भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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विचार यह सब साधारणतः सब लोग कर रहे थे। किसी किसी व्यक्ति विशेष का विचार कुछ भिन्न भी होगा पर उस पर कोई भी प्रकाश या उसका प्रकटीकरण जनसाधारण में, सब जन के सम्मुख सर्वसाधारण रूप से न था। प्रकाश तो उस विचार, भावना का तब हुआ जब उसने कहा? वह जिस समय उठा, उसने जो जो कहा वह सब केवल विचार ही नहीं अपितु वह विश्वास था जो जन जन तक पहुँच रहा था। उसने, अपनी वाणी से कहा, उसके कथन का जो सार, जिस भाव अथवा भावना को उसने स्पष्ट किया वह केवल एक ऐसा विषय नहीं था जिस पर केवल तर्क ही रह कर उस पर आगे विचार किया जा सके अथवा यह कहा जाय, कि उसने केवल एक स्थिति को स्पष्ट भर किया था जो सबको मान्य हो सकती थी वा न भी। उसका विचार तो ऐसा था, जिसका न तो जन जन को ज्ञान था अथवा जो भी ज्ञान था वह अधूरा, अपूर्ण ज्ञान था, वह ज्ञान केवल एक व्यक्ति के लिए नहीं समस्त जनसाधारण के ही लिए नहीं था वरन् उसके आगे आगे, उस समाज लिए, उस व्यक्ति के लिए, जो आज तक अपने को जन, जन जन नहीं बल्कि जनसाधारण मान कर चल रहा था और यही मान कर अपने जीवन व्यतीत कर रहा था। जो वह सब कहना चाहता था वह एक ऐसी बात कही जो सब मनुष्य सुन रहे थे उसने कहा कि जो कुछ मनुष्य को आज तक अपने इस संसार में मिला है वह उसकी आवश्यकता स्वरूप ही सब कुछ मिला । कोई व्यक्ति पूछेगा क्यों? इसलिए कि जो भी ज्ञान या जो भी अन्य वस्तु उसको प्राप्त हुई प्रकृति अथवा ईश्वर से, उसने उसी को; जो केवल एक सीमित रूप था, उसी समझा था; जो केवल एक संकेत था, उसी को समझा; जो केवल एक पथ, जिसे आगे बढ़ना समझना था उसी को उसने अपना एक स्थान समझ कर उसी पर विश्राम कर उस विश्राम को ही सब कुछ मान लिया। जब वह विश्राम को ही सब कुछ मानने लगा तो फिर स्वाभाविक है कि न तो वह आगे बढ़ सकता, अपनी इस गति अथवा प्रगति को रोक बैठना स्वाभाविक ही था, ऐसा स्थिति का परिणाम केवल यह ही नहीं हो सकता कि उसकी वह गति केवल धीमी हो जाय? केवल यह ही नहीं वरन् वह उस स्थिति से गिरता हुआ नीचे की ओर गिर न जाय, यह स्वतः ही ज्ञात होने लग पड़ा। क्योंकि गति रुक जाने पर यह तो होता ही है, गति तो या आगे, या तो वह पीछे की ओर ही होगी और यह जो गति उस समय समाज अथवा व्यक्ति सब दिशाओं में जा रही थी वह रुक जाने पर केवल अपनी गति खो ही नहीं बैठा वरन् उसका परिणाम यह हुआ कि उस समाज का, उस मानव का पतन होना ही था। परिणाम यह हुआ कि वह धीरे धीरे सब बातों में पिछड़ता चला गया। केवल... रूप से पतन ही पतन था। उसने कहा कि, केवल पतन होना कोई ऐसा विषय नहीं जो मानव के लिए सब कुछ कह सके कि सब कुछ समाप्त होने पर सब कुछ ही पतन के गर्त अथवा पतन की उस गहराइयों तक ही पहुँच कर उसको छोड़ देगा? क्या इतना ही? वह तो एक विश्वास या भावना थी, जो यह कहती थी, पतन केवल पतन ही, या स्वाभाविक पतन तक पहुँच कर समाप्त होगा, यह सोचना व्यर्थ! यह गलत होगा! यह तो केवल दो चार पग ही आगे बढ़ कर यदि रुक भी जाय तो भी क्या, इस बात से यह सिद्ध--कि मनुष्य समाज आगे बढ़ ही रहा था अथवा आगे ही गया था, स्वाभाविकता से आगे निकलना ही उसका ध्येय था। जब वह यह कहता था तो ऐसा, स्वाभाविकता केवल मनुष्य तक ही सीमित अथवा संकीर्ण नहीं रह सकती, मनुष्य की व्यापकता स्वयं में ही असीम व्यापकता लिए हुए थी। वह इस बात को भली प्रकार जानता था। स्वाभाविकता का अर्थ ही क्या केवल इतना मात्र होगा? कि जो स्थिति या परिस्थिति दी गई, केवल उसी पर सन्तोष किया जाय, उसी दिशा में आगे बढ़ा जाय? क्या मनुष्य केवल अपनी सामान्य परिस्थिति से परे, या भिन्न होकर, अपने लिए कुछ सोच नहीं सकता? क्या वह, इतना समर्थ नहीं? उसमें इतनी क्षमता, स्वाभाविकता सीमित हो जायगी, इसलिए सीमित हो जाय कि वह कुछ सोच न सके? या ऐसा सोच कर ही आगे बढ़ सकेगा? क्या वह, निर्बल हो कर केवल दुर्बल बना रहेगा? क्या यह सब कुछ सही है? यह सब तो वह सोच रहा था, स्वाभाविकता के इस रूप को समझने में सब जन भी इस बात को तो समझ ही रहे थे कि इस प्रकार जीवन व्यतीत करना जिसमें केवल सब कुछ घट रहा हो और जो कुछ मिलता जा रहा हो उसी को सब कुछ मान कर उस पर ही आश्रित रहा जाय केवल यह जीवन सीमित सा अथवा एक बन्धन सा, उस जीवन को कैसे कहा जा सकता था, जो कि जीवन का स्वरूप या रूप था। 17