भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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२९२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० सर्वशून्यतानिराकरणप्रकरणम् [ ३७-४० ] अयमपर एकान्तः— सर्वमभावो भावेष्वितरेतराभावसिद्धेः ? ॥ ३७ ॥ यावद्भावजातं तत् सर्वमभावः । कस्मात् ? भावेष्वितरेतराभावसिद्धेः । असन् गौरश्वात्मनाऽनश्वो गौः, असन्नश्वो गवात्मनाऽगौरश्व इत्यसत्प्रत्ययस्य प्रतिषेधस्य च भावशब्देन सामानाधिकरण्यात् सर्वमभाव इति ? ॥ ३७ ॥ प्रतिज्ञावाक्ये पदयोः प्रतिज्ञाहैत्वोश्च व्याघातादयुक्तम् । अनेकस्याशेषता सर्वशब्दस्यार्थः, भावप्रतिषेधश्चाभावशब्दस्यार्थः । पूर्वं सोपाख्यम्, उत्तरं निरुपाख्यम् । तत्र समुपाख्यायमानं कथं निरुपाख्यमभावः स्यादिति । न जात्वभावो निरुपाख्योऽनेकत्याऽशेषतया शक्यः प्रतिज्ञातुमिति ! सर्वमेतदभाव इति चेत् ? यदिदं सर्वमिति मन्यसे तदभाव इति ? एवं चेत् अनिवृत्तो व्याघातः, अनेकमशेषं चेति नाभावप्रत्ययेन शक्यं भवितुम् । अस्ति चायं प्रत्ययः सर्वमिति तस्मान्नाभाव इति । प्रतिज्ञाहैत्वोश्च व्याघातः । सर्वम- [ अब बौद्धाभिमत सर्वशून्यतावाद का शङ्कासमाधानपूर्वक निराकरण कर रहे हैं—] कुछ अन्य दार्शनिकों का यह मत है— यह सब कुछ सत्पदार्थ अभावरूप है; क्योंकि भावों में इतरेतरापेक्षया अभाव ही सिद्ध होता है ॥ ३७ ॥ जो कुछ भी दृश्यमान सत्पदार्थ है वह सब अभाव है; क्योंकि उन भावों में दूसरे की अभावसिद्धि देखी जाती है । जैसे—गौ अश्वरूप से नहीं है, अतः उसे 'अनश्व' कह सकते हैं; उसी तरह गोरूप से अश्व नहीं है तो उसे 'अगौ' कह सकते हैं—इस तरह असद् ज्ञान तथा प्रतिषेध का भावशब्द से सामानाधिकरण्य होने के कारण हम यह क्यों न मान लें—'ये सब संज्ञाशब्द असद्विषय हैं, 'अंसत्प्रत्यय तथा प्रतिषेध का सामानाधि- करण्य होने के कारण; अनुत्पन्न प्रध्वस्त घट की तरह' ? ॥ ३७ ॥ प्रतिज्ञावाक्य में 'सर्व'-'अभाव' इन पदों और प्रतिज्ञा तथा हेतु दोनों के विरुद्ध होने से उक्त मत असमीचीन ही है । यहाँ 'सर्व' शब्द का अर्थ है अनेक की अशेषता, तथा 'अभाव' का अर्थ है भाव- प्रतिषेध । इनमें पहला ( सर्वशब्द ) सोपाख्य ( कुछ न कुछ स्वभाव वाला ) है, तथा दूसरा (अभाव शब्द) निरुपाख्य (निःस्वभाव) है। तो कुछ न कुछ स्वभाव वाला निःस्वभाव कैसे होगा ? आप निःस्वभाव को अनेकत्व तथा अशेषत्व से किसी भी तरह प्रतिज्ञात नहीं कर सकते ! यदि यह कहें कि यह 'सव कुछ' अभाव ही है ? तो जिसको आप 'सव' मानते हैं वही अभाव है ? तब भी उपर्युक्त विरोध पूर्ववत् बना रह गया; क्योंकि 'अनेक' तथा 'अशेष' अभावप्रत्यय से कैसे प्रतिज्ञात हो सकते हैं ! प्रतिज्ञा तथा हेतुओं