एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
विचार यह सब साधारणतः सब लोग कर रहे थे। किसी किसी व्यक्ति विशेष का विचार कुछ भिन्न भी होगा पर उस पर कोई भी प्रकाश या उसका प्रकटीकरण जनसाधारण में, सब जन के सम्मुख सर्वसाधारण रूप से न था। प्रकाश तो उस विचार, भावना का तब हुआ जब उसने कहा? वह जिस समय उठा, उसने जो जो कहा वह सब केवल विचार ही नहीं अपितु वह विश्वास था जो जन जन तक पहुँच रहा था। उसने, अपनी वाणी से कहा, उसके कथन का जो सार, जिस भाव अथवा भावना को उसने स्पष्ट किया वह केवल एक ऐसा विषय नहीं था जिस पर केवल तर्क ही रह कर उस पर आगे विचार किया जा सके अथवा यह कहा जाय, कि उसने केवल एक स्थिति को स्पष्ट भर किया था जो सबको मान्य हो सकती थी वा न भी। उसका विचार तो ऐसा था, जिसका न तो जन जन को ज्ञान था अथवा जो भी ज्ञान था वह अधूरा, अपूर्ण ज्ञान था, वह ज्ञान केवल एक व्यक्ति के लिए नहीं समस्त जनसाधारण के ही लिए नहीं था वरन् उसके आगे आगे, उस समाज लिए, उस व्यक्ति के लिए, जो आज तक अपने को जन, जन जन नहीं बल्कि जनसाधारण मान कर चल रहा था और यही मान कर अपने जीवन व्यतीत कर रहा था। जो वह सब कहना चाहता था वह एक ऐसी बात कही जो सब मनुष्य सुन रहे थे उसने कहा कि जो कुछ मनुष्य को आज तक अपने इस संसार में मिला है वह उसकी आवश्यकता स्वरूप ही सब कुछ मिला । कोई व्यक्ति पूछेगा क्यों? इसलिए कि जो भी ज्ञान या जो भी अन्य वस्तु उसको प्राप्त हुई प्रकृति अथवा ईश्वर से, उसने उसी को; जो केवल एक सीमित रूप था, उसी समझा था; जो केवल एक संकेत था, उसी को समझा; जो केवल एक पथ, जिसे आगे बढ़ना समझना था उसी को उसने अपना एक स्थान समझ कर उसी पर विश्राम कर उस विश्राम को ही सब कुछ मान लिया। जब वह विश्राम को ही सब कुछ मानने लगा तो फिर स्वाभाविक है कि न तो वह आगे बढ़ सकता, अपनी इस गति अथवा प्रगति को रोक बैठना स्वाभाविक ही था, ऐसा स्थिति का परिणाम केवल यह ही नहीं हो सकता कि उसकी वह गति केवल धीमी हो जाय? केवल यह ही नहीं वरन् वह उस स्थिति से गिरता हुआ नीचे की ओर गिर न जाय, यह स्वतः ही ज्ञात होने लग पड़ा। क्योंकि गति रुक जाने पर यह तो होता ही है, गति तो या आगे, या तो वह पीछे की ओर ही होगी और यह जो गति उस समय समाज अथवा व्यक्ति सब दिशाओं में जा रही थी वह रुक जाने पर केवल अपनी गति खो ही नहीं बैठा वरन् उसका परिणाम यह हुआ कि उस समाज का, उस मानव का पतन होना ही था। परिणाम यह हुआ कि वह धीरे धीरे सब बातों में पिछड़ता चला गया। केवल... रूप से पतन ही पतन था। उसने कहा कि, केवल पतन होना कोई ऐसा विषय नहीं जो मानव के लिए सब कुछ कह सके कि सब कुछ समाप्त होने पर सब कुछ ही पतन के गर्त अथवा पतन की उस गहराइयों तक ही पहुँच कर उसको छोड़ देगा? क्या इतना ही? वह तो एक विश्वास या भावना थी, जो यह कहती थी, पतन केवल पतन ही, या स्वाभाविक पतन तक पहुँच कर समाप्त होगा, यह सोचना व्यर्थ! यह गलत होगा! यह तो केवल दो चार पग ही आगे बढ़ कर यदि रुक भी जाय तो भी क्या, इस बात से यह सिद्ध--कि मनुष्य समाज आगे बढ़ ही रहा था अथवा आगे ही गया था, स्वाभाविकता से आगे निकलना ही उसका ध्येय था। जब वह यह कहता था तो ऐसा, स्वाभाविकता केवल मनुष्य तक ही सीमित अथवा संकीर्ण नहीं रह सकती, मनुष्य की व्यापकता स्वयं में ही असीम व्यापकता लिए हुए थी। वह इस बात को भली प्रकार जानता था। स्वाभाविकता का अर्थ ही क्या केवल इतना मात्र होगा? कि जो स्थिति या परिस्थिति दी गई, केवल उसी पर सन्तोष किया जाय, उसी दिशा में आगे बढ़ा जाय? क्या मनुष्य केवल अपनी सामान्य परिस्थिति से परे, या भिन्न होकर, अपने लिए कुछ सोच नहीं सकता? क्या वह, इतना समर्थ नहीं? उसमें इतनी क्षमता, स्वाभाविकता सीमित हो जायगी, इसलिए सीमित हो जाय कि वह कुछ सोच न सके? या ऐसा सोच कर ही आगे बढ़ सकेगा? क्या वह, निर्बल हो कर केवल दुर्बल बना रहेगा? क्या यह सब कुछ सही है? यह सब तो वह सोच रहा था, स्वाभाविकता के इस रूप को समझने में सब जन भी इस बात को तो समझ ही रहे थे कि इस प्रकार जीवन व्यतीत करना जिसमें केवल सब कुछ घट रहा हो और जो कुछ मिलता जा रहा हो उसी को सब कुछ मान कर उस पर ही आश्रित रहा जाय केवल यह जीवन सीमित सा अथवा एक बन्धन सा, उस जीवन को कैसे कहा जा सकता था, जो कि जीवन का स्वरूप या रूप था। 17
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षोडश अध्याय
॥ श्री गणेशाय नमः॥ षोडश अध्याय अर्जुन उवाच (तीन गुण) श्लोक 2 अभयं सत्व संशुद्धि ज्ञानं च योगं तथा दाने दमो च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् अहिंसा सत्यम् अक्रोधस्त्यागः शान्तिर पैशुनम् दया भूतेष्वलोलुपत्वं मार्दवं ह्रीरचापलं तेजः क्षमा धृतिः शौचम् अद्रोहो न नाति "मानिता" भवन्ति सम्पदां दैवम् अभिजातस्य भारत श्लोक 3 तेज क्षमा धृति शौच मद्रोहो नाति मानिता भवन्ति संपदन्दैवी मभि जातस्य भारत। दम्भो दर्पो भिमानश्च क्रोध पारुष्यमेव च अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पद मासूरीम्। दैवी सम्पद विमो क्षाय निबन्ध नाया सुरी मता। मा शुचः सम्पदं दैवी म भि जातोसि पाण्डव। द्वौ भूत सर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च। दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थमे शृणु॥ प्रवृत्तं च निवृत्तं "जना" न विदुरासुराः भारत हे अर्जुन डर का न होना मन की पवित्रता हो, यह ज्ञान का अधिकार बना रखने के लिये हो, योग स्थिति अर्थात् एक चित्त से ईश्वर चिन्तन का नाम है, सत मार्ग में या सत पुरुष को अन्न जल वस्त्र आदि से तन सेवा से तन मन धन सब दान करे, इन्द्रिय दमनशील हों मन को विषय से वश में रखे, इन्द्रिय दमनशील नाम मनको वशमें करे, यज्ञ, हवन आदि, विद्या, तप, सत्य से धर्म का पालन करना भगवान के लिये कर्म, निष्काम का नाम यज्ञ है और न किसी को कष्ट देना मन वचन कर्म से किसी प्राणी इत्यादि कर्म के विचार करने योग्य, स्वाध्याय, यज्ञानुसार कर्म का ज्ञान हो वेद विद्या पढे भगवान् नाम स्मरण चित्त में हो, मन वश में रहे ना ललचाये, दया, दान धर्म आदि कर्म सत्य वचन--सत्य आचरण में ही रहे, किसी को बुरा-भल अपमानित शब्द मुख से न बोले, यह सब गुण दैवी हैं आत्मज्ञान प्राप्त पुरुष को नहीं, जो ज्ञान पथ पर चलकर इन को प्राप्त कर लेता उस भगवान् भक्त को, अभ्यास रूप फल प्राप्त होता रहता है जैसे फल वृक्ष को, फल वाले वृक्ष झुककर धरती का सत्कार करते हैं झुक कर ही, फल मीठा