भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 318 में से

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पृष्ठ 68

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अध्याय १४ ] तीर्थसेवन और आराधनासे भगवान्‌की प्रसन्नता ५७


[बायाँ स्तम्भ - मूल संस्कृत श्लोक]

स्नात्वा स गङ्गां यमुनां सरस्वतीं पुण्यां वितस्तामथ गोमतीं च। गयां समासाद्य पितॄन् पितामहान् संतर्पयन् सन् गतवान् महेन्द्रम्॥ ४ तत्रापि कुण्डेषु गिरौ महामतिः स्नात्वा नु दृष्ट्वा भृगुनन्दनोत्तमम्। कृत्वा पितृभ्यस्तु तथैव तृप्तिं व्रजन् वनं पापहरं प्रविष्टः॥ ५ धारां पतन्तीं महतीं शिलोच्चयात् संधार्य भक्त्या त्वनु नारसिंहे। शिरस्यशेषाघविनाशिनीं तदा विशुद्धदेहः स बभूव विप्रः॥ ६ विन्ध्याचले सक्तमनन्तमच्युतं भक्तैर्मुनीन्द्रैरपि पूजितं सदा। आराध्य पुष्पैर्गिरिसम्भवैः शुभै- स्तत्रैव सिद्धिं त्वभिकांक्ष्य संस्थितः॥ ७ स नारसिंहो बहुकालपूजया तुष्टः सुनिद्रागतमाह भक्तम्। अनाश्रमित्वं गृहभङ्गकारणं ह्यतो गृहाणाश्रममुत्तमं द्विज॥ ८ अनाश्रमीति द्विजवेदपारगा- नपि त्वहं नानुगृहामि चात्र। तथापि निष्ठां तव वीक्ष्य सत्तम त्वयि प्रसन्नेन मयेत्युदीरितम्॥ ९ तेनैवमुक्तः परमेश्वरेण द्विजोऽपि बुद्ध्या प्रविचिन्त्य वाक्यम्। हरेरलङ्घ्यं नरसिंहमूर्ते- र्बाधं च कृत्वा स यतिर्बभूव॥ १० त्रिदण्डवृक्षाक्षपवित्रपाणि- राप्लुत्य तोये त्वघहारिणि स्थितः। जपन् सदा मन्त्रमपास्तदोषं सावित्रीमिशं हृदये स्मरन् हरिम्॥ ११ यथाकथंचित् प्रतिलभ्य शाकं भैक्ष्याभितुष्टो वनवासवासी। अभ्यर्च्य विष्णुं नरसिंहमूर्तिं ध्यात्वा च नित्यं हृदि शुद्धमाद्यम्॥ १२


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]

जीवननिर्वाह करने और जप, स्नान आदि उत्तम कर्ममें तत्पर रहने लगा। गङ्गा, यमुना, सरस्वती, पावन वितस्ता (झेलम) और गोमती आदिमें स्नान करके वह गयामें पहुँचा और वहाँ अपने पिता-पितामह आदिका तर्पण करके महेन्द्र पर्वतपर गया। वहाँ उस परम बुद्धिमान् द्विजने पर्वतीय कुण्डोंमें स्नान करनेके पश्चात् ऋषिश्रेष्ठ भृगुनन्दन परशुरामजीका दर्शन किया; फिर पूर्ववत् पितरोंके लिये तर्पण करके चलते-चलते एक वनमें प्रवेश किया, जो पापोंका नाश करनेवाला था॥ २—५॥

वहाँ एक पर्वतसे बहुत बड़ी धारा गिरती थी, जो निश्शेष पापराशिका विनाश करनेवाली थी। उसके जलको लेकर ब्राह्मणने भक्तिपूर्वक भगवान् नृसिंहके मस्तकपर चढ़ाया। इससे उसी समय उसका शरीर विशुद्ध हो गया। फिर विन्ध्याचल पर्वतपर स्थित होकर भक्तों और मुनीश्वरोंसे सदा पूजित होनेवाले अनन्त अच्युत भगवान् विष्णुकी सुन्दर पर्वतीय पुष्पोंसे पूजा करता हुआ वह ब्राह्मण सिद्धिकी कामनासे वहीं ठहर गया॥ ६-७॥

इस तरह दीर्घकालतक उसने पूजा की। उससे प्रसन्न होकर वे भगवान् नृसिंह गाढ़ निद्रामें सोये हुए अपने उस भक्तसे स्वप्नमें दर्शन देकर बोले—‘ब्रह्मन्! किसी आश्रमधर्मको स्वीकार करके न चलना गृहस्थकी मर्यादाके भङ्गका कारण होता है; अतः यदि तुम्हें गृहस्थ नहीं रहना है तो किसी दूसरे उत्तम आश्रमको ग्रहण करो। ब्रह्मन्! जो किसी आश्रममें स्थित नहीं है, वह यदि वेदोंका पारगामी विद्वान् हो, तो भी मैं यहाँ उसपर अनुग्रह नहीं करता; परंतु साधुवर! तुम्हारी निष्ठा देखकर मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, इसीसे मैंने तुमसे यह बात कही है'॥ ८-९॥

उन परमेश्वरके इस प्रकार कहनेपर उस ब्राह्मणने भी अपनी बुद्धिसे नृसिंहस्वरूप श्रीहरिके उस कथनपर विचार करके उसे अलङ्घनीय माना और सम्पूर्ण जगत्‌का बाध (त्याग) करके वह संन्यासी हो गया॥ १०॥

फिर प्रतिदिन उस पापहारी जलमें डुबकी लगाकर तथा उसीमें खड़ा रहकर त्रिदण्ड और अक्षमाला धारण करनेसे पवित्र हाथोंवाला वह ब्राह्मण मन-ही-मन भगवान् विष्णुका स्मरण करता हुआ निर्दोष गायत्री-मन्त्रका जप करने लगा। नित्यप्रति शुद्ध आदिदेव भगवान् विष्णुका हृदयमें ध्यान करके उनके नृसिंह-विग्रहका पूजन करता


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