संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 265, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८ कृतस्नानस्तु कुर्वीत वैश्वदेवं दिने दिने। अतिथिं चागतं भक्त्या पूजयेच्छक्तितो गृही॥ २६ अन्यांश्चागतान् दृष्ट्वा पूजयेदविरोधतः। स्वदारनिरतो नित्यं परदारविवर्जितः॥ २७ सत्यवादी जितक्रोधः स्वधर्मनिरतो भवेत्। स्वकर्मणि च सम्प्राप्ते प्रमादं नैव कारयेत्॥ २८ प्रियां हितां वदेद्वाचं परलोकाविरोधिनीम्। एवं धर्मः समुद्दिष्टो ब्राह्मणस्य समासतः। धर्ममेवं तु यः कुर्यात्स याति ब्रह्मणः पदम्॥ २९ इत्येष धर्मः कथितो मया वै विप्रस्य विप्रा अखिलाघहारी। वदामि राजादिजनस्य धर्मं पृथक्पृथग्बोधत विप्रवर्याः॥ ३० गृहस्थ ब्राह्मण स्नान आदिके बाद प्रतिदिन बलिवैश्वदेव करे और घरपर आये हुए अतिथिका अपनी शक्तिके अनुसार भक्तिपूर्वक सम्मान करे। एक अतिथिके आ जानेपर यदि दूसरे भी आ जायँ तो उन्हें भी देखकर विरोध न माने, उनका भी यथाशक्ति सम्मान करे। सदा अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखे, दूसरेकी स्त्रीके सम्पर्कसे सदा दूर रहे। सदा सत्य बोले, क्रोध न करे, अपने धर्मका पालन करता रहे। अपने नैतिक आदि कर्मका समय प्राप्त होनेपर प्रमाद न करे। जिससे परलोक न बिगड़े—ऐसी सत्य, प्रिय और हितकारिणी वाणी बोले। इस प्रकार मैंने ब्राह्मण-धर्मका संक्षेपसे वर्णन किया। जो ब्राह्मण इस प्रकार अपने धर्मका पालन करता है, वह नित्य ब्रह्मधाम (सत्यलोक)-को प्राप्त होता है। विप्रगण! इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे यह ब्राह्मण-धर्म कहा है, यह समस्त पापोंको दूर करनेवाला है। विप्रवरो! अब क्षत्रियादि जातियोंका पृथक्-पृथक् धर्म बताता हूँ, आप लोग सुनें॥ २६—३०॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे ब्राह्मणधर्मकथनं नाम सप्तपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५७ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'ब्राह्मणधर्मका वर्णन' नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५७॥ अठ्ठावनवाँ अध्याय क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन हारीत उवाच क्षत्रादीनां प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः। येन येन प्रवर्तन्ते विधिना क्षत्रियादयः॥ १ राज्यस्थः क्षत्रियश्चैव प्रजा धर्मेण पालयेत्। कुर्यादध्ययनं सम्यग्यजेद्यज्ञान् यथाविधि॥ २ दद्याद्दानं द्विजाग्र्येभ्यो धर्मबुद्धिसमन्वितः। स्वदारनिरतो नित्यं परदारविवर्जितः॥ ३ नीतिशास्त्रार्थकुशलः संधिविग्रहतत्त्ववित्। देवब्राह्मणभक्तश्च पितृकार्यपरस्तथा॥ ४ धर्मेणैव जयं काङ्क्षेद्धर्मं परिवर्जयेत्। उत्तमां गतिमाप्नोति क्षत्रियोऽथैवमाचरन्॥ ५ श्रीहारीत मुनि बोले—अब मैं क्रमशः क्षत्रियादि वर्णोंके लिये विहित नियमोंका यथावत् वर्णन करूँगा, जिनके अनुसार क्षत्रियादिको अपना व्यवहार निभाना चाहिये। राजपदपर स्थित क्षत्रियको उचित है कि वह धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करे। उसे भलीभाँति वेदाध्ययन और विधिपूर्वक यज्ञ भी करने चाहिये। धर्मबुद्धिसे युक्त हो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान दे, सदा अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहकर परस्त्रीका त्याग करे, नीतिशास्त्रका अर्थ समझनेमें निपुण हो, संधि और विग्रहका तत्त्व समझे। देवताओं और ब्राह्मणोंमें भक्ति रखे, पितरोंका पूजन-श्राद्धादि कर्म करे। धर्मपूर्वक ही विजयकी इच्छा करे, अधर्मको भलीभाँति त्याग दे। इस प्रकार आचरण करनेवाला क्षत्रिय उत्तम गतिको प्राप्त होता है॥ १-५॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth