संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 284, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६३ ] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २७३ मोक्षोऽमुना यद्यपि मोहनीयो मोक्षेऽपि किं कारणमस्ति राज्ये। क्षेत्रं सुपक्वं परिहृत्य द्वारे किं नाम चारण्यकृषिं करोति ॥ २३ संसारदुःखोपहता नरा ये कर्तुं समर्था न च किंचिदेव। अकर्मिणो भाग्यविवर्जिताश्च वाञ्छन्ति ते मोक्षपथं विमूढाः ॥ २४ एतद्विमृश्य बहुधा मतिमान् प्रवीरो रूपेण मोहितमना धनदाङ्गनायाः। सर्वाधिराकुलमतिः परिमुक्तधैर्यः सस्मार मारममराधिपचक्रवर्ती ॥ २५ समागतोऽसौ परिमन्दमन्दं कामोऽतिकामाकुलचित्तवृत्तिः । पुरा महेशेन कृताङ्गनाशो धैर्याल्लयं गच्छति को विशङ्कः ॥ २६ आदिश्यतां नाथ यदस्ति कार्यं को नाम ते सम्प्रति शत्रुभूतः। शीघ्रं समादेशय मा विलम्बं तस्यापदं सम्प्रति भो दिशामि ॥ २७ श्रुत्वा तदा तस्य वचोऽभिरामं मनोगतं तत्परमं तुतोष। निष्पन्नमर्थं सहसैव मत्वा जगाद वाक्यं स विहस्य वीरः ॥ २८ रुद्रोऽपि येनार्धशरीरमात्र- श्चक्रेऽप्यनङ्गत्वमुपागतेन । सोढुं समर्थोऽथ परोऽपि लोके को नाम ते मार शराभिघातम् ॥ २९ एकाग्रचित्ता गिरिजार्चनेऽपि या मोहयत्येव ममात्र चित्तम्। एतामनङ्गायतलोचनाख्यां मदङ्गसङ्गैकरसां विधेहि ॥ ३० स एवमुक्तः सुरवल्लभेन स्वकार्यभावाधिकगौरवेण । संधाय बाणं कुसुमायुधोऽपि सस्मार मारः परिमोहनं सुधीः ॥ ३१ मोक्ष-सुख तो इस राज्य-भोगद्वारा मोह लिया जा सकता है, परंतु क्या मोक्ष भी राज्य-प्राप्तिका कारण हो सकता है? भला, अपने द्वारपर पके अन्नसे युक्त खेतको छोड़कर कोई जंगलमें खेती करने क्यों जायगा? जो सांसारिक दुःखसे मारे-मारे फिरते हैं और कुछ भी करनेकी शक्ति नहीं रखते, वे ही अकर्मण्य, भाग्यहीन एवं मूढजन मोक्षमार्गकी इच्छा करते हैं' ॥ १८-२४॥ इन सब बातोंपर बारंबार विचार करके देवेश्वरोंके चक्रवर्ती सम्राट् बुद्धिमान् वीरवर इन्द्र कुबेरपत्नी चित्रसेनाके रूपपर मोहित हो गये। समस्त मानसिक वेदनाओंसे व्याकुल हो, धैर्य खोकर वे कामदेवका स्मरण करने लगे। इन्द्रके स्मरण करनेपर अत्यन्त कामनाओंसे व्याप्त चित्तवृत्तिवाला कामदेव बहुत धीरे- धीरे डरता हुआ वहाँ आया; क्योंकि वहीं पूर्वकालमें शंकरजीने उसके शरीरको जलाकर भस्म कर दिया था। क्यों न हो, प्राणसंकटके स्थानपर धीरतापूर्वक और निर्भय होकर कौन जा सकता है? कामदेवने आकर कहा-'नाथ! मुझसे जो कार्य लेना हो, आज्ञा कीजिये; बताइये तो सही, इस समय कौन आपका शत्रु बना हुआ है? शीघ्र बताइये, विलम्ब न कीजिये; मैं अभी उसे आपत्तिमें डालता हूँ' ॥ २५-२७॥ उस समय कामदेवके उस मनोभिराम वचनको सुनकर मन-ही-मन उसपर विचार करके इन्द्र बहुत संतुष्ट हुए। अपने मनोरथको सहसा सिद्ध होते जान वीरवर इन्द्रने हँसकर कहा-'कामदेव ! अनङ्ग बन जानेपर भी तुमने जब शंकरजीको भी आधे शरीरका बना दिया, तब संसारमें दूसरा कौन तुम्हारे उस शराघातको सह सकता है? अनङ्ग! जो गिरिजापूजनमें एकाग्रचित्त होनेपर भी मेरे मनको निश्चय ही मोहे लेती है, उस विशाल नयनोंवाली सुन्दरीको तुम एकमात्र मेरे अङ्ग-सङ्गकी सरस भावनासे युक्त कर दो' ॥ २८-३०॥ अपने कार्यको अधिक महत्त्व देनेवाले सुरराज इन्द्रके यों कहनेपर उत्तम बुद्धिवाले कामदेवने भी अपने पुष्पमय धनुषपर बाण रखकर मोहन-मन्त्रका स्मरण किया।