न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 311, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें३८ सू० ] सर्वशून्यतानिराकरणप्रकरणम् २९३ भाव इति भावप्रतिषेधः प्रतिज्ञा, भावेष्वितरेतराभावसिद्धेरिति हेतुः, भावेष्वि- तरेतराभावमनुज्ञायाश्रित्य चेतरेतराभावसिद्ध्या सर्वमभाव इत्युच्यते। यदि सर्वमभावः ? भावेष्वितरेतराभावसिद्धेरिति नोपपद्यते। अथ भावेष्वितरेतरा- भावसिद्धिः ? सर्वमभाव इति नोपपद्यते। सूत्रेण चाभिसम्बन्धः— न, स्वभावसिद्धेर्भावानाम् ॥ ३८ ॥ न सर्वमभावः। कस्मात् ? स्वेन भावेन सद्भावाद् भावानाम्। स्वेन धर्मेण भावा भवन्तीति प्रतिज्ञायते। कश्च स्वो धर्मो भावानाम् ? द्रव्यगुणकर्मणां सदादिसामान्यम्, द्रव्याणां क्रियावदित्येवमादिर्विशेषः, 'स्पर्शपर्यन्ताः पृथिव्याः' इति च प्रत्येकं चानन्तो भेदः। सामान्यविशेषसमवायानां च विशिष्टा धर्मा गृह्यन्ते। सोऽयमभावस्य निरुपाख्यत्वात् सम्प्रत्ययाकोऽर्थभेदो न स्यात् ? अस्ति त्वयम्, तस्मान्न सर्वमभाव इति। अथ वा—न स्वभावसिद्धेर्भावानामिति। स्वरूपसिद्धेरिति-गौरिति प्रयु- ज्यमाने शब्दे जातिविशिष्टं द्रव्यं गृह्यते, नाभावमात्रम्। यदि च सर्वमभावः, में भी परस्पर विरोध है। 'सब कुछ अभाव हैं'—यह भावनिषेधक प्रतिज्ञावाक्य है, 'भावों में इतरेतराभाव सिद्धि होने से'—यह हेतुवाक्य है, भावों में इतरेतराभाव को स्वीकार करके, तथा उसका आश्रय लेकर इतरेतराभावसिद्धि द्वारा 'सब कुछ अभाव हैं'— ऐसा कहते हैं। यदि सब कुछ अभाव है तो भाव कहाँ रह गये कि उनमें 'इतरेतराभाव- सिद्धि' उपपन्न की जा सके। यदि भाव में इतरेतराभावसिद्धि कर रहे हैं तो 'सब कुछ अभाव है' यह प्रतिज्ञा नहीं बनेगी। भाष्यकार सूत्र के साथ भाष्योक्त दूषण का सम्बन्ध जोड़ते हैं— भावों की स्वभावसिद्धि होने से (सब भाव अभाव नहीं है) ॥ ३८ ॥ सब कुछ अभाव नहीं हैं; क्योंकि भावों की अपने-अपने भाव से सत्ता है। 'भाव अपने धर्म से वर्तमान हैं' यह सिद्धान्ती का प्रतिज्ञावाक्य है। इन भावों का स्वधर्म क्या है ? द्रव्य, गुण, कर्म का सत्त्वाभिधेयत्व, प्रमेयत्वादि सामान्य धर्म है; क्रियावत्त्व, गुणा- श्रयत्व आदि विशेष धर्म हैं। इसी तरह 'पृथ्वी के स्पर्शपर्यन्त गुण हैं' आदि विशेष धर्म नाना प्रकार के हैं। सामान्य, विशेष तथा समवाय के विशेष धर्म ही गृहीत होते हैं। इस प्रकार अभाव के निरुपाख्य (निर्धर्मक) होने से उसका सम्प्रत्ययाक (सर्वजनप्रत्यक्षसिद्ध) अर्थभेद नहीं होगा, जबकि ऐसा होता है; अतः 'सब कुछ अभाव हैं' ऐसा नहीं है। अथवा सूत्र का व्याख्यान यों समझें—भावों की स्वभाव ( स्वरूप ) सिद्धि होने से सब कुछ अभाव नहीं है; 'गौ' इस शब्द का प्रयोग होने पर जातिविशिष्ट द्रव्य गृहीत होता है, केवल अभाव नहीं। यदि सब कुछ अभाव होता तो 'गौ' इस पद से अभाव ही