भारतकोश
पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 115

११४ पद्मावत । बाइस सहस १ सिंहली चाले । गिरि २ पहाड़ पेई सब हाले ॥ जगत बराबर वै सब चाँपा । डरा इन्द्र बासुकि ३ हियें कांपा ॥ पदम कोटि रथ साजे आवहिं । गढ़ होय खेहँ गगन ५ कहँ धावहिं ॥ जनु भौचाल जगत महँ परा । कुर्महिं ७ पीठ टूटि हिय डरा ॥ दो० छत्रहिं स्वर्ग छायगा, सूरय भयो अलोप । दिनहि रात अस देखी, चढ़ा इन्द्र होय कोप ॥ देख कटक औ मनमंतं हाथी । बोले रतनसेन के साथी ॥ होत आव दल बहुत असूझा । अस जानव कुछ होय है जूझा ॥ राजा तुइँ योगी होय खेला । यही दिवसैं कहँ हम भये चेला ॥ जहां गाढ़े ठाकूरै कर होई । सङ्ग न छांड़े सेवक सोई ॥ जो हम मरन दिवस मन ताका । आज आय पूजी वह शाका ॥ पर जिव जाय जायनहिं बोला । राजा सतसुमेरु नहिं डोला ॥ गुरू केर जो आयसु पावहिं । साँहें होहिं औ चक्र १६ चलावहिं ॥ दो० आज करहिं रण भारथ, सत बाचा दै राख । सत गुरू सत कौतुकैं, सत भरै पुनि साख ॥ गुरू कहा चेला सिध्र होहू । प्रेमबौर दै करो न कोहू ॥ जा कहँ शीशँ नायकै दीजै । रङ्ग न होय जूझ जो कीजै ॥ जेहि जिय प्रेम पानि भासोई । जेहि रंग मिलै वही रंग होई ॥ जो पै जाय प्रेम सों जूझों । कित तपमरहि सिद्ध जेहि बूझा ॥ यहि सत बहुत जूझ नहिं करिये । खड्गै देख पानी है हरिये ॥ पानी कहा खड्ग की धारा । लोट पानि सोई जो मारा ॥ = हज़ार १ पहाड़ २ नाम राजा सापोंका ३ दिल ४ राख ५ आसमान ६-८ कछुवा ७ फ़ौज ६ मस्त १० दिन ११ मुसीबत १२ मालिक १३ हुक्म १४ सामने १५ नाम हथियार १६ तमाशा १७ दरवाज़ा १८ गुस्सा १६ शिर २० पानी २१ लड़ाई २२-२३ तलवार २४ ॥