भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 318 में से

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पृष्ठ 256

अध्याय ५५ ] शुक्राचार्यको भगवान्‌की स्तुतिसे पुनः नेत्रकी प्राप्ति २४५

द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे। यतते दशभिर्वर्षैस्त्रेतायां हायनेन तत्॥ ५२ द्वापरे तच्च मासेन अहोरात्रेण तत्कलौ। ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् ॥ ५३ यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम्। समस्तजगदाधारं परमार्थस्वरूपिणम् ॥ ५४ घोरे कलियुगे प्राप्ते विष्णुं ध्यायन् न सीदति। अहोऽतीव महाभाग्याः सकृच्चे केशवार्चकाः ॥ ५५ घोरे कलियुगे प्राप्ते सर्वकर्मबहिष्कृते। न्यूनातिरिक्कता न स्यात्कलौ वेदोक्तकर्मणाम् ॥ ५६ हरिस्मरणमेवात्र सम्पूर्णफलदायकम्। हरे केशव गोविन्द वासुदेव जगन्मय ॥ ५७ जनार्दन जगद्धाम पीताम्बरधराच्युत। इतीरयन्ति ये नित्यं न हि तान् बाधते कलिः ॥ ५८ अहो हरिपरा ये तु कलौ सर्वभयंकरे। ते सभा्ग्या महात्मानस्तत्सङ्गतिरता अपि ॥ ५९ हरिनामपरा ये च हरिकीर्तनतत्पराः। हरिपूजारता ये च ते कृतार्था न संशयः ॥ ६० इत्येतद्वः समाख्यातं सर्वदुःखनिवारणम्। समस्तपुण्यफलदं कलौ विष्णोः प्रकीर्तनम् ॥ ६१

द्वापरमें यज्ञको महान् बताया गया है और कलियुगमें एकमात्र दानको। सत्ययुगमें दस वर्षोंतक तप आदिके लिये प्रयत्न करनेसे जो फल मिलता है, वही त्रेतायुगमें एक ही वर्षके प्रयत्नसे सिद्ध होता है, द्वापरमें एक ही मासकी साधनासे सुलभ होता है और कलियुगमें केवल एक दिन-रात यत्न करनेसे प्राप्त हो जाता है। सत्ययुगमें ध्यान, त्रेतामें यज्ञोंद्वारा यजन और द्वापरमें पूजन करनेसे, जो फल मिलता है, उसे ही कलियुगमें केवल भगवान्‌का कीर्तन करनेसे मनुष्य प्राप्त कर लेता है। घोर कलियुग प्राप्त होनेपर समस्त जगत्‌के आधारभूत परमार्थस्वरूप भगवान् विष्णुका ध्यान करनेवाले मनुष्यको कलिसे बाधा नहीं पहुँचती। अहो! जिन्होंने एक बार भी भगवान् विष्णुका पूजन किया है, वे बड़े सौभाग्यशाली हैं॥ ५०–५५॥ सम्पूर्ण कर्मोंका बहिष्कार करनेवाले कलियुगके प्राप्त होनेपर किये जानेवाले वेदोक्त कर्मोंमें न्यूनता या अधिकताका दोष नहीं होता। उसमें भगवान्‌का स्मरण ही पूर्ण फलदायक होता है। जो लोग हरे, केशव, गोविन्द, वासुदेव, जगन्मय, जनार्दन, जगद्धाम, पीताम्बरधर, अच्युत इत्यादि नामोंका उच्चारण करते रहते हैं, उन्हें कलियुग कभी बाधा नहीं पहुँचाता। अहो! सबको भय देनेवाले इस कलिकालमें जो लोग भगवान् विष्णुकी आराधनामें लगे रहते हैं, अथवा जो उनके आराधकोंका संग ही करते हैं, वे महात्माजन बड़े ही भाग्यशाली हैं। जो हरिनामका जप करते हैं, हरिकीर्तनमें लगे रहते हैं और सदा हरिकी पूजा ही किया करते हैं, वे मनुष्य कृतकृत्य हो गये हैं—इसमें संदेह नहीं है। इस प्रकार यह कलिका वृत्तान्त मैंने तुमसे कहा। कलियुगमें भगवान् विष्णुका नामकीर्तन समस्त दुःखोंको दूर करनेवाला और सम्पूर्ण पुण्यफलोंको देनेवाला है॥ ५६–६१॥

इति श्रीनरसिंहपुराणे कलिलक्षणकीर्तनं नाम चतुःपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५४ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'कलियुगके लक्षणोंका वर्णन' नामक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५४ ॥

पचपनवाँ अध्याय शुक्राचार्यको भगवान्‌की स्तुतिसे पुनः नेत्रकी प्राप्ति

राजोवाच मार्कण्डेय कथं शुक्रः पुरा बलिमखे गुरुः। वामनेन स विद्धाक्षः स्तुत्वा तल्लब्धवान् कथम् ॥ १

राजा बोले—मार्कण्डेयजी ! पूर्वकालमें राजा बलिके यज्ञमें भगवान् वामनने जो दैत्यगुरु शुक्राचार्यकी आँख छेद डाली थी, उसे उन्होंने पुनः भगवान्‌की स्तुतिद्वारा किस प्रकार प्राप्त किया ? ॥ १ ॥

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