संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 264, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५७ ] भक्तके लक्षण; हारीत-स्मृतिका आरम्भ; ब्राह्मणधर्मका वर्णन २५३
भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वधर्मप्रवर्तक। वर्णानामाश्रमाणां च धर्मं प्रब्रूहि शाश्वतम्॥ १२ हारीत उवाच नारायणः पुरा देवो जगत्स्रष्टा जलोपरि। सुष्वाप भोगिपर्यङ्के शयने तु श्रिया सह॥ १३ तस्य सुप्तस्य नाभौ तु दिव्यं पद्ममभूत् किल। तन्मध्ये चाभवद्ब्रह्मा वेदवेदाङ्गभूषणः॥ १४ स चोक्तस्तेन देवेन ब्राह्मणान् मुखतोऽसृजत्। असृजत्क्षत्रियान् बाह्रोर्वैश्यांस्तु ऊरुतोऽसृजत्॥ १५ शूद्रांस्तु पादतः सृष्टास्तेषां चैवानुपूर्वशः। धर्मशास्त्रं च मर्यादां प्रोवाच कमलोद्भवः॥ १६ तद्वत्सर्वं प्रवक्ष्यामि शृणुत द्विजसत्तमाः। धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्गमोक्षफलप्रदम्॥ १७
उन्हें प्रणाम किया और कहा—'भगवन्! आप समस्त धर्मोंके ज्ञाता और प्रवर्तक हैं; अतः आप हमलोगोंसे वर्ण और आश्रमोंसे सम्बन्ध रखनेवाले सनातन धर्मका वर्णन कीजिये'॥ ११-१२॥ श्रीहारीतजी बोले—पूर्वकालमें जगत्स्रष्टा भगवान् नारायण जलके ऊपर शेषनागकी शय्यापर श्रीलक्ष्मीजीके साथ शयन करते थे। कहते हैं, शयन-कालमें ही उन भगवान्की नाभिसे एक दिव्य कमल प्रकट हुआ और उस कमल-कोषमेंसे वेद-वेदाङ्गोंके ज्ञानसे विभूषित श्रीब्रह्माजी प्रकट हुए। उन ब्रह्माजीने सृष्टिके लिये भगवान् नारायणकी आज्ञा होनेपर सर्वप्रथम ब्राह्मणोंको अपने मुखसे प्रकट किया। फिर क्षत्रियोंको बाहुओंसे और वैश्योंको जाँघोंसे उत्पन्न किया। अन्तमें उन्होंने चरणोंसे शूद्रोंकी सृष्टि की। फिर कमलोद्भव ब्रह्माजीने क्रमशः उन्हीं ब्राह्मणादि वर्णोंके धर्मका उपदेश करनेवाले शास्त्र और वर्णोंकी मर्यादाका वर्णन किया। द्विजवरो! ब्रह्माजीने जो कुछ उपदेश किया, वह सब मैं आप लोगोंसे कह रहा हूँ; आप सुनें। यह धर्मशास्त्र धन, यश और आयुको बढ़ानेवाला तथा स्वर्ग और मोक्षरूपी फलको देनेवाला है॥ १३-१७॥
ब्राह्मण्यां ब्राह्मणेनैव चोत्पन्नो ब्राह्मणः स्मृतः। तस्य धर्मं प्रवक्ष्यामि तद्योग्यं देशमेव च॥ १८ कृष्णसारो मृगो यत्र स्वभावात्तु प्रवर्तते। तस्मिन् देशे वसेद्धर्मं कुरु ब्राह्मणपुंगव॥ १९ षट्कर्माणि च यान्याहुर्ब्राह्मणस्य मनीषिणः। तैरेव सततं यस्तु प्रवृत्तः सुखमेधते॥ २० अध्ययनमध्यापनं च यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहश्चेति कर्मषट्कमिहोच्यते॥ २१ अध्यापनं च त्रिविधं धर्मस्यार्थस्य कारणम्। शुश्रूषाकारणं चैव त्रिविधं परिकीर्तितम्॥ २२ योग्यानध्यापयेच्छिष्यान् याज्यानपि च याजयेत्। विधिना प्रतिगृह्णींश्च गृहधर्मप्रसिद्धये॥ २३ वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं शुभे देशे समाहितः। नित्यं नैमित्तिकं काम्यं कर्म कुर्यात् प्रयत्नतः॥ २४ गुरुशुश्रूषणं चैव यथान्यायमतन्द्रितः। सायं प्रातरुपासीत विधिनाग्निं द्विजोत्तमः॥ २५
जो ब्राह्मण-कुलमें उत्पन्न हुई स्त्रीके गर्भ और ब्राह्मणके ही वीर्यसे उत्पन्न हुआ है, वह 'ब्राह्मण' कहा गया है। अब मैं ब्राह्मणके धर्म और निवास-योग्य देशको बता रहा हूँ। ब्रह्माजीने ब्राह्मणको उत्पन्न करके उनसे कहा—'ब्राह्मणश्रेष्ठ! जिस देशमें कृष्णसार मृग स्वभावतः निवास करता हो, उसी देशमें रहकर तुम धर्मका पालन करो।' मनीषियोंने जो ब्राह्मणके छः कर्म बतलाये हैं, उन्हींके अनुसार जो सदा व्यवहार करता है, वह सुखपूर्वक अभ्युदयशील होता है। अध्ययन (पढ़ना), अध्यापन (पढ़ाना), यजन (यज्ञ करना), याजन (यज्ञ कराना), दान करना और दान लेना—ये ही ब्राह्मणके छः कर्म कहे जाते हैं। इनमेंसे अध्ययन तीन प्रकारका बताया जाता है—पहला धर्मके लिये, दूसरा धनके लिये और तीसरा अपनी सेवा करानेके लिये होता है। ब्राह्मणको चाहिये कि योग्य शिष्योंको पढ़ाये, योग्य यजमानोंका यज्ञ कराये और गृहस्थधर्मकी सिद्धि (जीविका चलाने आदि)-के लिये विधिपूर्वक दूसरेका दान भी ग्रहण करे। शुभ स्थानपर रहकर, एकाग्रचित्त हो, प्रतिदिन वेदका ही अभ्यास करे तथा यत्नपूर्वक नित्य, नैमित्तिक और काम्य कर्मोंका अनुष्ठान करे। श्रेष्ठ ब्राह्मणको चाहिये कि आलस्य त्यागकर उचितरूपसे गुरुजनोंकी सेवा करे और प्रतिदिन प्रातःकाल तथा सायंकाल विधिपूर्वक अग्निकी सेवा किया करे॥ १८-२५॥
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth