भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 318 में से

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पृष्ठ 287

२७६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३

एका पुरा रामवधूर्हता च निशाचरेणापि मृतो न सोऽपि। अनेकशः सन्ति तवात्र नार्यः को नाम चित्ते क्रियते विषादः॥ ५० विमुच्य शोकं कुरु विक्रमे मतिं धैर्यं समालम्ब्य यक्षराज। भृशं न जल्पन्ति रुदन्ति साधवः पराभवं बाह्यकृतं सहन्ते॥ ५१ कृतं हि कार्यं गुरु दर्शयन्ति सहायवान् वित्तप कातरोऽसि किम्। सहायकार्यं कुरुते हि सम्प्रति स्वयं हि यस्यावरजो विभीषणः॥ ५२ धनद उवाच विभीषणो मे प्रतिपक्षभूतो दायादभावं न विमुञ्चतीति। ध्रुवं प्रसन्ना न भवन्ति दुर्जनाः कृतोपकारा हरिवज्रनिष्ठुराः॥ ५३ न चोपकारैर्न गुणैर्न सौहृदैः प्रसादमायाति मनो हि गोत्रिणः। उवाच वाक्यं स च कण्ठकुब्जो युक्तं त्वयोक्तं च धनाधिनाथ॥ ५४ परस्परं घ्नन्ति च ते विरुद्धा- स्तथापि लोके न पराभवोऽस्ति। पराभवं नान्यकृतं सहन्ते नोष्णं जलं ज्वालयते तृणानि॥ ५५ तस्मात्समागच्छ धनाधिनाथ पार्श्वं च वेगेन विभीषणस्य। स्वबाहुवीर्यार्जितवित्तभोगिनां स्वबन्धुवर्गेषु हि को विरोधः॥ ५६ इत्युक्तः स तदा तेन कण्ठकुब्जेन मन्त्रिणा। विभीषणस्य सामीप्यं जगामाशु विचारयन्॥ ५७ ततो लङ्काधिपः श्रुत्वा बान्धवं पूर्वजं तदा। प्राप्तं प्रत्याजगामाशु विनयेन समन्वितः॥ ५८ ततो विभीषणो दृष्ट्वा तदा दीनं च बान्धवम्। संप्ततमानसो भूप जगादेदं वचो महत्॥ ५९


[हिन्दी अनुवाद]

पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी एकमात्र पत्नी सीताको भी निशाचर रावणने हर लिया था, परंतु श्रीरामचन्द्रजीने प्राण नहीं त्यागा। आपके यहाँ तो अनेक स्त्रियाँ हैं, फिर आप मनमें यह कैसा विषाद ला रहे हैं? यक्षराज! शोक त्यागकर पराक्रममें मन लगाइये; धैर्य धारण कीजिये। साधु पुरुष बहुत बातें नहीं बनाते और न बैठकर रोते ही हैं; वे दूसरोंके द्वारा परोक्षमें किये हुए अपने अपमानको उस समय चुपचाप सह लेते हैं। वित्तपते! महापुरुष समय आनेपर महान् कार्य कर दिखाते हैं। आपके तो अनेक सहायक हैं, आप क्यों कातर हो रहे हैं? इस समय तो आपके छोटे भाई विभीषण स्वयं ही आपकी सहायता कर रहे हैं॥ ४९—५२॥

**कुबेर बोले—**विभीषण तो मेरे विपक्षी ही बने हुए हैं, वे अब भी मेरे साथ कौटुम्बिक विरोधका त्याग नहीं करते। यह निश्चित बात है कि दुर्जन पुरुष उपकार करनेपर भी प्रसन्न नहीं होते, वे इन्द्रके वज्रके सदृश कठोर होते हैं। सगोत्रका मन उपकारोंसे, गुणोंसे अथवा मैत्रीसे भी प्रायः प्रसन्न नहीं होता॥ ५३१/२॥

यह सुनकर कण्ठकुब्जने कहा—'धनाधिनाथ! आपने ठीक कहा है। विरोध होनेपर सगोत्र पुरुष अवश्य ही परस्पर घात-प्रतिघात करते हैं, तथापि लोकमें उनका पराभव नहीं देखा जाता; क्योंकि कुटुम्बीजन दूसरेके द्वारा किये हुए अपने बन्धुजनके अपमानको नहीं सह सकते। जिस प्रकार सूर्यकी किरणोंसे तप्त हुआ जल अपने भीतरके तृणोंको नहीं जलाता, उसी प्रकार दूसरोंसे अपमानित कुटुम्बी जन अपने पार्श्ववर्ती बन्धुओंको नहीं सताते। इसलिये धनाधिप! आप बहुत शीघ्र विभीषणके पास चलिये। जो लोग अपने बाहुबलसे उपार्जित धनका उपभोग करते हैं, उन्हें भाई-बन्धुओंके साथ क्या विरोध हो सकता है'॥ ५४—५६॥

अपने मन्त्री कण्ठकुब्जके इस प्रकार कहनेपर कुबेर मन-ही-मन उसपर विचार करते हुए शीघ्र ही विभीषणके पास गये। लङ्कापति विभीषणने जब अपने ज्येष्ठ भ्राताका आगमन सुना, तब उन्होंने बड़ी विनयके साथ उनकी अगवानी की। राजन्! फिर विभीषणने अपने भाईको जब दीनदशामें देखा, तब उन्होंने मन-ही-मन दुःखी होकर उनसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही॥ ५७—५९॥