होता... । दम्भी पाखण्डी! वेद मार्ग शास्त्र से जो विमुख कर्म करे या बात बनाकर झूठ बोले या छल कपट से कार्य को साधे और अपने आप को बड़ा रूप में दिखाये घमण्ड रूप न माने तो, यह अज्ञानता ही एक महा पाप अज्ञानता ही सब पाप कर्मों की जड मानी गई है यह अज्ञान ही ऐसा रूप धारण कर लेता है मनुष्य का पतन शीघ्रता से कराता ही रहता है। क्रोध सब नाश कर देता इस से ज्ञान का, विचार करने योग्य शक्ति सब मन्द पड जाती है। काम क्रोध लोभ मोह रूपी, असुरी सम्पद् जीव को कभी सुख से जीने नहीं ही यह सब काम क्रोध आदि के वशीभूत जीव रहता है, वह चौरासी लक्ष योनियों में ही भटकता रहता--मनुष्य योनि से भ्रष्ट होकर इन चौरासी लक्ष योनियों में भटकता हुआ जीव अपने कर्मों के अनुसार चलता हुआ कष्ट ही पाता है। यह अविद्या व अज्ञान से ग्रस्त रहता हुआ उस सुख को स्वरूप को प्राप्त नहीं कर पाता, इसी लिये बार बार चौरासी के इस चक्र चक्कर में फंसा रहता, जो ज्ञान मार्ग का ध्यान करते हुए इस पर चलकर जीव अपने स्वरूप को प्राप्त कर के उस सुख धाम को 19
कहना चाहता था केवल इसके लिये कि जो कुछ तुमको दिया गया था उससे तुम सन्तुष्ट नहीं हुवे और जो कुछ तुम को मिलाना था उसकी अपेक्षा कुछ और पाने की इच्छा किये जा रहे थे! तुमने अपने २ कर्मफल को रूप रंग और अपनी शक्ति को परमात्मा द्वारा दिये गये उपहारों को देखकर सन्तोष क्यों नहीं किया? तुम को किसने रोका था? केवल अपनी तृष्णा को छोड़ और किसका दोष बताया जायगा? जो तुम रोते फिरते? इस प्रकार जो जो जीव परमात्मा के नियम के वश होकर जन्म या अन्य दशा को प्राप्त होतेहैं, वे भी जब तक अपनी स्थिति द्वारा कुछ लाभ नहीं उठा लेते तब तक कोई नया सुख नहीं पा सकते और नित्य परिस्थिति का रोना, दुःख का रोना ही रोते रहेंगे। इन उदाहरणों से हम यह परिणाम निकाल सकते हैं, यदि परमात्मा सब को एक समान बना देता और सब को अपनी इच्छानुसार वस्तु मिल सकती तब भी कभी तृप्ति नहीं होती, न सन्तोषजनक समय ही आ कर सुख प्राप्त कराता वरन् जो कुछ मिलता जाता वह सब व्यर्थ होता जाता और नित्य नये रूप रंग व अन्य शक्ति को पाने की भूख बढ़ती ही जाती जिससे केवल अपने २ रूप रंग शक्ति को संवारने में लगे रहने के सिवा और कोई काम, न तो हो सकता न किसी अन्य वस्तु का सुख मिल सकता और न सृष्टि चक्र चलता, न यह भिन्न २ पदार्थ, पशु, पक्षी, मनुष्य, वनस्पति, पाषाण, आदि दिखाई पड़ते केवल प्रकृति का सुन्दर विस्तार, कुरूप, अन्ध, बहरा, अकर्मण्य बनकर रह जाता और अन्ततः किसी अन्य सृष्टि के निर्माण के सिवाय अन्य उपाय न रहता कोई सोच सकताहै कदाचित् ? कि जो जीव रूप रंग बल वैभव को पा चुके हैं वह सब तृप्तहोकर सुख से अपना समय व्यतीत कर रहे होंगे, कदापि न होगा, कोई भी तृप्त न होगा, जिसे अपनी इच्छा द्वारा सब कुछ मिल गया, वह उस नये रूप-रंग को पाकर, तृप्त होने के बदले, और नये रूप, नये बल, नये सुख की खोज में भटकता फिरेगा, यह सोच समझ कर २ रूपी और सर्वज्ञ ईश ने। सब को अपनी अपनी दशा व रूप, रंग बल को देकर सब दशा को भोगने पर्यन्त सुखी अथवा दुःखी न होकर, अपने कार्य को आगे लेजाते रहने की प्रेरणा की या आज्ञा, जिसे सब पूरा करते हुवे संसार को आनन्द से भर रहेहैं अन्यथा सब का सब यह सुन्दर संसार या तो नष्ट हो जाता या निष्प्राण बन जाता या फिर सब जीवों का मन एक रंग या रूप में रहने से उकता कर नया २ परिवर्तन मांगता जो कि इस सृष्टि में न होकर इसे अन्य प्रकार के ही नियम-विधान के आधार पर चलाना। परमात्मा के प्रत्येक कार्य में ही कोई न कोई रहस्य या भेद छुपा हुआ अथवा भरा पड़ा रहता है, जिसे सब जीव; जो अपने आप को समझ का पुत समझते हैं। जो वास्तविक आनन्द-प्रदायक विभूतियों अथवा साधनों को न पा कर केवल काल्पनिक सुख मान कर, किसी वस्तु विशेष को ही सब कुछ मान बैठते हैं अथवा स्वयं अपने को ही सब कुछ मान कर उस परम शक्ति की ओर दृष्टि न फेर कर जब दुःख पाते, तब उस परम पिता को कोसते हैं अथवा भाग्य को कोस कर रोते रहते हैं। ऐसा मान कर भी वे अपनी बुद्धि पर कभी विचार नहीं करते, कि जिस वस्तु, को हम सब कुछ मान रहे थे क्या वह वास्तव में सब कुछ सुख देने वाली हो गई सिद्ध। इस सब का केवल यह कारण कि प्रत्येक को जो कुछ दिया वह कर्मानुसार होने पर भी जीव को अपनी ही कामना द्वारा सब कुछ न मिलने के कारण वह सदा अतृप्त रह कर उस प्रभु कृत सृष्टि को ही दोष देता है अथवा भगवान् को ही दोषी ठहराने लगता है। वह यह नहीं सोचता कि जो कुछ अपने लिये उचित समझ कर दिया है, वह सबप्रकार से उस जीवकेलिए ठीक ही है और जो जो भी मिला अथवा मिल रहा वह सब भी जीव के भले के लिए निर्धारित कर परमात्मा ने दिया है उस सर्वव्यापक? जिसने सब विचार कर व्यवस्थिति करके सब प्रकार जीवोंके हितार्थ ही जो उचित था उस को सब कुछ अधिकार उस जीव विशेष के हाथ में दिया। प्रत्येक जीव अपनी इच्छा के अनुकूल सब को वश में रखना और सब कुछ प्राप्त करने की हर समय चेष्टा करता हुआ अपने आपको सब का कर्ता धर्ता मानकर ही सब को ही दबाए और मन-माने ढंग से व्यवहार करने लगा था जिससे संसार व्यवस्था सब क्षत विक्षत हो कर प्रत्येक प्राणी को ही भारी कष्ट, दुःख 20
इस प्रकार जब हम अनेक जातियों को अपने भीतर समाविष्ट कर लेते हैं तब हमारा राष्ट्र अधिक समर्थ होता पर बात तो यह थी कि यह तो ब्राह्मण द्वारा रचा गया खेल था। उसने स्वयं श्रेष्ठ बनने के लिए जातियों बनाईं जो कि ऐसा कार्य था जो ईश्वर को भी रोष से भर दे। इसलिए उसने उनके लिए एक ऐसे मसीहा को भेजा जो इस विषय पर अपने देश भाईयों को सही शिक्षा दे। स्वामी जी हंस, पर निराशा से सिर हिला दिया। विवस्वान् ने उसे देखा, वे शान्त थे। विवस्वान् फिर बोले... ज्ञान के द्वारा ही तो हम सत्य तक पहुँच सकते हैं। क्या ज्ञान ज्ञान में अंतर हो सकता है? ज्ञान एक दिव्य ज्योति है। यह केवल एक सम्प्रदाय अथवा जाति तक ही सीमित नहीं रहता। प्रत्येक मानव आत्मा ज्ञान का पात्र बन सकती है। ज्ञान ईश्वर की सबसे सुन्दर देन है। क्या ईश्वर? प्रकृति सब मनुष्यों? प्रकृति केवल किसी विशेष जाति को ही ज्ञान देती है। ज्ञान का दीपक तो सब के लिए जलता है। क्या वायु सब के लिए नहीं बहती? क्या सूर्य केवल? अब तक उसने ब्राह्मण को केवल घमंडी और स्वार्थी रूप समझा था। ज्ञानवान् विवस्वान् नम्र थे, विवस्वान् के मुख पर क्रोध का कोई चिह्न न था। विवस्वान् ने कहा तो सब था, किन्तु उनके स्वर में कटुता नहीं थी। क्या ऐसा ब्राह्मण भी हो सकता है, जो ब्राह्मणवाद विरोधी विवस्वान् ने आगे कहा पर बात तो तब बनती जब मैं, या स्वामी जी या अन्य सम्प्रदाय वाले हम सब वे विवस्वान् की-सी भव्य मूर्ति देखते रहे। उसने हाथ जोड़ प्रणाम किया व केवल बोला "ज्ञानियों की वाणी से अज्ञानियों मिटना चाहिये। ज्ञानियों को समझना होगा ज्ञान का दीपक बुझेगा" स्वामी जी आगे बढ़ गये। दिन-रात के संगम काल की इस संध्या वेला को उन्होंने बहुत देखा था, किन्तु आज कुछ विशेष बात "ज्ञानियों को तो केवल उस सर्वशक्तिमान की पूजा करनी चाहिये जो विश्व रक्षक है।" उसने हाथ जोड़ प्रणाम किया व केवल बोला उन्होंने देखा वह विह्वल होकर सिसक पर यह सब, जो हो तो चुका था उस ओर दृष्टि न कर वह आगे की ओर देख रहा था वे सन्यासी की ओर बढ़ रहे थे, पर बात तब भी बनती जब स्वामी जी यह मान लेते कि ज्ञान सब मनुष्यों का, जब केवल ब्राह्मण का ही नहीं सब मानवों का अधिकार है। फिर क्यों ना ज्ञान रूपी दीपक चारों ओर फैल कर, अंधकार को मार, उजाले से संसार को भर दे। उसने भी, पर ज्ञान को अपने तक सीमित रखना ही तो सबसे बड़ा पाप है। ज्ञान रूपी दीपक बुझे; तो केवल यही, कि सम्प्रदाय बने, ना ब्राह्मण बने, ना कोई शूद्र बने, ना क्षत्रिय रहे। उसने ब्राह्मण को केवल एक ही रूप में ही देखा था। क्या ब्राह्मण का कोई रूप और भी हो सकता है, फिर ज्ञान सब मानवों तक कैसे पहुँचे? जो समाज अपने को सर्वश्रेष्ठ समझ बैठा है वह तो ज्ञान का ही नाश कर रहा है। ज्ञान पर तो सबका अधिकार होना चाहिये। विवस्वान् की बात पर सोचता हुआ, वह आगे बढ़ गया। वह सोच रहा उसने कहा मेरा स्थान नहीं ब्राह्मण उसने केवल प्रणाम... । "ज्ञान अन्तः-मन को ही पावन कर देता है।" वह संध्या कालीन बेला थी जब वह आश्रम-द्वार पर पहुँचा था, जब उसने ज्ञान रूपी ज्योति जला कर अपने जीवन को पावन बनाने का निश्चय किया था। स्वामी जी शंख की ध्वनि बजा, संध्या की ओर उन्मुख हुये; अपनी ओर आते हुए उस को देखकर रूक गये, क्या कोई नया भिक्षु? वह स्वामी और शिष्य के मध्य चुप- चाप हो उस ओर बढ़ रहा था, पर, स्वामी जी की दृष्टि ने उसे बांध दिया था। मन ही मन वह नतमस्तक हो गया। स्वामी जी ने देखा वह विह्वल होकर रोया, उसने स्वामी से कहा, कि वह सब कुछ छोड़ ज्ञान की प्राप्ति के लिए आया है। विवस्वान् ने कहा, ज्ञान का द्वार सबके लिए खुला केवल मन निर्मल स्वच्छता की ओर होना चाहिये। स्वामी, जी क्या सन्यासियों द्वारा ही इस मानव समाज भला हो सकता है। क्या घर रह कर मनुष्य ज्ञान की ओर ध्यान दे सकता अथवा मन को एकाग्र कर क्या वह ईश्वर को पहचान सकता है, ज्ञान क्या घर छोड़ना? ज्ञान तो मन का, ज्ञान तो मन की तृष्णा का ही 21
विचारो का मथन्न् प्रारंभ होता ही था, किंतु दो तीन मिनट बीतने पर देखा, उसका चेहरा भी ढीला चेहरा ढीला, उसकी चोंच कुछ शिथिल सी गिर पड़ी नीचे, पंख संकुचित होकर नीचे लटकने लग गये—; नीचे सिर, आँखें बंद, उसकी गर्दन ढीली पड़ कर जमीन पर लेट गयी। उसका सिर ज़रा सा हिला और दम छूँ-छू गया री, बेबस; पल-भर पहले वह, जिसने उड़ान का दम मारा— जिसने सारे वायुमंडल को नाप लिया— केवल दो मिनट? यह विस्मित विचार मन में टकराकर खामोश हो गया। सारा पर्यावरण आश्चर्यचकित स्तब्धता से भर उठा था। एक ओर दो-चार हंस इस प्रकार चोंच नीचे गिराए खड़े रहे और दूसरी ओर कई जल-पक्षी भी मुंह-बंद से बैठे रहे। केवल हवा में तरावट आयी, जिसके दो झोंके लहरों पर से होकर हमारे चेहरों तक पहुँचे— मानों प्रश्न कर रहे हों— क्या? क्या मृत्यु सत्य है? क्या जीवन क्षणभंगुर है? क्या वह हंस संसार छोड़ गया? हमारी आँखों में पश्चाताप की भावना भर उठी। मैंने कहा— पश्चाताप केवल इस बात का था, जिसे हमने सताया था, उसकी हम रक्षा न कर सके। ऐसा लगा, उस हंस रूपी देवता की हम रक्षा न कर सके, जिन्होंने स्वयं अपने प्राणों को त्याग कर हमें बचा लिया—; पर क्या बचा? उस दिन हमारा जो कुछ नष्ट हुआ था वह अब कभी भी नहीं आ सकता था। पर सब कुछ, सब कुछ नष्ट हो गया; वह सब कुछ जो उस चिड़िया के रूप में हम पाए हुए थे। तभी जो हंस, जिसके सिर पर सफेद सी लकीर थी वह आगे बढ़ा और एक ही छलांग में पानी में कूद पड़ा। उसके कूदने से पानी में जो हलचल हुई वह शांत हो गई लेकिन झील के मध्य--में जा कर वह हंस रुक गया। उसकी गर्दन में कुछ मरोड़ सी पैदा हुई और वह जल-पंछी, जो हंसों का मुखिया जान पड़ता था, आगे बढ़ा और पानी में तैरने लगा। बाकी हंस, जो किनारे पर थे सब कुछ देख रहे थे लेकिन सभी अवाक खड़े थे। उसने कहा, "जीवन का सत्य तो परमात्मा द्वारा प्रदान की अनूठी देन को खो देना नहीं है।" इसके बाद तो उस जलकुंभी से भरे सरोवर का सारा दृश्य ही बदल गया। किनारे पर खड़े हंसों ने अपनी चोंच को पानी में डूबोया और पंखों को फैलाकर तैरना प्रारंभ किया। पानी की धार में उतरने वाले पंछी भी सरोवर की गहराइयों में तैर गए। इसके बाद वे सभी हंस, जो जल क्रीड़ा छू--छू पंछियों का चहकना मन को मोह रहा था। पक्षी तो उड़ रहे थे। फिर हमें ऐसा क्यों लगा? पक्षी तो कभी बीमार नहीं पड़ते। मनुष्य क्यों उस पंछी की भांति स्वयं को असहाय बना लेता है? प्रकृति का ऐसा सुंदर रूप तो किसी की समझ में नहीं आता, फिर मनुष्य क्यों भागता है? मनुष्य उस हंस जैसा क्यों नहीं बनता जो अपनी मृत्यु को शांत भाव से स्वीकार करता है? क्या मनुष्य को नहीं सोचना चाहिए? मानव समाज का दुर्भाग्य है, मनुष्य उस बात को नहीं समझ सका। जो समय के महत्व को समझ गया, वह सब कुछ पा गया। ... वर्तमान में जो कुछ दिखाई देता है वह कल नहीं रहता। जो समय को पहचान गया वह अपने जीवन में सफल हो गया, समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। जो समय को महत्व नहीं देता वह कभी भी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाता। वह जीवन में सदा ही पछताता रहता है। इस बात को समझ कर ही हमें आगे बढ़ना चाहिए। एक बार जो समय बीत गया, वह फिर वापस नहीं आता, अतः अपने समय का सदुपयोग करना चाहिए। 22
