संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 286, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६३ ] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २७५
अथागता यक्षपतेः समीपं | इधर, इन्द्र जब चित्रसेनाको लेकर मन्दराचलपर चले नार्योऽनुवव्र्ज्यैव च चित्रसेनाम्। | आये, तब उसकी सङ्गिनी स्त्रियाँ उसे साथ लिये बिना ससम्भ्रमाः सम्भ्रमखिन्नगात्राः | ही यक्षराज कुबेरके समीप वेगपूर्वक आयीं। वे दुस्साहससे सगद्गदं प्रोचुरसाहसज्ञाः ॥ ४१ | अनभिज्ञ थीं, अतः घबराहटके कारण उनके सारे शरीरमें नूनं समाकर्णय यक्षनाथ | व्यथा हो रही थी। वे गद्गद कण्ठसे बोलीं—‘यक्षपते! विमानमारोप्य जगाम कश्चित्। | निश्चय ही आप हमारी यह बात सुनें—आपकी भार्या संवीक्षमाणः ककुभोऽपि कान्तां | चित्रसेनाको किसी अज्ञात पुरुषने पकड़कर विमानपर विगृह्य वेगादिह सोऽपि तस्करः ॥ ४२ | बिठा लिया और चारों ओर सशङ्कदृष्टिसे देखता हुआ वह वचो निशम्याथ धनाधिनाथो | चोर बड़े वेगसे कहीं चला गया है' ॥ ४१-४२ ॥ विषोपमं जातमषीनिभाननः। | विषके समान दुस्सह प्रतीत होनेवाली इस बातको जगाद भूयो न च किंचिदेव | सुननेसे धनाधिप कुबेरका मुँह काला पड़ गया। वे बभूव वै वृक्ष इवाग्निदग्धः ॥ ४३ | अग्निसे जले हुए वृक्षके समान हो गये। उस समय विज्ञापितार्थो वरकन्यकाभि- | उनके मुखसे कोई बात नहीं निकली। इसी समय र्यश्चित्रसेनासहचारिणीभिः । | चित्रसेनाकी सहचरी श्रेष्ठ यक्ष-कन्याओंसे यह समाचार मोहापनोदाय मतिं दधानः | जानकर कुबेरका मन्त्री कण्ठकुब्ज भी अपने स्वामीका स कण्ठकुब्जोऽपि समाजगाम ॥ ४४ | मोह दूर करनेके विचारसे वहाँ आया। उसका आगमन श्रुत्वाऽऽगतं वीक्ष्य स राजराज | सुन राजराज कुबेरने आँखें खोलकर उसकी ओर देखा उन्मीलिताक्षो वचनं जगाद। | और लंबी साँस खींचते हुए अपने चित्तको यथासम्भव विनिःश्वसन् गाढसकम्पगात्रः | शीघ्र सँभालकर वे दीनभावसे बोले। उस समय उनका स्वस्थं मनोऽप्याशु विधाय दीनः ॥ ४५ | शरीर अत्यन्त कम्पित हो रहा था ॥ ४३-४५ ॥ तद्यौवनं यद्युवतीविनोदो | वे कहने लगे—'वही यौवन सफल है, जिससे धनं तु चैतत्स्वजनोपयोगि। | युवतीका मनोरञ्जन हो सके; धन भी वही सार्थक है, तज्जीवितं यत्क्रियते सुधर्म- | जो आत्मीय जनोंके उपयोगमें आ सके। जीवन वह स्तदाधिपत्यं यदि नष्टविग्रहम् ॥ ४६ | सफल है, जिससे सद्धर्म किया जाय और प्रभुत्व वही धिङ्मे धनं जीवितमत्यनल्पं | सार्थक है, जिसमें युद्ध और कलहके मूल नष्ट हो गये राज्यं बृहतसम्प्रति गुह्यकानाम्। | हों। इस समय मेरे इस विपुल धनको, गुह्यकोंके इस विशामि चाग्निं न च वेद कश्चित् | विशाल राज्यको और मेरे इस जीवनको भी धिक्कार पराभवोऽस्तीति च को मृतानाम् ॥ ४७ | है! अभीतक मेरे इस अपमानको कोई नहीं जानता; पार्श्वे स्थितस्यापि च जीवतो मे | अतः इसी समय अग्निमें जल मरूँगा। पीछे यदि इस गता तडागं गिरिजार्चनाय। | समाचारको लोग जान भी लें तो क्या? मृत पुरुषोंका हृता च केनापि वयं न विद्मो | क्या अपमान होगा? हा! वह मानसरोवरके तटपर ध्रुवं न तस्यास्ति भयं च मृत्योः ॥ ४८ | गिरिजा-पूजनके लिये गयी थी। यहाँ निकट ही था और जगाद वाक्यं स च कण्ठकुब्जो | जीवित भी रहा; तो भी किसीने उसे हर लिया। हम मोहापनोदाय विभोः स मन्त्री। | नहीं जानते वह कौन है। मैं समझता हूँ, अवश्य ही उस आकर्ण्यतां नाथ न चास्ति योग्यः | दुष्टको मृत्युका भय नहीं है' ॥ ४६-४८ ॥ कान्तावियोगे निजदेहघातः ॥ ४९ | स्वामीकी यह बात सुनकर उनका मोह दूर | करनेके लिये कुबेरके उस मन्त्री कण्ठकुब्जने | यह वचन कहा—'नाथ! सुनिये, स्त्रीके वियोगमें | शरीर-त्याग करना आपके लिये उचित नहीं है।
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