एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकहना चाहता था केवल इसके लिये कि जो कुछ तुमको दिया गया था उससे तुम सन्तुष्ट नहीं हुवे और जो कुछ तुम को मिलाना था उसकी अपेक्षा कुछ और पाने की इच्छा किये जा रहे थे! तुमने अपने २ कर्मफल को रूप रंग और अपनी शक्ति को परमात्मा द्वारा दिये गये उपहारों को देखकर सन्तोष क्यों नहीं किया? तुम को किसने रोका था? केवल अपनी तृष्णा को छोड़ और किसका दोष बताया जायगा? जो तुम रोते फिरते? इस प्रकार जो जो जीव परमात्मा के नियम के वश होकर जन्म या अन्य दशा को प्राप्त होतेहैं, वे भी जब तक अपनी स्थिति द्वारा कुछ लाभ नहीं उठा लेते तब तक कोई नया सुख नहीं पा सकते और नित्य परिस्थिति का रोना, दुःख का रोना ही रोते रहेंगे। इन उदाहरणों से हम यह परिणाम निकाल सकते हैं, यदि परमात्मा सब को एक समान बना देता और सब को अपनी इच्छानुसार वस्तु मिल सकती तब भी कभी तृप्ति नहीं होती, न सन्तोषजनक समय ही आ कर सुख प्राप्त कराता वरन् जो कुछ मिलता जाता वह सब व्यर्थ होता जाता और नित्य नये रूप रंग व अन्य शक्ति को पाने की भूख बढ़ती ही जाती जिससे केवल अपने २ रूप रंग शक्ति को संवारने में लगे रहने के सिवा और कोई काम, न तो हो सकता न किसी अन्य वस्तु का सुख मिल सकता और न सृष्टि चक्र चलता, न यह भिन्न २ पदार्थ, पशु, पक्षी, मनुष्य, वनस्पति, पाषाण, आदि दिखाई पड़ते केवल प्रकृति का सुन्दर विस्तार, कुरूप, अन्ध, बहरा, अकर्मण्य बनकर रह जाता और अन्ततः किसी अन्य सृष्टि के निर्माण के सिवाय अन्य उपाय न रहता कोई सोच सकताहै कदाचित् ? कि जो जीव रूप रंग बल वैभव को पा चुके हैं वह सब तृप्तहोकर सुख से अपना समय व्यतीत कर रहे होंगे, कदापि न होगा, कोई भी तृप्त न होगा, जिसे अपनी इच्छा द्वारा सब कुछ मिल गया, वह उस नये रूप-रंग को पाकर, तृप्त होने के बदले, और नये रूप, नये बल, नये सुख की खोज में भटकता फिरेगा, यह सोच समझ कर २ रूपी और सर्वज्ञ ईश ने। सब को अपनी अपनी दशा व रूप, रंग बल को देकर सब दशा को भोगने पर्यन्त सुखी अथवा दुःखी न होकर, अपने कार्य को आगे लेजाते रहने की प्रेरणा की या आज्ञा, जिसे सब पूरा करते हुवे संसार को आनन्द से भर रहेहैं अन्यथा सब का सब यह सुन्दर संसार या तो नष्ट हो जाता या निष्प्राण बन जाता या फिर सब जीवों का मन एक रंग या रूप में रहने से उकता कर नया २ परिवर्तन मांगता जो कि इस सृष्टि में न होकर इसे अन्य प्रकार के ही नियम-विधान के आधार पर चलाना। परमात्मा के प्रत्येक कार्य में ही कोई न कोई रहस्य या भेद छुपा हुआ अथवा भरा पड़ा रहता है, जिसे सब जीव; जो अपने आप को समझ का पुत समझते हैं। जो वास्तविक आनन्द-प्रदायक विभूतियों अथवा साधनों को न पा कर केवल काल्पनिक सुख मान कर, किसी वस्तु विशेष को ही सब कुछ मान बैठते हैं अथवा स्वयं अपने को ही सब कुछ मान कर उस परम शक्ति की ओर दृष्टि न फेर कर जब दुःख पाते, तब उस परम पिता को कोसते हैं अथवा भाग्य को कोस कर रोते रहते हैं। ऐसा मान कर भी वे अपनी बुद्धि पर कभी विचार नहीं करते, कि जिस वस्तु, को हम सब कुछ मान रहे थे क्या वह वास्तव में सब कुछ सुख देने वाली हो गई सिद्ध। इस सब का केवल यह कारण कि प्रत्येक को जो कुछ दिया वह कर्मानुसार होने पर भी जीव को अपनी ही कामना द्वारा सब कुछ न मिलने के कारण वह सदा अतृप्त रह कर उस प्रभु कृत सृष्टि को ही दोष देता है अथवा भगवान् को ही दोषी ठहराने लगता है। वह यह नहीं सोचता कि जो कुछ अपने लिये उचित समझ कर दिया है, वह सबप्रकार से उस जीवकेलिए ठीक ही है और जो जो भी मिला अथवा मिल रहा वह सब भी जीव के भले के लिए निर्धारित कर परमात्मा ने दिया है उस सर्वव्यापक? जिसने सब विचार कर व्यवस्थिति करके सब प्रकार जीवोंके हितार्थ ही जो उचित था उस को सब कुछ अधिकार उस जीव विशेष के हाथ में दिया। प्रत्येक जीव अपनी इच्छा के अनुकूल सब को वश में रखना और सब कुछ प्राप्त करने की हर समय चेष्टा करता हुआ अपने आपको सब का कर्ता धर्ता मानकर ही सब को ही दबाए और मन-माने ढंग से व्यवहार करने लगा था जिससे संसार व्यवस्था सब क्षत विक्षत हो कर प्रत्येक प्राणी को ही भारी कष्ट, दुःख 20