी थीं और शरीर यमुनाजलके समान श्याम था। वे उदारतेजोमयमप्रमेयं परम तेजस्वी और अपरिमित ऐश्वर्यशाली थे। गदा, शङ्ख, गदारिशङ्खाम्बुजचारुचिह्नितम् । चक्र और पद्म आदि सुन्दर चिह्नोंसे पहचाने जा रहे थे। स्थितं समालिङ्ग्य विभुं स दृष्ट्वा इस प्रकार अपनेको अङ्कमें लगाये हुए भगवान्को खड़ा प्रकम्पितो विस्मयभीतिहर्षैः ॥ ६३ देख प्रह्लाद भय, विस्मय और हर्षसे काँप उठे, वे इस तत् स्वप्नमेवाथ स मन्यमानः घटनाको स्वप्न ही समझते हुए सोचने लगे—'अहा! स्वप्नेऽपि पश्यामि हरिं कृतार्थम् । स्वप्नमें भी मुझे पूर्णकाम भगवान्का दर्शन तो मिल गया!' इति प्रहर्षार्णवमग्नचेताः यह सोचकर उनका चित्त हर्षके महासागरमें गोता लगाने स्वानन्दमूर्च्छां स पुनश्च भेजे ॥ ६४ लगा और वे पुनः स्वरूपानन्दमयी मूर्च्छाको प्राप्त हो गये। ततः क्षितावेव निविश्य नाथः तब अपने भक्तोंके एकमात्र बन्धु भगवान् पृथ्वीपर ही कृत्वा तमङ्के स्वजनैकबन्धुः । बैठ गये और पाणिपल्लवसे धीरे-धीरे उन्हें हिलाने लगे। शनैर्विधुन्वन् करपल्लवेन स्नेहमयी माताकी भाँति प्रह्लादके गात्रका स्पर्श करते हुए स्पृशन् मुहुर्मातृवदालिलिङ्ग ॥ ६५ उन्हें बार-बार छातीसे लगाने लगे ॥ ६२-६५ ॥ ततश्चिरेण प्रह्लादः सम्मुखोन्मीलितेक्षणः । कुछ देरके बाद प्रह्लादने भगवान्के सामने आँखें खोलकर आलुलोके जगन्नाथं विस्मयाविष्टचेतसा ॥ ६६ विस्मितचित्तसे उन जगदीश्वरको देखा। फिर बहुत देरके ततश्चिरात्तं सम्भाव्य धीरः श्रीशाङ्कशायिनम् । बाद अपनेको भगवान् लक्ष्मीपतिकी गोदमें सोया हुआ आत्मानं सहसोत्तस्थौ सद्यः सभयसम्भ्रमः ॥ ६७ अनुभवकर वे भय और आवेगसे युक्त हो सहसा उठ गये प्रणामायापतद्भूम्यां प्रसीदेति वदन्मुहुः । तथा 'भगवन्! प्रसन्न होइये' यों बार-बार कहते हुए उन्हें सम्भ्रमात् स बहुज्ञोऽपि नान्यां पूजोक्तिमस्मरत् ॥ ६८ साष्टाङ्ग प्रणाम करनेके लिये पृथ्वीपर गिर पड़े। बहुज्ञ तमथाभयहस्तेन गदाशङ्खारिधृक् प्रभुः । होनेपर भी उन्हें उस समय घबराहटके कारण अन्य गृहीत्वा स्थापयामास प्रह्लादं स दयानिधिः ॥ ६९ स्तुतिवाक्योंका स्मरण न हुआ। तब गदा, शङ्ख और चक्र कराब्जस्पर्शनाह्लादगलदश्रुं सवेपथुम् । धारण करनेवाले दयानिधि भगवान्ने प्रह्लादको अपने भूयोऽथाह्लादयन् स्वामी तं जगादेति सान्त्वयन् ॥ ७० भक्तभयहारी हाथसे पकड़कर खड़ा किया। भगवान्के कर- कमलोंका स्पर्श होनेसे अत्यन्त आनन्दके आँसू बहाते और काँपते हुए प्रह्लादको और अधिक आनन्द देनेके लिये प्रभुने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा ॥ ६६-७० ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth