भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 318 में से

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पृष्ठ 285

२७४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३ सम्मोहिता पुष्पशरेण बाला तब कामदेवद्वारा पुष्पबाणसे मोहित की हुई वह बाला कामेन कामं मदविह्वलाङ्गी। अपने सम्पूर्ण अङ्गमें मदके उद्रेकसे विह्वल हो गयी विहाय पूजां हसते सुरेशं और पूजा छोड़ इन्द्रकी ओर देखकर मुस्काने लगी। कः कामकोदण्डरवं सहेत॥ ३२ भला, कामदेवके धनुषकी टंकार कौन सह सकता विलोलनेत्रे अयि कासि बाले है॥ ३१-३२॥ सुराधिपो वाक्यमिदं जगाद। इन्द्र उसको अपनी ओर निहारते देखकर यह वचन सम्मोहयन्तीव मनांसि पुंसां बोले—'चञ्चल नेत्रोंवाली बाले! तुम कौन हो, जो पुरुषोंके कस्येह कान्ता वद पुण्यभाजः॥ ३३ मनको इस प्रकार मोहे लेती हो? बताओ तो, तुम किस उक्तापि बाला मदविह्वलाङ्गी पुण्यात्माकी पत्नी हो?' इन्द्रके इस प्रकार पूछनेपर उसके रोमाञ्चसंस्वेदसकम्पगात्रा । अङ्ग मदसे विह्वल हो उठे। शरीरमें रोमाञ्च, स्वेद और कृताकुला कामशिलीमुखेन कम्प होने लगे। वह कामबाणसे व्याकुल हो गद्गद- सगद्गदं वाक्यमुवाच मन्दम्॥ ३४ कण्ठसे धीरे-धीरे इस प्रकार बोली—'नाथ! मैं धनाधिप कान्ता धनेशस्य च यक्षकन्या कुबेरकी पत्नी एक यक्षकन्या हूँ। पार्वतीजीके चरणोंकी प्राप्ता च गौरीचरणार्चनाय। पूजा करनेके लिये यहाँ आयी थी। आप अपना कार्य प्रब्रूहि कार्यं च तवास्ति नाथ बताइये; आप कौन हैं? जो साक्षात् कामदेवके समान रूप कस्त्वं वदेतिष्ठसि कामरूपः॥ ३५ धारण किये यहाँ खड़े हैं?'॥ ३३—३५॥ इन्द्र उवाच इन्द्र बोले—प्रिये! मैं स्वर्गका राजा इन्द्र हूँ। तुम मेरे सा त्वं समागच्छ भजस्व मां चिरा- पास आओ और मुझे अपनाओ तथा चिरकालतक मेरे न्मदङ्गसङ्गोत्सुकतां व्रजाशु। अङ्ग-सङ्गके लिये शीघ्र ही उत्सुकता धारण करो। देखो, त्वया विना जीवितमप्यनल्पं तुम्हारे बिना मेरा यह जीवन और स्वर्गका विशाल राज्य स्वर्गस्य राज्यं मम निष्फलं स्यात्॥ ३६ भी व्यर्थ हो जायगा॥ ३६॥ उक्ता च सैवं मधुरं च तेन इन्द्रने मधुर वाणीमें जब इस प्रकार कहा, तब उसका कंदर्पसंतापितचारुदेहा । सुन्दर शरीर कामवेदनासे पीडित होने लगा और वह विमानमारुह्य चलत्पताकं फहराती हुई पताकाओंसे सुशोभित विमानपर आरूढ हो सुरेशकण्ठग्रहणं चकार॥ ३७ देवराजके कण्ठसे लग गयी। तब स्वर्गके राजा इन्द्र शीघ्र जगाम शीघ्रं स हि नाकनाथः ही उसके साथ मन्दराचलकी उन कन्दराओंमें चले गये, साकं तया मन्दरकन्दरासु। जहाँका मार्ग देवता और असुर—दोनोंकी ही दृष्टिमें नहीं अदृष्टदेवासुरसंचरासु आया था और जो विचित्र रत्नोंकी प्रभासे प्रकाशित थीं। विचित्ररत्नाङ्कुरभासुरासु ॥ ३८ आश्चर्य है कि देवताओंके राज्यके प्रति आदर न रखते रेमे तया साकमुदारवीर्य- हुए भी वे उदारपराक्रमी इन्द्र उस सुन्दरी यक्ष-बालाके श्चित्रं सुरैश्वर्यगतादरोऽपि। साथ वहाँ रमण करने लगे तथा कामके वशीभूत हो परम स्वयं च यस्या लघुपुष्पशय्यां चतुर इन्द्रने अपने हाथों चित्रसेनाके लिये शीघ्रतापूर्वक चकार चातुर्यनिधिः सकामः॥ ३९ छोटी-सी पुष्पशय्या तैयार की। कामोपभोगमें परम चतुर जातः कृतार्थोऽमरवृन्दनाथः देवराज इन्द्र चित्रसेनाके समागमसे कृतार्थताका अनुभव सकामभोगेषु सदा विदग्धः। करने लगे। स्नेहरससे अत्यन्त मधुर प्रतीत होनेवाला वह मोक्षाधिकं स्नेहरसातिमृष्टं परस्त्रीके आलिङ्गन और समागमका सुख उन्हें मोक्षसे भी पराङ्गनालिङ्गनसङ्गसौख्यम् ॥ ४० बढ़कर जान पड़ा॥ ३७—४०॥ 1113 Narsingpuran_Section_11_1_Back In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

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