पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३८ पञ्चदशी देवदत्तः स्वयं गच्छेत् त्वं वीक्षस्व स्वयं तथा । अहं स्वयं न शक्नोमीत्येवं लोके प्रयुज्यते ॥३९॥ देवदत्त स्वयं जाता है तो जाय, तू स्वयं देखता है तो देख पर मैं तो स्वयं ऐसा नहीं कर सकता हूँ, ऐसे प्रयोग लोक होते हैं [इससे स्वयं शब्दार्थ सामान्यरूप होता है और अहं [मैं] उसका विशेष है यह बात प्रकट होगयी] । इदं रूप्यमिदं वस्त्रमिति यद्वदिदं तथा । असौ त्वमहमित्येषु स्वयमित्यभिमन्यते ॥४०॥ 'यह रूप्य है' 'यह वस्त्र है' इत्यादि उदाहरणों में जैसे इदं शब्दार्थ सामान्य है, इसी प्रकार असौ [यह] त्वम् [तू] अहम् [मैं] इन तीनों ही में [के साथ] स्वयं यह शब्द कहा जाता है । [इससे स्वयं का अर्थ भी सामान्य ही समझना चाहिये और अहं का अर्थ विशेष लेना चाहिये ] । अहन्त्वाद्भिद्यतां स्वत्वं कूटस्थे तेन किं तव । स्वयंशब्दार्थ एवैष कूटस्थ इति मे भवेत् ॥४१॥ प्रश्नकर्त्ता पूछता है कि—'स्वपन' 'अहं' से भिन्न है तो हुआ करो, इससे कूटस्थ आत्मा के विषय में क्या सिद्ध करना चाहते हो ? उत्तर यह है कि—'यह सामान्य रूप जो स्वयं शब्दार्थ है वह ही तो कूटस्थ है' यह मेरी बात सिद्ध हो जाती है । अन्यत्ववारकं स्वत्वमिति चेदन्यवारणम् । कूटस्थस्यात्मतां वक्तु रिष्टमेव हि तद्भवेत् ॥४२॥ स्वत्व तो अन्यत्व का वारण किया करता है, ऐसा यदि