भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 410 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 309

३६. सू० ] सर्वपृथक्त्वनिराकरणप्रकरणम् २९१ लक्षणव्यवस्थानादेवाप्रतिषेधः ॥ ३६ ॥ न कश्चिदेको भाव इत्युक्तः प्रतिषेधः । कस्मात् ? लक्षणव्यवस्थानादेव । यदिह लक्षणं भावस्य संज्ञाशब्दभृतं तदेकस्मिन् व्यवस्थितम्—'यं कुम्भमद्राक्षं तं स्पृशामि, यमेवास्प्राक्षं तं पश्यामि' इति। नाणुसमूहो गृह्यते इति, अणुसमूहे चागृह्यमाणे यद् गृह्यते तदेकमेवेति । अथाप्येतदनूक्तम्-नास्त्येको भावो यस्मात् समुदायः ? एकानुपपत्तेर्नास्त्येव समूहः । नास्त्येको भावो यस्मात् समूहे भावशब्दप्रयोगः ? एकस्य चानुपपत्तेः समूहो नोपपद्यते-एकसमुच्चयो हि समूह इति । व्याहृतत्त्वादनुपपन्नम्—'नास्त्येको भावः' इति । यस्य प्रतिषेधः प्रतिज्ञायते 'समूहे भावशब्दप्रयोगात्' इति हेतुं ब्रुवता, स एवाभ्यनुज्ञायते—'एकसमुच्चयो हि समूहः' इति । 'समूहे भावशब्द- प्रयोगात्' इति च समूहमाश्रित्य प्रत्येकं समूहिप्रतिषेधः—'नास्त्येको भावः' इति । सोऽयमुभयतो व्याघाताद् यत्किञ्चन वाद इति ॥ ३६ ॥ एक अवयवी का प्रतिषेध लक्षणव्यवस्था से भी नहीं बनता ॥ ३६ ॥ पृथक् रूप में स्थित पदार्थ का 'कोई एक अवयवी नहीं है'—यह प्रतिषेध अयुक्त है; क्योंकि लक्षण (संज्ञा) की व्यवस्था देखी जाती है। यहाँ जो भाव का संज्ञाशब्दभूत लक्षण है, वह एक-एक में व्यवस्थित है, जैसे—'जिस घट को मैंने देखा था उसे मैं अब छू पा रहा हूँ; या 'जिस घट का मैंने स्पर्श किया था उसे ही अब देख पा रहा हूँ'—इन वाक्यों में अवयवों (अणुसमूह) की अपेक्षा से बहुवचन का प्रयोग न कर एक अवयवी का प्रयोग सर्वजनानुभवसिद्ध है; क्योंकि अणुसमूह गृहीत होता ही नहीं। तथा जो गृहीत होता है, वह एक ही अवयवी है। यदि पूर्वपक्षी अपनी बात को इस तरह रखे कि—कोई एक अवयवी नहीं है, अपितु वह अवयवी वस्तुतः अवयवों का समुदायमात्र है ? उनका यह कथन भी अयुक्त है; क्योंकि समुदाय भी अनेकसमुदायी, जो कि अपने आप में प्रत्येक भिन्न-भिन्न हैं, से ही बनेगा; अन्यथा यदि एक न मानोगे तो उन एक-एक भिन्नों से बनने वाला समुदाय कैसे बनेगा ! यदि पूर्वपक्षी यह कहे—कोई एक अवयवी नहीं है; क्योंकि वह अवयविसंज्ञा समूह को ही बतला रही है ? यह बात भी पहले वाली जैसी है; क्योंकि यदि एक की उपपत्ति न होगी तो उससे बनने वाले समूह की उपपत्ति कैसे होगी ! दूसरे, 'एक अव- यवी नहीं है'—इसमें वदतोव्याघात दोष भी है। समूह में संज्ञाशब्द के प्रयोग का हेतु देकर जिसका प्रतिषेध किया जा रहा है उसी को 'भिन्न प्रत्येक अवयवों का ही वह समूह है'—ऐसा कहकर स्वीकार भी कर रहे हैं। उधर, 'समूह में संज्ञाशब्द का प्रयोग होने से' हेतु देकर समूह के सहारे समूहगत प्रत्येक समूही का प्रतिषेध कर-के इस प्रतिज्ञा का भी भङ्ग कर रहे हैं कि 'एक भाव नहीं होता'। यों, उक्त व्याघातद्वय से यह वाद निःसार ही है ॥ ३६ ॥

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित) · पृष्ठ 309, कुल 410 में से · BharatKosha