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हम चाहे जितनी भी प्रार्थना करें या तपस्या करें पर इसका फलित होना या अथवा मिलना तभी संभव होता है, जब प्रार्थना हृदय की गहराइयों तक या तपस्या निष्काम भाव से की जाए। जब हम समर्पित भाव अपनाते हैं तब हमारी हर बात ईश्वर तक पहुंचती है। प्रभु, यह तो समर्पण देखना चाहते हैं। इस बात को एक दृष्टांत से इस प्रकार समझें। एक नगर का यह नियम बना हुआ था कि वहां का राजा केवल पांच वर्ष के लिए बनाया जाता था। पांच वर्ष राजा रहकर राज्य के सारे ऐश्वर्य भोगने के बाद उस राजा को उस राज्य की सीमा के उस पार एक बहुत बड़े बीहड़ जंगल में छोड़ दिया जाता था। जहां घूमते हुए वह राजा अपने अंतिम संस्कार पश्चात अपना जीवन समाप्त करता। इस प्रकार उस देश में अनेक राजा आए, उन्होंने राज किया, सुख भोगे, पर अंत में सब वहीं पर छोड़ गए। यह सोचकर कोई भी व्यक्ति उस नगर का राजा नहीं बनना चाहता था। क्योंकि अंततः मृत्यु-लोक जाने पर अपना सर्वस्व-वैभव सब बिखर जाएगा। "क्योंकि इस संसार रूपी जंगल में तो अपना कोई भी नहीं होता। जो केवल सद्कर्मों द्वारा इस संसार में कर्म करता हुआ प्रभु भक्ति करता है वही इस भवसागर से पार उतरता है, तथा इस पार संसार का सुख-चैन तो विनाशीय पदार्थ मात्र है।" अंततः एक, दो व्यक्तियों द्वारा आग्रह करने पर एक व्यक्ति ने उस राज्य का राजत्व स्वीकार कर लिया। नियमानुसार वह सिंहासन पर बैठ गया। उसने उन पांच वर्षों में राज्य का सारा वैभव भोगा तथा अपने राज्य को विकसित करते हुए एक अत्यंत सुंदर नगर की रचना की, उस जंगल में जो उस नगर के पार था। उसने वहां पर सुंदर-सुंदर महल, बाग-बगीचे बनवाए। चारदीवारी का निर्माण करवाया, उस बीहड़ को एक अत्यंत सुंदर और हरा-भरा व सुरक्षित स्थान बना दिया। पांच वर्ष पूरे हो जाने पर, नए राजा द्वारा विदाईस्वरूप दी गई विशाल नौका में बैठकर वह उस पार पहुंच गया और अपने बसाए उस नए सुंदर राज्य में सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा। क्या ऐसा कोई व्यक्ति था वह? नहीं! कोई भी नहीं। केवल कथा रूपी इस संसार में ही सत्य को जान सका! पर सत्य है कि हम सब भी इस संसार में पांच वर्ष के लिए आए हैं। हम सब कुछ जानते हुए भी इस बीहड़ जंगल रूपी जीवन को नष्ट कर रहे हैं। ईश्वर द्वारा दिए गए इस शरीर को जो एक नश्वर वस्त्र की तरह है जिसे एक दिन छोड़ना ही पड़ेगा। इसके पश्चात हम सब भी उस पार के उस भव-सागर में उतर कर उस बीहड़ जंगल में चले जाएंगे! सत्य यही रहेगा! उस बीहड़ जंगल में अपना कोई भी नहीं है। वहां केवल प्रभु की भक्ति रूपी, सत्य निष्ठा रूपी नौका ही इस भवसागर को पार कराने में सहायक बनेगी। यह संसार तो सराय रूपी है। हम सब यात्री इस सराय में थोड़े दिन रुकेंगे और फिर चल देंगे, इसलिए जिस प्रकार उस राजा ने अपनी समझ से उस पार की चिंता की, वैसे ही हमें भी उस बीहड़ संसार की चिंता करनी चाहिए जहां सब कुछ छोड़ कर जाना ही है, जिसे पारलौकिक सुख कहते हैं? इसलिए हे मानव! प्रभु के आगे अपनी प्रार्थना समर्पित करके देख, जो कुछ भी तूने कमाया है उसे प्रभु को सौंप दे, यह समझ कर कि सब कुछ प्रभु का ही है। इस समर्पण भाव से तू इस संसार से पार उतर जाएगा। जो प्रभु का होकर रहेगा, पारलौकिक सुख को पाकर ईश्वर भक्ति रूपी सुख में मगन होकर, प्रभु के धाम में स्थान पाएगा। जो समर्पित भाव से कर्म करेगा उसे इस जन्म में शांति, और मृत्यु के उपरांत प्रभु का सामीप्य अवश्य प्राप्त होगा, बस! तू निर्मल मन से कह, हे प्रभु! मैं तेरा और तू मेरा? तू ही मेरा पालनहार है? यह प्रार्थना भाव मन में धारण करके जब तू अपनी निष्काम भक्ति रूपी साधना करेगा, तो ईश्वर की कृपा क्यों नहीं बरसेगी? ईश्वर को जानने की नहीं, भाव से मानने की वस्तु है। यह संसार भले ही कितना भी विशाल हो परंतु जब हम मन को एकाग्र करके, इस परम तत्व को जानने बैठेंगे? तब हमें ज्ञात होगा कि संसार में ज्ञान, विज्ञान और बुद्धि का बहुत बड़ा क्षेत्र है। यह सब कुछ जान लेने पर भी जब हम शांति को खोजेंगे, तब- तब हमारे मन में ईश्वर के प्रति एक तीव्र प्यास जगेगी, व यही प्यास संसार के सब सुख-साधनों से परे होकर हमें, उस परम चेतना की ओर ले जाएगी। सांसारिक सुख-भोगों का अंततः नाश होगा, पर ईश्वर शाश्वत है, यह बात समझ कर, हम ईश्वर शरणागत हो जाएंगे। उठो! जागो, जाग्रत बनो, इस मन, बुद्धि, इंद्रियों को, अहंकार को, काम को, क्रोध को प्रभु के चरणों में समर्पित कर ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाओ। आओ, सब मिलकर, एक होकर, निष्काम भाव से ईश्वर के चरणों में वंदन करते हुए, उनकी स्तुति गाएं। 24
"पत्रिका का नया अंक छप गया, ग्राहक को तीन-चार रु० भिजवाइये, आपके घर
पत्र लिखने पर चार मास बाद उत्तर प्राप्त हो रहा था, सो भी सब प्रकार संशय उत्पन्न करने का कारण था। "पत्रिका का नया अंक छप गया, ग्राहक को तीन-चार रु० भिजवाइये, आपके घर पर सब कुशल है। ससुराल वाले चार सौ रु० और मांगते हैं। आपका बड़ा लड़का दस बार बीमार हो चुका अबकि बार बच गया तो बच गया वर्ना गया समझो, घर पर किसी से बन नहीं रही सो मैं अमुक के पास जा रहा हूँ।" ऐसा समय न आये तो क्या सब कुछ न आये। इस प्रकार का पत्र जब घर पर आ रहा हो तो, वह मन स्थिर या शान्त रह सके गा? जब कोई व्यक्ति घर परिवार से दूर काम पर जाता हो अथवा, रोजगार करने जाता अथवा घर बैठ कर ही सब काम काज करता हुआ काम चलाये? रोजगार करने में कठिनाई आये तो समझ लें, आपके घर का आधार ही समाप्त हो रहा अथवा, यह विचार कर चिन्ताग्रस्त हो कर बैठ गया हो, काम करने में भी रुचि समाप्त हो जाये तब उस व्यक्ति से आशा क्या होगी? रुपये पैसे का कष्ट, संकट घर पर घर के काम में आयेगा? या तो घर बन्द कर के बैठ गये हों, रोजगार में कोई नया काम सोचा? सब काम बन्द हो, बच्चे के लिये या अपने सिर पर सिर छुपाने के लिये अपने सिर पर मकान बना हो, या फिर उस से कर्जा वापस मांगा गया हो? मनुष्य यह सब सोच कर ऐसा काम करता है, रोजगार में लग जाता है, सब चिन्ता छोड़ कर अपने काम पर निरन्तर अग्रसर हो या परिवार में सिर छिपाने का साधन खोज निकाले अथवा यह, मन को समझा लेवे कि जब तक मेरे बच्चे जीवित हैं, अपने ही रोजगार द्वारा सब कुछ कर लूंगा तो वह सब कुछ बना ले, सब घर को ठीक कर ले जब तक स्वयं अपने हाथ पैर से काम करे, हिम्मत करके उठे, संकटों को सब प्रकार दूर करे, समझ बूझ कर, बुद्धि लगा कर, रोजगार बढ़ा कर, सब कुछ ठीक कर सकता है लेकिन आलसी हो कर बैठ जाय या समस्याओं अथवा घर के सब रूप रंग देखकर घबरा कर बैठ जाय तो, कभी भी सब प्रकार के सुख प्राप्त नहीं कर सकता है, जब तक मनुष्य संकटों का डट कर सामना करे, सब कुछ स्वयं करने की हिम्मत करे तो सफलता उस के चरण चूमेगी! घबराने से, सब कुछ हाथ से जाता रहता है। सब को छोड़ कर सिर पर हाथ रख कर, बैठकर रोने लगे