भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 318 में से

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पृष्ठ 270

अध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २५९ युध्यन्ति वरदानेन ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । प्रबल हुए 'मन्देह' नामक राक्षस प्रतिदिन प्रातःकाल उदकाञ्जलिविक्षेपो गायत्र्या चाभिमन्त्रितः ॥ ५४ आकर सूर्यके साथ युद्ध करते हैं; किंतु जब गायत्रीसे अभिमन्त्रित जलाञ्जलि सूर्यदेवके सामने उछाली जाती है, तान् हन्ति राक्षसान् सर्वान् मन्देहान् रविवैरिणः । तब वह उन समस्त सूर्य-वैरी मन्देह नामके राक्षसोंको ततः प्रयाति सविता ब्राह्मणै रक्षितो दिवि ॥ ५५ मार भगाती है।* तत्पश्चात् महाभाग मरीचि आदि ब्राह्मणों और सनकादिक योगियोंद्वारा रक्षित हो, भगवान् सूर्यदेव मरीच्याद्यैर्महाभागैः सनकाद्यैश्च योगिभिः । आकाशमें आगे बढ़ते हैं। इसलिये द्विजको चाहिये कि तस्मान्न लङ्घयेत्संध्यां सायं प्रातःर्द्विजः सदा ॥ ५६ सायं और प्रातःकालकी संध्याका कभी उल्लङ्घन न करे। जो मोहवश संध्याका उल्लङ्घन करता है, वह अवश्य उल्लङ्घयति यो मोहात्स याति नरकं ध्रुवम् । ही नरकमें पड़ता है। यदि सायंकालमें मन्त्रपाठपूर्वक सायं मन्त्रवदाचम्य प्रोक्ष्य सूर्यस्य चाञ्जलिम् ॥ ५७ आचमन करके अपने ऊपर जल छिड़ककर फिर भगवान् सूर्यको जलाञ्जलि अर्पित की जाय और उनकी परिक्रमा दत्त्वा प्रदक्षिणं कृत्वा जलं स्पृष्ट्वा विशुध्यति । करके पुनः जलका स्पर्श किया जाय तो वह द्विज शुद्ध पूर्वा संध्यां सनक्षत्रामुपक्रम्य यथाविधि ॥ ५८ हो जाता है। प्रातःकालकी संध्या तारोंके रहते-रहते विधिपूर्वक आरम्भ करे और जबतक तारोंका दर्शन हो, गायत्रीमभ्यसेत्तावद्यावदृक्षाणि पश्यति । तबतक गायत्रीका जप करता रहे। तत्पश्चात् घरमें आकर ततस्त्वावसथं प्राप्य होमं कुर्यात्स्वयं बुधः ॥ ५९ विद्वान् पुरुषको स्वयं हवन करना चाहिये। फिर जो भृत्य-पालनीय कुटुम्बीजन तथा दास आदि हों, उनके संचिन्त्य भृत्यवर्गस्य भरणार्थं विचक्षणः । भरण-पोषणके लिये विद्वान् गृहस्थ चिन्ता (आवश्यक ततः शिष्यहितार्थाय स्वाध्यायं किंचिदाचरेत् ॥ ६० प्रबन्ध) करे। उसके बाद शिष्योंके हितके लिये कुछ देरतक स्वाध्याय करे। उत्तम द्विजको चाहिये कि अपनी ईश्वरं चैव रक्षार्थमभिगच्छेद्द्विजोत्तमः । रक्षाके लिये ईश्वरका सहारा ले। फिर दूर जाकर पूजाके कुशपुष्पेन्धनादीनि गत्वा दूरात्समाहरेत् ॥ ६१ लिये कुश, फूल और हवनके लिये समिधा आदि ले आये और पवित्र स्थानमें एकाग्रचित्तसे बैठकर मध्याह्नकालिक माध्याह्निकीं क्रियां कुर्याच्छुचौ देशे समाहितः । क्रिया (संध्योपासना आदि) करे ॥ ५२-६११/२ ॥ विधिं स्नानस्य वक्ष्यामि समासात् पापनाशनम् ॥ ६२ अब हम थोड़ेमें स्नानकी विधि बतला रहे हैं जो स्नात्वा येन विधानेन सद्यो मुच्येत किल्बिषात् । समस्त पापोंको नष्ट करनेवाली है। उस विधिसे स्नान सुधीः स्नानार्थमादाय शुक्लां कुशतिलैः सह ॥ ६३ करके मनुष्य तत्काल पापोंसे मुक्त हो जाता है। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि स्नानके लिये कुश और तिलोंके साथ सुमनाश्च ततो गच्छेन्नदीं शुद्धां मनोरमाम् । शुद्ध मिट्टी ले ले तथा प्रसन्नचित्त होकर शुद्ध और मनोहर नद्यां तु विद्यमानायां न स्नायादल्पवारिषु ॥ ६४ नदीके तटपर जाय। नदीके होते हुए छोटे जलाशयोंमें स्नान न करे। वहाँ पवित्र स्थानपर उसे छिड़ककर कुश और शुचौ देशे समभ्युक्ष्य स्थापयेत्कुशमृत्तिकाम् । मृत्तिका आदि रख दे। फिर विद्वान् पुरुष मिट्टी और जलसे मृत्तोयेन स्वकं देहमभिप्रक्षाल्य यत्नतः ॥ ६५

  • यहाँ 'मन्देह' राक्षस आलस्यके प्रतीक हैं। जिस देशमें जब रात बीतकर प्रातःकाल होता है, वहाँके लोगोंको उसी समय आलस्य दबाये रहता है। 'सूर्य आत्मा जगतः' के अनुसार सूर्य सबके आत्मा हैं, अतः किसी भी प्राणीपर आलस्यका आक्रमण सूर्यपर मन्देहका आक्रमण है। स्नान और सूर्यार्घ्यसे इस मन्देह या आलस्यका निवारण सबके प्रत्यक्ष अनुभवमें आता है।