संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ
पृष्ठ 288, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 288
अध्याय ६३ ] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २७७
विभीषण उवाच | विभीषण बोले—'यक्षराज! आप दीन क्यों हो कथं दीनोऽसि यक्षेश किं कष्टं तव चेतसि। | रहे हैं? आपके मनमें क्या कष्ट है? इस समय आप निवेदयाधुनास्माकं निश्चयान्मार्जयामि तत्॥ ६० | उस कष्टको मुझे बताइये। मैं निश्चय ही उसका मार्जन तदैकान्तं समासाद्य कथयामास वेदनाम्। | करूँगा।' तब कुबेरने एकान्तमें जाकर विभीषणसे अपनी | मनोवेदना बतलायी॥ ६०१/२॥ धनद उवाच | कुबेर बोले—भाई! कुछ दिनोंसे मैं अपनी मनोरमा गृहीता किं स्वयं याता निहता केनचिद्द्विषा॥ ६१ | भार्या चित्रसेनाको नहीं देख रहा हूँ। न जाने उसे किसीने भ्रातः कान्तां न पश्यामि चित्रसेनां मनोरमाम्। | पकड़ लिया या वह स्वयं किसीके साथ चली गयी एतद्वन्धो महत्कष्टं मम नारीसमुद्भवम्॥ ६२ | अथवा किसी शत्रुने उसे मार डाला। बन्धो! मुझे अपनी प्राणान् वै घातयिष्यामि अनासाद्य च वल्लभाम्। | स्त्रीके वियोगका महान् कष्ट हो रहा है। यदि वह प्राणवल्लभा | न मिली तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगा॥ ६१-६२१/२॥ विभीषण उवाच | विभीषण बोले—'प्रभो! आपकी भार्या जहाँ- आनयिष्यामि ते कान्तां यत्र तत्र स्थितां विभो॥ ६३ | कहीं भी होगी, मैं उसे ला दूँगा। नाथ! इस समय कः समर्थोऽधुनास्माकं हर्तुं नाथ तृणस्य च। | संसारमें किसकी सामर्थ्य है जो हमारा तृण भी चुरा ततो विभीषणस्तत्र नाडीजङ्घां निशाचरीम्॥ ६४ | सके।' यह कहकर विभीषणने नाना प्रकारकी मायाके भृशं संजल्पयामास नानामायागरीयसीम्। | ज्ञानमें बढ़ी-चढ़ी 'नाडीजङ्घा' नामकी निशाचरीसे धनदस्य च या कान्ता चित्रसेनाभिधानतः॥ ६५ | बहुत कुछ कहा और बताया—"कुबेरकी जो 'चित्रसेना' सा च केन हृता लोके मानसे सरसि स्थिता। | नामकी पत्नी है, वह एक दिन जब मानससरोवरके तां च जानीहि संवीक्ष्य देवराजादिवेश्मसु॥ ६६ | तटपर थी, तभी वहाँसे किसीने उसे हर लिया। तुम ततो निशाचरी भूप कृत्वा मायामयं वपुः। | इन्द्र आदि लोकपालोंके भवनोंमें देखकर उसका पता जगाम त्रिदिवं शीघ्रं देवराजादिवेश्मसु॥ ६७ | लगाओ"॥ ६३-६६॥ यया दृष्ट्या क्षणं दृष्टो मोहं यास्यति चोपलः। | भूप! तब वह निशाचरी मायामय शरीर धारणकर यस्याः समं ध्रुवं रूपं विद्यते न चराचरे॥ ६८ | इन्द्रादि देवताओंके भवनोंमें खोज करनेके लिये शीघ्र ही एतस्मिन्नेव काले च देवराजोऽपि भूपते। | स्वर्गलोकमें गयी। उस निशाचरीने ऐसा सुन्दर रूप सम्प्राप्तो मन्दराच्छीघ्रं प्रेरितश्चित्रसेनया॥ ६९ | बनाया था, जिसकी एक ही दृष्टि पड़नेसे पत्थर भी ग्रहीतुं दिव्यपुष्पाणि नन्दनप्रभवाणि च। | मोहित हो सकता था। अवश्य ही उस समय वैसा तत्र पश्यन् स तां तन्वीं निजस्थाने समागताम्॥ ७० | मोहन रूप चराचर जगत्में कहीं नहीं था। भूपते! इसी अतीवरूपसम्पन्नां गीतगानपरायणाम्। | समय देवराज इन्द्र भी चित्रसेनाके भेजनेसे उतावलीके तां वीक्ष्य देवराजोऽपि स कामवशगोऽभवत्॥ ७१ | साथ नन्दनवनके दिव्य पुष्प लेनेके लिये मन्दराचलसे ततः सम्प्रेरयामास देववैद्यौ सुराधिपः। | स्वर्गलोकमें आये थे। वहाँ अपने स्थानपर आयी हुई तस्याः पार्श्वे समानेतुं ध्रुवं चान्तःपुरे तदा॥ ७२ | उस अत्यन्त रूपवती रमणीको जो मधुर गान गा रही थी, देववैद्यौ तदाऽऽगत्य जल्पतश्चाग्रतः स्थितौ। | देख देवराज भी कामके वशीभूत हो गये। तब देवेन्द्रने आगच्छ भव तन्वङ्गि देवराजसमीपगा॥ ७३ | उसे जैसे भी हो, अपने अन्तःपुरमें बुला लानेके लिये | देववैद्य अश्विनीकुमारोंको उसके पास भेजा। दोनों | अश्विनीकुमार उसके सामने जाकर खड़े हुए और कहने | लगे—"कृशाङ्गि! आओ, देवराज इन्द्रके निकट चलो।"
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