न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२९० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० सति नैते दोषाः । तस्माद्यदुक्तम्-'प्रागप्युपजनादस्ति निवृतं चास्ति', तद- युक्तमिति ॥ ३३ ॥ सर्वपृथक्त्वनिराकरणप्रकरणम् [ ३४-३६ ] अयमन्य एकान्तः— सर्वं पृथग्; भावलक्षणपृथक्त्वात् ? ॥ ३४ ॥ सर्वं नाना, न कश्चिदेको भावो विद्यते । कस्मात् ? भावलक्षणपृथक्त्वात् । भावस्य लक्षणम् = अभिधानम्, येन लक्ष्यते भावः स समाख्याशब्दः; तस्य पृथग्विषयत्वात् । सर्वो भावसमाख्याशब्दः समूहवाची, 'कुम्भः' इति संज्ञाशब्दो गन्धरसरूपस्पर्शसमूहे बुध्नपार्श्वग्रीवादिसमूहे च वर्त्तते, निर्देशमात्रं चेदमिति ? ॥ ३४ ॥ न; अनेकलक्षणैरेकभावनिष्पत्तेः ॥ ३५ ॥ अनेकविधलक्षणैरिति मध्यमपदलोपी समासः । गन्धादिभिश्च गुणैर्बुध्ना- दिभिश्चावयवैः सम्बद्ध एको भावो निष्पद्यते, गुणव्यतिरिक्तं च द्रव्यम्, अवयवा- तिरिक्तश्चावयवीति । विभक्तन्यायं चैतदुभयमिति ॥ ३५ ॥ अथापि— कहलाता है; ऐसा मानने पर उपर्युक्त सभी व्यवस्थायें बन सकती हैं। अतः यह 'उत्पत्ति से पूर्व तथा विनाश के बाद भी धर्मी वही है'—कहना अयुक्त ही है ॥ ३३ ॥ कुछ दार्शनिक (बौद्ध) यह कहते हैं— प्रत्येक पदार्थ पृथक् हैं; क्योंकि भाव के लक्षण (गन्ध-रस-रूपादि) पृथक् पृथक् हैं ? ॥ ३४ ॥ सब पदार्थ नाना हैं, कोई भी भाव नाम की एक वस्तु नहीं है, क्यों ? भावलक्षणों के पार्थक्य से । भाव का अर्थ है संज्ञा । यह भाव जिससे बोधित किया जाये वह संज्ञा समूह (अवयवी) को ही बतलाती है। जैसे 'कुम्भ' यह संज्ञाशब्द गन्ध-रस-रूप-स्पर्श के समूह को तथा अधस्तल-पार्श्वभाग-ग्रीवादि अवयवसमूह को लक्षित करता है। यह एक उदाहरण दे दिया गया। (तात्पर्य यह है कि अनेकवाची कोई पद नहीं है, अपि तु सब तत्तद्व्यक्तिवाचक है ? ) ॥ ३४ ॥ अनेक प्रकार के लक्षणों के रहते एक भाव निष्पन्न नहीं हो सकता ॥ ३५ ॥ 'अनेकलक्षणैः' पद का मध्यमपदलोपी समास से 'अनेकविध लक्षणों से'—यह अर्थ है । गन्धादि गुण तथा अधस्तलादि अवयवों से एक घट-रूप अवयवी पृथक् निष्पन्न होता है ! अतः द्रव्य गुणों से भिन्न, तथा अवयवी अवयवों से भिन्न होता है—ये दोनों बातें हम पीछे (२. १. ३३ में) अनेक हेतुओं द्वारा स्पष्टतः सिद्ध कर चुके हैं ॥ ३५ ॥ अपि च— CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri