भारतकोश
पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 113

११२ पद्मावत। नयनन्हि भीतरपन्थ है, हिरदयै भीतर ठाँउँ ॥ सुनि पद्मावत की अस मयाँ । भावसन्त उपँजी नई कयाँ ॥ सुआका बोल पवन होयलागा । उठासोय हनुमंत होय जागा ॥ चांदमिलनकहँ दीन्हेसि आशा । सहसँ किरनसूर्यपरकाशा ॥ पाति लीन्ह लै शीश चढ़ावा । दृष्टि चकोर चांद जस पावा ॥ आश पियासा जो जेहि केरा । जो झिककार वही सो हेरों ॥ अब यहि कौन पानि मैं पिया । भै तन पांख पतङ्ग मरजिया ॥ उठा फूल हिरदय न समाना । कन्थों टूक टूक भर आना ॥ दो० जहां प्रीतम वै बसहिं, यहि जिववलै तेहिवाँटे । जो सो बुलावै पांव सों, हम तहँ चलै ललोटें ॥ जो पन्थ मिला महेशहि सेई । गयो समुद्र ओही धसलेई ॥ जहँ वहं कुण्ड बिषमै औगाहों । जायपरा तहँ पाव न थाहा ॥ बावर अन्ध प्रेम कर लागू । सौहें धसा कुछ सूझ न आगू ॥ लीन्हेसि धसजोश्वासमनमारा । गुरू मुछन्दर नाथ सँभारा ॥ चेला परी न छांडहि पाछू । चेला मच्छ गुरू जस कांछू ॥ जस धसलीन्ह समुद्र मरजिया । उघरे नयन बरै जस दिया ॥ खोज लीन्ह सो स्वर्ग दुआरा । बज्रं जो मूंदे जाय उघारा ॥ दो० बांकचढ़ाव स्वर्ग गढ़, चढ़त गयो होय भोर । भइ पुकार गढ़ ऊपर, चढ़े सेंध दै चोर ॥ राजैं सुनि योगी गढ़ चढ़े । पूँछी पास पंडित जो पढ़े ॥ योगी गढ़ जो सेंध दै आवहिं । बोलहुशब्द शुद्धजसपावहिं ॥ आँख १ राह २ दिल ३ जगह ४ मेहरवानी ५ पैदा होना ६ बदन ७ हज़ार ८ शिर ६ देखना १० गुदड़ी ११ न्योछावर १२ राह १३ माथा १४ महादेवजी १५ टेढ़ा १६ खंवर १७ सामने १८ आसमान १६-२१ पत्थर २० कहो क्या दण्ड २२ ॥