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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पद्मावत । ११५ पानी से ते आग का करई। आये बुझाय पानी जोपरई ॥ दो० शीश दीन्हे मैं आगमने, प्रेमपानि शिरमेल। अबसो प्रीति निवाहूँ, चलौं सिद्धहोय खेल ॥ राजै छेक धरा सब योगी। दुखेऊपर दुखसहै बियोगी² ॥ नाजिय धड़क हिये³ डरकोई। नाजियमरन जिवनकसह होई॥ नागफांस उनमेली ग्रीवाँ⁴। हर्ष न विसमो⁵ अबकोजीवाँ ॥ जोजिव दीन्ह सोलेव निरासा। बिसरेन हिंजोलहतनश्वासा॥ करै किंगरी तेहि तन्तबंजावा। यही गीत वैरागी गाँवा ॥ भलहिं अनंगगे मेली फांसी। हिये⁷ नशोचऐसीरिसनासी॥ मँगये फांद वही दिन मेला। जेहि दिन प्रेमपन्थ खेला ॥ दो० परगटे गुप्त सकलै महँ, पूररहा सो नाउँ। जहँ देखों वह देखों, दूसर नहिं कहुँ जाउँ॥ जबलग गुरु मैं अहानचीन्हा। कोटिअन्तरपैट बिचहुतदीन्हा॥ जो चीन्हा तौ और न कोई। तनमन जिव यौवन सबसोई॥ होंहों कहत धोख अन्तराहीं। जो भा सिद्ध कहां परछाहीं ॥ मारे गुरू कि गुरू जियावा। और को मारमरै सब आवा॥ सूरी मेल हस्ति¹⁴ गुरु परू। हौं नहिं जानौ जानै गुरू ॥ गुरू हस्ति परचढेसोपेखा¹⁵। जगतैं¹⁶ जोनास्तै नास्तसबदेखा ॥ अंधिमीने¹⁸ जसजलमहँधावा। जलजीवनै¹⁹ जलदृष्टि²⁰ न आवा॥ दो० गुरुमोर मोरे हिये, दिये तुरङ्गहिदोठ। भीतर करहि डुलावै, बाहर नाचै काठ ॥ शिर १ पहिले २ दुखी ३ दिल ४-१० गरदन ५-६ खुशी ६ दुःख ७ हाथ ८ ज़ाहिर ११ छिपा हुआ १२ सब १३ करोरों परदाका बीच १४ हाथी १५ देखना १६ दुनियां १७ नाश होनेवाला १८ मछली १६ ज़िंदगी २० निगाह २१ घोड़ेकी बाग २२ ॥