अथवा रो कर बैठ जाय तो इस का कोई हल निकलने की आशा नहीं हो सकती है, जब भी सब कुछ हाथ से गिर गया अथवा व्यापार में सब दो--चार सौ का नुकसान दिखाई दे रहा हो--तो यह तो नहीं हो गया, कि व्यापार बन्द ही करना या सिर पकड़ कर बैठना? फिर काम किसने पूरा किया? जब व्यापार को नया रूप देकर दो-दो काम हो, कार्य विशाल रूप बना कर सब प्रकार साधन जुटाकर दिन-रात परिश्रम से काम कर लाभ प्राप्त कर सकता, चिन्ता दो-दो काम की, कार्य सब प्रकार रूप रंग बदल सकता सब कुछ है, तो सिर पर हाथ, रख कर दो--चार चिन्ता करके बैठ जाने से क्या लाभ पहुंचेगा? यह सब कुछ तो मनुष्य करता ही रहता सब प्रकार के लाभ स्वयं प्राप्त करके सफल हो सकता। जब देखा गया, व्यापार बन्द कर दिया गया तो सब काम ही बंद हो गया, ग्राहक भी घर बैठा रह कर इन्तजार करता है, ग्राहक मन ही मन में यह सोचता रहा उसने माल बाहर से ला कर देना था सो नहीं दिया है, सो तो जो काम का चक्र चलना था रुकावट उसने स्वयं उत्पन्न की जिससे वह माल मंगवाता रहा होगा, अब वह माल अपने पास ही रख कर पछतायेगा, सोच विचार करके जब तक माल घर पर पड़ा रहेगा तब तक पैसा फंसा रहेगा, काम सब ही बंद रहेगा सो तो माल बाहर का भी रुक गया उसने व्यापार ही बंद कर दिया, सब ही नुकसान सब तरह का उठाता रहा जब तक वह यह सब सोचता तब तक और दिन बीत गये सो दिन का चक्र तो दिन के समय ही चलना है रात को समय पूरा हो जाना सो यह तो २४-घंटे रोज, कम होते जा रहे हैं और सब प्रकार के नुकसान को नुकसान ही बढ़ रहा सो सब प्रकार की सब ओर चिन्ता बढ़ती जाती रही। 25
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क्या यह संभव अथवा उचित समझा जाय कि मनुष्य जिस कामके करनेकी चेष्टा करे, केवल उसीका फल विचारशील बनकर भोगे अथवा अपने किये हुए उस काम विषयक अपने विचारके अनुकूल ही फल भोगे? प्रत्येक काम हमारी कार्यप्रणालीके अनुकूल ही समाप्त हो जायगा यह कभी संभव नहीं होता। हम जो कर्म करते हैं वह सब एक ही निश्चित परिणतिके अनुकूल नहीं होता, वरन् बहुधा ऐसा होता है कि हम जो काम जिस रूपमें करना चाहते हैं वह किसी न किसी रूपमें सर्वथा विपरीत ही हो जाता और न तो विचार, न इच्छा और न उद्योगकी क्रिया ही उस कामके परिणामको रोक सकती। तब क्या यह उचित समझा जाय कि केवल विचारके ही अनुसार फल दिया जाय? नहीं। जब मनुष्यका उद्योग सर्वथा अपनी कार्यप्रणालीके अनुकूल ही फल न ला सका तब विचारके अनुकूल फलकी आशा करना सर्वथा पागलपनके सिवाय और क्या कहा जा सकता है? कदाचित् यह कहा जाय कि यदि फलकी कार्यप्रणालीसे विचारकी प्रणालीको सर्वथा पृथक् कर दिया जाय तब तो इस विचारको निरर्थक और मनुष्यके ऊपर न केवल एक अत्याचार बल्कि अपने किये हुए कर्मके फल भोगनेमें भी सर्वथा अन्याय ही माना जायगा। तब इसका समाधान यह हो सकता है कि मनुष्यके विचारको हम सर्वथा व्यर्थ नहीं समझते, वरन् इतना अवश्य कह सकते हैं, कि उस फलका उद्योगके साथ कुछ तो संबंध अवश्य होना चाहिये। मनुष्यका विचार चाहे जो कुछ भी अपने उद्योगके संबंधमें रहा हो, यदि उस उद्योगके फलके रूपमें कोई परिवर्तन न हो तो विचारकी सत्ता सर्वथा व्यर्थ है, इसमें संदेह नहीं। प्रत्येक उद्योगके साथ जो जो विचार लगा हुआ रहता है उसके संबंधमें यदि यह देखा जाय कि विचार, उद्योगके साथ सर्वथा पृथक् अथवा संबंधित रहता है तब इसका निर्णय केवल यह होगा, कि प्रत्येक उद्योगके साथ विचारका संबंध अवश्य रहता है और उद्योग केवल मनुष्यके विचारका कार्य ही नहीं है, बल्कि उद्योगका एक रूप भी है। इस विचारका जो फल उद्योगके साथ संबंधित देखा जाता है वह फल तो कर्मके साथ उद्योगके परिणाममें आ ही नहीं सकता। उद्योगके फलसे पृथक् यह विचारका फल कर्मके साथ सर्वथा संबंध न रखनेपर भी उद्योगके साथ संबंध रखता ही है, और विचारका फल सर्वदा कर्मके फलसे पृथक् ही हुआ करता है, उद्योगके साथ विचारके संबंधका जो फल होता है उसका संबंध केवल विचारके ही साथ होता है, उद्योगके कर्मके साथ उसका कोई भी संबंध नहीं हुआ करता। अतएव यह मानना ही पडेगा कि फल उद्योगका सर्वथा पृथक् है और विचारका पृथक्। उद्योगका फल केवल कर्मके साथ उद्योगके संबंधका फल है--जो कर्मके फलके अतिरिक्त दूसरा और कुछ नहीं हो सकता, और विचारके फलके साथ कर्मके संबंधका जो फल होता उसका संबंध सर्वथा विचारके साथ ही रहता है। अतएव इस विचारके फलका कर्मके साथ कोई प्रत्यक्ष संबंध न होनेपर भी यदि यह मान लिया जाय कि विचारका फल और कुछ नहीं, केवल उद्योगका फल है तब समझना चाहिये कि हम फल उद्योगका नहीं वरन् विचारका ही फल पाते हैं और उद्योगका फल तो केवल प्रत्यक्ष रूपसे दिखाई देनेके सिवाय और कुछ नहीं-- विचारका फल केवल विचार, उद्योगका फल केवल उद्योग ही नहीं। इस विचारके फलको हम एक दृष्टांत द्वारा--अदालतके एक मुकद्दमेके संबंधमें, एक वकीलके उद्योगके दृष्टांत द्वारा समझ सकते हैं, कि वकीलका जो काम है वह कर्म है और उसका जो उद्योग है वह उसका फल उद्योगका फल होगा? अथवा उसके अपने विचारका फल होगा? अथवा दोनोंका? एक वकील अदालतमें इस विचारसे जाता है, कि वह अपने मुवक्किलको जिता देगा, और इस विचारके अनुसार वह उद्योग भी करता है पर उसका मुवक्किल... अवश्य हारता है तब वकालत का, जो केवल कर्म उद्योगका फल है वह विचारके सर्वथा विरुद्ध कर्मके रूपमें प्रत्यक्ष हुआ। यदि यह कहा जाय, कि वकीलका जो विचार था उसका फल वकीलको मिला और वकालतके उस वाद-प्रतिवादका उद्योग केवल फलके रूपमें था तब तो इस वाद-प्रतिवादका फल वकीलको हारनेपर भी प्राप्त हुआ और यह उद्योग सफल हुआ, यदि ऐसा मान लिया जाय तब वकीलके इस फल विचारका रूप भी उस विचारके प्रतिकूल ही समझना पडेगा और कर्मके विरुद्ध फलका होना मानना पडेगा। अतएव इस दृष्टांतसे यह सर्वथा स्पष्ट सिद्ध होता है कि उद्योगके साथ जो विचारका, उद्योग और फलके साथ संबंध होता है वह सर्वथा पृथक् है। वकीलके मुवक्किलकी हार कर्मके साथ उद्योगके फलका संबंध है और उस संबंधका फल विचारसे सर्वथा पृथक् हुआ है! यद्यपि वकील यह, कि उसका मुवक्किल निर्दोष है और वह निर्दोष होकर छूट जायगा और वकील उसको निर्दोष प्रमाणित करनेके लिये वकालत करता है, यद्यपि वह जानता है कि उसका मुवक्किल चोर है, तथापि वकालत करता है, यद्यपि वकील इस विचारके अनुसार उद्योग करता है और उस उद्योग-संबंधी विचारका फल अपने उद्योगके फलके साथ प्रत्यक्ष देखता भी है तब भी वह कर्मके फलके साथ विचारके फलका कोई संबंध नहीं देखता?
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विचार तो स्वावलम्बन का सर्वोत्तम या श्रेष्ठ उपाय तो यही होना ही चाहिये कि जिससे सब स्वावलम्बी बनें? अब यह तो न महाराज का स्वावलम्बन हुआ तथा नहिं अन्य का स्वावलम्बन हुआ। प्रत्येक व्यक्ति को ही स्वावलम्बी बनना योग्य ही है पर सब को तो एक बार सब ही सब कुछ बना नहीं सकते तथा न ही सब अपनी बनाई ही वस्तु सब काम में लावे इसी लिये तो सब व्यवहारों का जन्म हुआ। स्वावलम्बी तो वही है, जिसने अपनी वस्तुएं बनाकर या मोल लेकर भी स्वयं ही अपने उपयोग में ली हों। और साथ ही साथ यह भी ध्यान रखना चाहिये कि उस वस्तु का स्वरूप ही नष्ट, या वह उस प्रकार बनकर नष्ट होने योग्य न कहलाने लगे। स्वावलम्बी तो प्रत्येक जन बन ही सकता यदि ईश्वर ने स्वाधीनता अपनी सब के समान न बनाई होती। अब जब ईश्वर ने ही सब अपने नियन्त्रणाधीन ही रखा है, तो फिर कोई किसी पर स्वावलम्बी क्या बने, या कह, या हो सके... सब का एक नियन्ता ही सर्वेश्वर ही है, सो उसी स्वामी को सबका सब कुछ मानना चाहिये। स्वावलम्बी होना जहां सर्वथा एक स्वाधीनता का नाम है, जिसका वास्तविक तो यही है, स्वावलम्बी या स्ववश रहने का नाम है, जिसका दूसरा रूप, परवश होना नहीं। अतः सिद्ध हुआ, सब को तो एक समय सब जन ही सब वस्तु सब काम की या सब प्रकार सुख दाता सामग्री को प्रस्तुत करने वाले तो न बनाकर या स्वयं नहिं कर सकते अथवा अपने आप सब ही सब कुछ नहीं कर सकते इसीलिये एक दूसरे पर आश्रित सब जन सब तरह सब जन एक दूसरे पर सब प्रकार निर्भर बन गये जिस जन का जैसा काम किसी योग्य रहा वह उस काम को वैसा करता गया तथा उस जन का वैसा प्रकार ही उस स्वावलम्बी का रूप बनकर परस्पर में सब काम चला। कहा भी न क्या किसी? "चलते-चलते ही गिर पड़ा फिर भी नहिं सम्भल या उठ कर देख सका।" इस सब का उत्तर यही निकला "चलो, चलो, जहां तक चाल है या तो गिरो या फिर गिर कर स्वयं उठो फिर चलो या जब गिर गये तब फिर माता-पिता का ध्यान करो।" सो सब स्वावलम्बनियों का रूप एक जैसा सब समय सब प्रकार सब स्थानों पर एक सा सब समय सब को नहीं मिल गया तथा नहिं मिल सका इसी लिये सब प्रकार कोई जन किसी बात यथा रूप सम्भव ही नहिं रहा। परस्पर में मिले स्वावलम्बी बनकर जिसने काम को तो अपने समय अनुसार पूर्ण किया उसे सब प्रकार का सुख ही हुआ, पर जिसके सब स्वावलम्बी न हुये या सब प्रकार स्वावलम्बी सब जन न बनकर कुछ अन्य पर ही आश्रित ही हो गये, उसको सब काम कष्ट पूर्ण तथा विषम जन का काम देखना पड़ा। पर क्या सब परस्पर के स्वावलम्बी जन सब ही काम को पूर्ण सुखमय या सुखद बना सकते थे? जब कि न किसी का किसी प्रकार भी? स्वावलम्बी कहा जा सकता था या स्वावलम्बी रूप तो स्वावलम्बी होकर केवल ही ही रह गया, न किसी का रूप बदला अथवा बदला? तो परस्पर के स्वावलम्बी या तो स्वावलम्बी कहला सके? अथवा सब किसी का सहारा चाहने लगे? सो चलते-चलते गिर तो सब स्वावलम्बी व्यक्ति गये या अपना रूप खोया, फिर भी स्वावलम्बी कहलाने लगे सो भी उचित था, फिर क्यों परस्पर आश्रित बन कर स्वावलम्बी होकर सब स्वावलम्बी बनना चाहते थे? जिसका परिणाम शून्य ही? या सब जन ही स्वावलम्बी रूप हो ही गये, स्वावलम्बी सब स्वावलम्बी का रूप परस्पर के रूप को बदलकर ही स्वावलम्बी बने, तो फिर स्वावलम्बन का नाम केवल ही रूप तक सीमित क्यों रहा? फिर इस स्वावलम्बन विषयक चर्चा? सब व्यर्थ समझी जा या मानी? स्वावलम्बन अपने आप सब स्वावलम्बियों का रूप ही तो होगा या अन्य स्वावलम्बी जन से ही स्वावलम्बन का तो रूप बनेगा। सब का सुख तो स्वावलम्बी बनने में था परस्पर एक दूसरे पर आश्रित होकर स्वावलम्बी का रूप माना तो स्वावलम्बी नाम केवल रह गया पर काम नहीं, सो काम करने पर ही व्यक्ति को काम का नाम देकर काम वाला कहा गया न कि व्यक्ति नाम लेकर स्वावलम्बी बनता व काम, परस्पर काम में एक काम केवल ही पर निर्भर रहा जाता था। 29
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संन्यास आश्रम का विचार ही न रहे तो फिर गृह, या अन्य आश्रमों का प्रयोजन क्या रहेगा, विचार ही विपरीत रीति का, या विपरीत परिणाम का होगा कि नहीं? सो इन सबका विचार जो जन न करके इस प्रकार का ही भाव निश्चय रूप विचार का निश्चय करते हुए इस जन्म में सब कुछ मान करके बैठते हैं, यह उनका विचार ही उनका विपरीत रूप में उत्पन्न होता है। सो इस सब का क्या रूप-रंग है सो तो इस जन्म रूपी समय में ज्ञान दशा में आ-सकना बहुत ही कम रूप लिए हुए ही माना है। ज्ञान का भी अधिकार विचार युक्त रूप से ही है-- अल्प रूप जन मात्र "न ज्ञानं न ध्यानं न च हरि कथा" इस प्रकार समझ कर अपने विचार को अल्प समझ कर अपने मन को ही सब कुछ मान कर सो सब जन रूप विचार का ही रूप अपने मन विचार में मान लेते हैं। एक जन ऐसा है, जो यह न समझ कर, न इस रूप को विचार कर, न इस रूप को, सब कुछ अपने मन का विचार ही मान कर, अपने मन को सब प्रकार से मन-माना ही रूप लिए हुए यह मान लेता है कि सब कुछ अपने ही विचार का रूप ठहरा हुआ है। न तो कोई ईश्वर का रूप है और न कोई रूप उसका जो माना हुआ है, न कोई गुरु का ही कुछ रूप विचार में आता है, सो यह सब रूप विचार का कुछ सत्य ही रूप लेकर ठहरा हुआ है। अपने विचार से अलग और कुछ नहीं है। न कोई ईश्वर है और न कोई उसका रूप है। न कोई गुरु है, न कोई संसार का रूप विचार का ठहरा हुआ है, सब विचार अपने मन के अनुसार ही मानना चाहिए। एक ऐसा; जो इस प्रकार अपने विचार, अभ्यास, अध्ययन तथा अपने विचार को, या उस ईश्वर को नहीं मानता, माया, संन्यास, सकाम, निष्काम, या अन्य किसी भी रूप को नहीं मानता तथा ईश्वर को ही सर्वव्यापी मान कर विचार करता हुआ यह, किसी रूप को भी नहीं मानता केवल ईश्वर के नाम को सर्वव्यापी मान कर सब प्रकार से ईश्वर को ही सर्वव्यापी मान कर अपने मन में जो कुछ मान लिया, सो ही सब कुछ मानता हुआ कहता है कि ईश्वर तो सब कुछ है, वह तो सब में है। एक ऐसा जन भी है, जिसने न ईश्वर को, संन्यास को वा उस रूप विशेष को कुछ भी नहीं माना है, न उस रूप को कुछ माना तथा न उस प्रकार के इस विचार को माना है कि ईश्वर का रूप ऐसा है, जो इस प्रकार अपने विचार को ही सब कुछ मान कर ठहरा हुआ है, सो ऐसा विचार भी विचार ही है। एक जन ऐसा है, "जो अपने विचार को आ-सकता हुआ कहे" जिस जन के इस प्रकार के सब विचार संसार में देखे जाते हैं जिसमें कोई अपने विचार को ही सर्वोपरि, सर्वश्रेष्ठ मानता हुआ यह भी विचार, सो इस प्रकार अपने विचार को ही ईश्वर का रूप मान कर अपने विचार का ही रूप संसार में देखता है। यह सब अवस्था, जो ईश्वर को नहीं मानते हैं अथवा किसी विचार को नहीं मानते हैं वे सब उस रूप को नहीं मानते जो कि ईश्वर का रूप कहा गया है। सो इस विचार को अपने मन में, ईश्वर का रूप अपने विचार का ही रूप ठहराया जाता है। ईश्वर का जो रूप माना जाता है वह सब अपने विचार का रूप है। इसलिए ईश्वर को सर्वोपरि, सर्वव्यापी मान कर ही सब कार्य करना चाहिए। 31
उनका मन्तव्य थाकि नित्य नाम, नित्य रूप और नित्य धाम का दर्शन भगवान् की कृपा से नित्य भक्त पाता रहता। नित्य पद का केवल यह मतलब ही नहीं कि भगवद् धाम नित्य यद्यपि वह भी। नित्य रूपका नाम का नित्य अनुभव हो? नित्य भक्त किसको कहेंगे? "जो नित्य स्वरूप का चि-द्विलासमय दर्शन करे।" यह निष्ठा सिद्ध हुई-- केवल नामका स्मरण किया नित्य स्वरूप साक्षात्कार। स्वामी कहते हैं, "इस साक्षात्कार का ही परिणाम हुआ" जब श्री हरिदास जी नित्य नाम का उच्चारण या कीर्त्तन करते हैं, कीर्त्तन के रस रूप स्वरूपका दर्शन उनको नित्य स्वरूप लीला विलास विभूति सहित सदा होता है, यह केवल यह न हुआ, नाम लिया रूप दिखा दिया केवल सो नहीं था पर रूप दर्शन नित्य रस रूप नाम रस, स्वरूप रस रूप, यह उनका भाव था। साक्षात्कार का एक फल भगवान् लीला का प्रत्यक्ष दर्शन सदा रहता है। साक्षात्कार का अभिप्राय केवल देखना ही, उस रस का रसास्वादन होता ही रहता है। रस का रस स्वरूप साक्षात्कार भगवान् का स्वरूपानुभव ही वास्तविक स्वरूप दर्शन या भगवान् का स्वरूप ही माना गया रस स्वरूप दर्शन के स्वरूप। उस नाम रूप व स्वरूप प्रत्यक्ष स्वरूप का दर्शन नित्य हुआ, उस रस स्वरूप दर्शन का यह परिणाम था कि इस, रस रूप लीला विलास दर्शन हुआ, नित्य रस रूप नित्य स्वरूप दर्शन से लीला विलासका ज्ञान या रूप सदा उनके सम्मुख रहता परमानन्द रस स्वरूपका ज्ञान हो इस बात से सदा के रस रूप रसिकता रस का व रस स्वरूप लीला के रस आस्वादन रस में लीन रसिकता से युक्त, रसिकता रस का रूप सदा बना, नित्य स्वरूप, नित्य स्वरूप लीला नित्य व इस रसस्वरूप लीला नित्य व स्वरूप का रस में एकाग्र रस ही रस लीन नित्य रसस्वरूप लीला में, जब व जहा, रस स्वरूप रसमय व रस, उस रसका सदा ध्यान रूप रस स्वरूप नित्य स्वरूप रस का ही रस नित्य रस--इस रूप में नित्य रस--इस रूप रसस्वरूप नित्य रस, स्वरूप रूप रसिक स्वरूप रसिकता का स्वरूप रस स्वरूप ही, इस रसिकता रूप में रस रूप नाम साक्षात्कार स्वरूप में, नित्य नाम स्वरूप रस ध्यान रस में रस रूप नाम लीला रस रूप रस के स्वरूप में रस स्वरूप, इस रस स्वरूप रस का नित्य स्वरूप रस रूप ज्ञान में, नित्य नाम स्वरूप स्वरूप रस में स्वरूप का रस स्वरूप में, सदा ही रस का रस रूप रूप का रस! सदा ही स्वरूप रस रूप, उस नित्य स्वरूप रस! रस स्वरूप रूप का स्वरूप! रस साक्षात्कार का रस रूप स्वरूप! इस बात को रस रूप नित्य रस स्वरूप प्रत्यक्ष साक्षात्कार स्वरूप में, रस की रूप ध्यान में ही सदा रहा। नित्य स्वरूपका रस नित्य साक्षात्कार रूप में, रसिकता नित्य रूप से रस साक्षात्कार स्वरूप प्रत्यक्ष नित्य रूप में नित्य स्वरूप रस साक्षात्कार स्वरूप, साक्षात्कार रूप, रसिकता स्वरूप का रूप रस ज्ञान स्वरूप उस साक्षात्कार का स्वरूप सदा स्वरूप से साक्षात्कार स्वरूप रस में, सदा नित्य साक्षात्कार रस स्वरूप रूप रस में, रसिकता साक्षात्कार स्वरूप का ज्ञान रस रूप, रस रस स्वरूप रस रस सदा स्वरूप का ही नित्य साक्षात्कार सदा स्वरूप, रसिकता का रस ही रूप से स्वरूप का ही रूप सदा ही ही सदा ही स्वरूप रस में, सदा ही उस नित्य रूप नित्य स्वरूप, उस ही स्वरूप स्वरूप, उस स्वरूप के स्वरूप। रसिकता स्वरूपका रूप स्वरूप में, रसिकता स्वरूपका रूप स्वरूप सदा नित्य रस साक्षात्कार स्वरूप नित्य रस साक्षात्कार का रस साक्षात्कार स्वरूप स्वरूप सदा रस साक्षात्कार से रस साक्षात्कार रस साक्षात्कार साक्षात्कार रस साक्षात्कार रस साक्षात्कार साक्षात्कार साक्षात्कार सदा ही सदा सदा ही साक्षात्कार के रस रूप साक्षात्कार रस साक्षात्कार रूप से साक्षात्कार सदा ही रस रस साक्षात्कार साक्षात्कार सदा रस रस सदा ही स्वरूप रस रस रस स्वरूप रस रूप नित्य के रस रूप के रस स्वरूप रूप रस में, स्वरूप रस स्वरूप के रसिकता रूप नित्य व स्वरूप, व स्वरूप, व स्वरूप, स्वरूप, रस के नित्य स्वरूप नित्य स्वरूप में, रस ही रस नित्य स्वरूप से स्वरूप व स्वरूप। इस सब रूप का रस प्रत्यक्ष स्वरूप ही रहा, उस रस रूप नित्य ही रस साक्षात्कार सदा ही सदा रस साक्षात्कार सदा रहा। 32
समस्त विषय वासना, कामिनी कांचन सम्बन्धी वासना मनमें भरी हुईहै, हृदय भगवानके प्रेमसे शुन्य है, विमल निष्काम प्रेमरूपामृतकी बूंदका स्वाद तो आजतक कभी हम पाही नहीं सके सांसारिक भोगों रूपी मद्यको पीकर सदा मतवाले बने हुवे भोगों भोगते हुए चौबीसों घण्टोंमेंसे एक मिनटके लियेभी भगवान्का स्मरण नहीं; सब सुख और सामग्री ईश्वरने देकर दया का प्रकाश हमारे ऊपर किया, पर कृतघ्न होकर हम उसका स्मरण नहीं करते वरन दूसरोंको कष्ट पहुंचाते, ईश्वरके नियमका उल्लङ्घन कर दिन-रात पाप सञ्चय करते हैं। यह कौन कहसकेगा, कदाचित् कहसकेगा, कि परमात्मा दयालु नहीं है। ईश्वरपर दोषारोपण क्यों कियाजाय? जबतक कि सम्पूर्ण काम, कामना विषयों का त्याग नहोजावे, तब तक न तोपरमेश्वरका निष्काम सच्चा प्रेमही इस चित्तमें आवेगा, औरन दर्शन होसकतेहैं, केवल बातोंसे परमात्मा नहीं मिलसकते। इस विषयमें यह निश्चय समझना चाहिये कि जबतक इस मनमें विषय वासना रूपी कामरूपी-शत्रुहै, तबतक परमेश्वरका वास मनमें नहीं होसकेगा, यह बातभी हैकि जहां अन्धकार रहता है वहां प्रकाश कभी टिकनहीं सक्ता और जहां प्रकाश होताहै वहां अन्धकार टिकनहीं सक्ता। इस विषयमें किसी महात्माने बहुत सुन्दर दृष्टान्त दियाहै कि जबतक राजा सिंहासन पर बैठाहै औरमहाराजके सामने दासदासियां सब हाथबांधे हुवे खड़ेहैं राजा सिंहासन छोड़कर जब महलमें चलाजाता है तब सब दास दासी मनमानी चेष्टा करनेलगेहैं और राजाके सिंहासनपर भी बैठ जातेहैं परन्तु ज्योंही राजा, फिर महलमें से निकलकर आताहै राजाको आते देखकर सब दास दासियां हाथबांधे अपने २स्थानोंपर नम्र होकर खड़े होजातेहैं औरसिंहासनको खाली छोड़देतेहैं इसी प्रकार जबतक इस मन रूपी सिंहासनपर काम, क्रोधादि विकारों का राज्य रहताहै तबतक ईश्वर रूपी राजाका पदार्पण इस मनरूपी मन्दिरमें नहीं होता औरजब यह विकार दूर होजातेहैं, अन्तःकरण शुद्ध होकर ईश्वरकी झांकी इस मनरूपी मन्दिरमें होने लगती है; फिरतो काम क्रोधादि, न जाने कहां भागजातेहैं, और चित्त शान्त... हो जाताहै इसलिये कामरूपी विकारको सब पापों की मूल जड़ समझकर इस को मार भगावे--जिससे मनमें शान्ति मिले औरपरमात्मा के प्रेम रूपामृतका रस मिले औरपरमात्मा की प्राप्ति होकरसदाके लियेआनन्द प्राप्त होसके। सब सन्तों का यही उपदेशहै कि जबतक वासनाको नहीं छोड़ेगा तब तक कुछ नहींहोगा, केवल बकवाद करनेसे कुछ काम नहींहोता मनके फेरनेसेही सब बात बनसकतीहैं। वासना किसको कहते हैं? उत्तर, सांसारिक पदार्थों की, कामिनी कांचनकी चाहनाका नाम वासना कहलाता है? ईश्वरको