भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 318 में से

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पृष्ठ 283

२७२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३ राज्यस्य सारं विषयेषु भोगो | पुरुषोंकी दृष्टिमें स्वर्गका राज्य कुछ भी महत्त्व नहीं भोगस्य चान्ते न च किंचिदस्ति। | रखता। राज्यका सार है—विषयोंका भोग तथा भोगके विमृश्य चैतन्मुनयोऽप्यजस्रं | अन्तमें कुछ भी नहीं रह जाता। यही सोचकर मुनिगण मोक्षाधिकारं परिचिन्तयन्ति ॥ १५ | सदा ही मोक्षाधिकारके विषयमें ही विचार करते हैं। सदैव भोगाय तपःप्रवृत्ति- | लोगोंकी सदा भोगके लिये ही तपमें प्रवृत्ति हुआ करती र्भोगावसाने हि तपो विनष्टम्। | है और भोगके अन्तमें तप नष्ट हो जाता है। परंतु जो मैत्र्यादिसंयोगपराङ्मुखानां | लोग मैत्री आदिके द्वारा विषय-सम्पर्कसे विमुख हो गये विमुक्तिभाजां न तपो न भोगः ॥ १६ | हैं, उन मोक्षभागी पुरुषोंको न तपकी आवश्यकता होती विमृश्य चैतत् स सुराधिनाथो | है न योगकी।' इन सब बातोंका विचार करके देवराज विमानमारुह्य सकिङ्किणीकम्। | इन्द्र क्षुद्रघण्टिकाओंकी ध्वनिसे युक्त विमानपर आरूढ़ नूनं हराराधनकारणेन | हो भगवान् शंकरकी आराधनाके लिये कैलासपर्वतपर कैलासमभ्येति विमुक्तिकामः ॥ १७ | चले आये। उस समय उनके मनमें एकमात्र मोक्षकी स एकदा मानसमागतः सन् | कामना रह गयी थी ॥ १३—१७ ॥ संवीक्ष्य तां यक्षपतेश्च कान्ताम्। | कैलासपर रहते समय इन्द्र एक दिन घूमते हुए समर्चयन्तीं गिरिजांघ्रियुग्मं | मानससरोवरके तटपर आये। वहाँ उन्होंने पार्वतीजीके ध्वजामिवानङ्गमहारथस्य ॥ १८ | युगलचरणारविन्दोंका पूजन करती हुई यक्षराज कुबेरकी प्रधानजाम्बूनदशुद्धवर्णां | प्राणवल्लभा चित्रसेनाको देखा। जो कामदेवके महान् कर्णान्तसंलग्नमनोज्ञनेत्राम् । | रथकी ध्वजा-सी जान पड़ती थी। उत्तम 'जाम्बूनद' सुसूक्ष्मवस्त्रान्तरदृश्यगात्रां | नामक सुवर्णके समान उसके अङ्गोंकी दिव्य कान्ति नीहारमध्यादिव चन्द्ररेखाम् ॥ १९ | थी। आँखें बड़ी-बड़ी और मनोहर थीं, जो कानके तां वीक्ष्य वीक्षणसहस्रभरेण कामं | पासतक पहुँच गयी थीं। महीन साड़ीके भीतरसे उसके कामाङ्गमोहितमतिर्न ययौ तदानीम्। | मनोहर अङ्ग इस प्रकार झलक रहे थे, मानो कुहासेके दूराध्वगं स्वगृहमेत्य सुसंचितार्थ- | भीतरसे चन्द्रलेखा दृष्टिगोचर हो रही हो। अपने हजार स्तस्थौ तदा सुरपतिर्विषयाभिलाषी ॥ २० | नेत्रोंसे उस देवीको इच्छानुसार निहारते ही इन्द्रका हृदय पूर्वं वरं स्यात् सुकुलेऽपि जन्म | कामसे मोहित हो गया। उस समय वे दूरके रास्तेपर ततो हि सर्वाङ्गशरीररूपम्। | स्थित अपने आश्रमपर नहीं गये और सम्पूर्ण मनोरथोंको ततो धनं दुर्लभमेव पश्चा- | मनमें लिये देवराज इन्द्र विषयाभिलाषी हो खड़े हो द्धनाधिपत्यं सुकृतेन लभ्यम् ॥ २१ | गये। वे सोचने लगे—'पहले तो उत्तम कुलमें जन्म पा स्वर्गाधिपत्यं च मया प्रलब्धं | जाना ही बहुत बड़ी बात है, उसके बाद सर्वाङ्ग-सौन्दर्य तथापि भोगाय न चास्ति भाग्यम्। | और उसपर भी धन तो सर्वथा ही दुर्लभ है। इन सबके यः स्वं परित्यज्य विमुक्तिकाम- | बाद धनाधिप (कुबेर) होना तो पुण्यसे ही सम्भव है। स्तिष्ठामि मे दुर्मतिरस्ति चित्ते ॥ २२ | मैंने इन सबसे बड़े स्वर्गके आधिपत्यको प्राप्त किया | है, फिर भी मेरे भाग्यमें भोग भोगना नहीं बदा है। | मेरे चित्तमें ऐसी दुर्बुद्धि आ गयी है कि मैं स्वर्गका | सुखभोग छोड़कर यहाँ मुक्तिकी इच्छासे आ पड़ा हूँ। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth