नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआन्वीक्षिकीसमुद्देशः २६ शरीर का स्वरूप— भोगायतनं शरीरम् ॥ ३१ ॥ भले-बुरे भोगों का घर ही शरीर है। लोकायतिक का लक्षण— ऐहिकव्यवहारप्रसाधनपरं लोकायतिकम् ॥ ३२ ॥ यह लोक ही सब कुछ है, ऐसा मानकर समस्त व्यवहारों में प्रवृत्त कराने वाला दर्शन लोकायतिक अथवा नास्तिक दर्शन है। राजा को लोकायत जानना श्रेयस्कर है— लोकायतज्ञो हि राजा राष्ट्रकण्टकानुच्छेदयति ॥ ३३ ॥ लोकायत अर्थात् नास्तिक दर्शन को जाननेवाला राजा राष्ट्र की बुराइयों को नष्ट कर देता है। कोई क्रिया सर्वथा निर्दोष नहीं है— न खल्वेकान्ततो यतीनामप्यनवद्यास्ति क्रिया ॥ ३४ ॥ सन्न्यासियों के भी कर्म-सत्य अहिंसा आदि सर्वथा निर्दोष नहीं होते। अत्यन्त दयालुता के दोष— एकान्तेन कारुण्यपरः करतलगतमप्यर्थं रक्षितुं न क्षमः ॥ ३५ ॥ केवल करुणा में तत्पर मनुष्य अर्थात् अत्यन्त दयालु हथेली में भी रखे हुए अर्थ की रक्षा नहीं कर सकता। प्रशमैकचित्तं को नाम न परिभवति ॥ ३६ ॥ सर्वथा शान्त चित्त रहने वाले मनुष्य का कौन नहीं अनादर करता। अपराधी को दण्ड देना राजा का कर्त्तव्य है— अपराधकारिषु प्रशमो यतीनां भूषणं न महीपतीनाम् ॥ ३७ ॥ अपराध करने वाले को दण्डित न करना सन्न्यासियों को ही शोभा दे सकता है राजा को नहीं। परिणाम शून्य क्रोध और कृपा व्यर्थ है— धिक् तं पुरुषं यस्यात्मशक्त्या नस्तः कोपप्रसादौ ॥ ३८ ॥ जो पुरुष अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध और प्रसन्नता न प्रदर्शित कर सके वह धिक्कार के योग्य है। विशेषार्थ—जिसके क्रोध से न कोई डर हो और प्रसन्नता से न कोई लाभ ही हो वह पुरुष निन्दनीय है। जीवित मृत का लक्षण— स जीवन्नपि मृत एव यो न विक्रामति प्रतिकूलेषु ॥ ३९ ॥ वह पुरुष जीते हुए भी मरा है जो अपने विरुद्ध आचरण करने वालों पर किसी प्रकार के पराक्रम का प्रदर्शन न कर सके।