निष्काम, अहैतुक प्रेमसे भजना, सांसारिक सुख सम्पत्तिके लिये भगवद्भजन का व्यापार न करना चाहिये क्यों? निष्काम-उपासना सर्वोत्तम कहीहै, सकाम-उपासना अल्पफलवाली होतीहै सकाम उपासना करने वालेको भी, भगवान्का दर्शन और प्रेमामृत नहीं प्राप्त होता यद्यपि ईश्वर को सब सुख सम्पत्ति देनेका सामर्थ्यहै पर ज्ञानी महात्मा ईश्वरसे नश्वर- पदार्थों की कभी चाह नहीं करते भगवान्की भक्ति केवल भगवान्के प्रेम के लियेही करनी चाहिये? नश्वर पदार्थों की चाहना भक्ति में विघ्नस्वरूपहै। ईश्वरके प्रेममें, नश्वर-पदार्थों की चाहना क्यों हो, अविद्यारूप अन्ध-कूप भोगविलासके लिये, नहीं जी, कदापि-नहीं? यदि यह कहोगे कि सब भोगों की, वासना का त्याग करें, केवल काम और मोक्ष विषय-वासना की चाहना रखें तोक्या कोई हानि वा दोषहोता है? उत्तर यह, यह दोनों कामनाएं वासना--की उत्पत्तिकरने वाली हैं इसलिये त्याज्य हैं, यह वासना जन्म-मरणरूप बन्धन देनेवाली न हैं? शङ्का हुई, मुक्ति परमात्माका स्वरूप होनेसे सब दुखों की और पापों की निवृत्त करनेवाली और परम आनन्द रूप होनेसे मोक्ष की वासना बुरी क्यों मानी जातीहै कारण कि इस वासनासे तो पाप और नश्वर सुखों का त्याग होताहै तो मुक्ति इच्छाको पाप रूप त्यागयोग्य क्यों माना जाय और इससे ईश्वर प्राप्तिमें क्या विघ्नहै उत्तर यहकि जब चित्त शुद्ध निर्मलहुवा तो फिर मुक्ति की क्या आशा? स्वतःसिद्ध ही मुक्तिहोगी यह शङ्का क्या सिद्ध हुई? मुमुक्षुताका जब उदय होता है तब मुक्ति इच्छा होती है इससे सिद्ध हुवा कि मोक्ष विषयकवासना निष्काम दशाके लिये प्रतिबन्धकहै इसलिये मुक्ति इच्छा त्यागने योग्यहै निष्काम उपासकके केवल यह भाव रहे, परमात्मा को प्रेम रहे, आत्मसमर्पणका भाव सदा रहे, चाहे नरकमिले चाहे स्वर्ग रहे, जहां भी वास मिले वहांही भगवान्के चरणों का ध्यानलगावे, केवल निष्काम भक्ति चाहे इस दशा वाले महात्मा पुरुषका संसार में कुछ कर्त्तव्य शेष नहींरहता केवलभगवत् चिन्तनमात्र इनका स्वरूप होताहै, जब तक, ऐसा प्रेम ईश्वरके साथ नहोजावे तबतक कल्याण की सम्भावना नहींहो सक्ती इस वासना रूपी कीचड़ लगे अन्तःकरण में ईश्वर, प्रकट हो सकें, कदापि यह सम्भव नहींहो सक्ता हे प्यारे भ्राताओ! ईश्वरके भजनमें चित्त लगाओकि जिससे संसारका भय मिटकर आनन्द प्राप्त होवे ईश्वरके चरणोमें ऐसा अनन्य प्रेमभाव धारणकरो कि संसार का सब मोह छूट जाय औरपरमात्मा विश्राम-पद मिले॥ 33
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तब राजा शूरसेन चकित होकर उस बालक को गोद में उठाकर बोले, यह आश्चर्यदायक वीर बालक तो अपने समान किसी को भी नहीं गिन रहा है, अर्थात् यह निडर वीर ... निदान उस दिन राजा शूरसेन अपने घर को जाकर सब ही बालकों को बुला कर भोजन का प्रबन्ध करवाकर उन सब को खिला कर सत्कार कर सब को विदा किया परन्तु उस बालक ने यह भोजन भी स्वीकार नहीं किया अर्थात् खाया, न सत्कार-सत्कार को ग्रहण कर प्रसन्न हुआ। राजा शूरसेन विचारता ही रहा सोच में पड़ाता रहा कि उसका पिता, या उस बालक का क्या नाम बताया जाय जब वह बालक बारह वर्ष वयवाला सब प्रकार से सबल निरोग स्वरूप वान व्यायाम करता था, तब जिस स्थान, ग्राम, नगर पाठशाला अथवा जहां कहीं जाता अथवा, कोई बलवान् मिलता था, उस समय उसके साथ बल आजमाने लगजाता था। और सब ही लोग यह कहते थे। कि इस जैसा कोई भी वीर इस पृथ्वी मण्डल मध्य है--इसलिए ही इसका नाम! पृथिवीचन्द्र रख कर सम्बोधन किया जाय। इसके पिता का नाम तो किसी पता लगाया ही नहीं था-और सम्बोधन बिना काम भी नहीं हो सकता था। इस ही लिए उसका सम्बोधन नाम ही हो गया। इसके पश्चात् किसी भी नाम से, उस बालक का पृथिवी नाम ही हो गया था। इसलिए यह विचार निश्चित है, प्रत्येक विचार प्रत्येक बात किसी कारण विशेष पर तथा किसी आवश्यकता के बल पर ही नाम रखे जाते हैं। अन्यथा व्यर्थका नाम कौन सा? और क्या नाम किसका हो? आज का विषय यह नहीं चल रहा विचार इसका नामकरण का उस दिन चला था सो इस निमित्त से कथा रूप में प्रसंग उठाया गया। अब आगे का आचरण जो पृथिवी का विवरण सुना जा रहा है। इसलिए जो जो नाम प्रख्यात हैं, वे सब किसी विशेषता के ही कारण से होते हैं। इस तथ्य को सत्य ही मान लो। अब इस कथा से यह सिद्ध हो जानेपर कि उस बालक का नाम पृथिवी रख ही लिया तो उस समय उसका आचरण जो था वह बड़ा सरल निष्कपट, दयालु तथा अपने आप-आप मग्न रहने वाला था। इसलिए जो उस समय का राजा था। अर्थात् उस समय का शूरसेन नाम सम्भ्रम राजा, या जो कोई राजा होता था, या उस देश का राजा था। उसने ही अपने मन्त्रियों से कह कर या तो वह काम करने वाले भृत्यों से कह कर उस बालक का लालन पालन करवाया था। उस का पालन तथा उस स्वरूप-रचना व शक्ति को देख कर ही; सत्कार था। सो अब तो प्रत्येक को समझना यह आवश्यक हो जाता है। जो राजा चम्पावती पति, या कोई उत्तराधिकारी था जिस समय उस बालक का लालन हो रहा था। उस देश प्रजा सुखी अवश्य थी, उस ही कारण प्रजा के भोजन की कमी अथवा दुर्भिक्ष कभी भी उत्पन्न नहीं हुआ। क्योंकि जिस राजा के मण्डल में राज्य में प्रजा सुखी नहीं होती क्या? निश्चय ही यह, राजा अपनी प्रजा के विचार को जानने वाला नहीं रहता वा प्रजाजनों क्या कुछ विचार स्वातन्त्र्य का और उनका ध्यान न रख कर केवल अपने भोग को भोगने का ध्यान ही जो राजा रखता है। वह राजा कभी भी उत्तम राजा नहीं कहा उस समय पृथिवी का नाम प्रख्यात होने का कारण यह भी हुआ कि वह बालक सबपर बड़ा दयालु था, उसने दयालुता का काम यह किया कि जो जो प्रजा में निर्बल दीन बालक थे। उन सब बालकों को इकट्ठा न करके ही अपने भोजन को या अपने लिए जो राजा मण्डल व्यवस्था से आता, उस प्राप्त सत्कार, का पृथिवी वितरण बालक-बालक बालकों को कर देता था। बालकों को वितरण करने पर सब लोग बड़े प्रसन्न और उसके यश का गान करने में प्रवृत्त हो गये। जब बालकों को दान वा सहायता देने लगा तो सबने यह निश्चय ही सम्भावना की, कि जो जो दीन बालक तथा बालिकाओं की अवस्था थी उसमें तो उन बालकों के वस्त्र भोजन का, प्रबन्ध यह राजा करता था, और राजा सब करता था, इसलिए इसका प्रभाव ऐसा पड़ा कि, सब लोग इस बात से, विशेष प्रसन्न थे, केवल राजा चिन्ता में पड़ गया, चिन्ता यह हुई पृथिवी का प्रभाव तो बढ़ जायगा यह तो निश्चित है, परन्तु सम्भवतः यह महाप्रतापी इस राज्य का स्वामी न बन जाय यह राजा के मन में भय उत्पन्न हो गया था। जब उस भय को उसने अपने मन्त्रियोंके सम्मुख प्रकट किया तब सब ही मन्त्रियोंने परामर्श दिया चिन्ताग्रस्त मत हो इस का कोई प्रबन्ध कर दिया जायगा जिससे चिन्ता मिटे। राजन्, इस पृथिवीचन्द्र बालक को तो हम मारेंगे नहीं, तो क्या करेंगे? सो आप ही सब को और पृथिवी को भी तो मार नहीं सकता अतः ऐसा उपाय हो जो पृथिवी पराजय को न पाकर के, शान्त बना रहे। इसका कारण यह भी जान लेना ही होगा 36