भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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१३४ पञ्चदशी सम्बन्ध ही नहीं बनता । उस आत्मा में जब अविद्या नहीं रह सकती तब अविद्या का किया हुआ आवरण भी कैसा ? जब आवरण ही नहीं रहा तो विक्षेप भी कहाँ ठहरेगा ? जब विक्षेप न रहेगा तब ज्ञान से नष्ट करने योग्य अनर्थ भी नहीं रहेंगे । यों ज्ञान भी व्यर्थ हो जायगा तथा ज्ञान को बनानेवाले शास्त्र भी प्रमाण नहीं रहेंगे । इन सब शंकाओं का एकमात्र समाधान स्वानुभव ही है । जब यह सब अनुभव में आ ही रहा है तो इसे अनुपपन्न कैसे कह बैठें । अनुभव से बड़ा तो कोई प्रमाण है ही नहीं । अन्तिम निर्णय तो अनुभव ही करता है । स्वानुभूतावविश्वासे तर्कस्याप्यनवस्थितेः । कथं वा तार्किकंमन्य स्तत्वनिश्चयमाप्नुयात् ॥२९॥ यदि तो [ तर्क के मुक़ाबले में ] अपने अनुभव पर विश्वास नहीं किया जायगा तो तर्क भी तो अनवस्थित है । फिर तार्किक- म्मन्य को तत्व का निश्चय कैसे हुआ करेगा ? जो जितना बड़ा तार्किक होता है उसका तर्क उतना ही प्रबल होता जाता है । ऐसी अवस्था में केवल अपना अनुभव ही एक ऐसी वस्तु है जिससे किसी बात का निर्णय किया जा सकता है । जब उस अनुभव पर ही तार्किक विश्वास न करेगा तो उसे तत्व का निश्चय कैसे होगा ? बुद्ध्यारोहाय तर्कश्चेदपेक्षेत तथा सति । स्वानुभूत्यनुसारेण तर्क्यतां मा कुतर्क्यताम् ॥३०॥ बुद्धि में आने के लिये तर्क की अपेक्षा आवश्यक हो तो अपने अनुभव के अनुसार ही तर्क करना चाहिये । कुतर्क करना ठीक नहीं है ।