पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Header] चित्रदीपप्रकरणम् १४३
भी] भाग जाता है । तात्पर्य यह कि जो ज्ञान अविद्या को हटाता है उस ज्ञान से ही यह तादात्म्याध्यास [एकत्व भ्रम] भी निवृत्त हो जाता है । अविद्यावृतितादात्म्ये विद्ययैव विनश्यतः । विक्षेपस्य स्वरूपं तु प्रारब्धक्षयमीक्षते ॥५३॥ अविद्या का उत्पन्न किया हुआ आवरण और तादात्म्य ये दोनों तो विद्या [ज्ञान] से ही नष्ट हो जाते हैं । परन्तु विक्षेप का जो स्वरूप है यह तो प्रारब्धक्षय की वाट देखा ही करता है। शंका यह है कि—अविद्या का कार्य होने से, अविद्या के हटते ही, अध्यास भी हट जाता है, यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि ब्रह्मात्मैकत्वविद्या जब उत्पन्न हो जाती है, तब भी अविद्या के कार्य देहादि तो दीखते ही रहते हैं । इसका समा- धान यह है कि—केवल अविद्या से उत्पन्न होने वाले जो आवरण और तादात्म्य हैं वे तो विद्या [ज्ञान] के उत्पन्न होते ही निवृत्त हो जाते हैं । परन्तु जिस विक्षेप के बनने में अकेली अविद्या ही नहीं किन्तु कर्म और अविद्या दोनों मिलकर कारण होते हैं वह 'विक्षेप' तो तब तक बना ही रहेगा, जब तक कि भोग के द्वारा उस विक्षेप को बनाने वाले प्रारब्ध कर्म पूरे पूरे क्षीण नहीं हो जायेंगे । तात्पर्य यह है कि अकेली अविद्या के नष्ट होने से ही विक्षेप नष्ट नहीं होगा, किन्तु कर्म और अविद्या दोनों ही जब नष्ट हो चुकेंगे तभी इस 'विक्षेप' की निवृत्ति होगी। उपादाने विनष्टेऽपि क्षणं कार्यं प्रतीक्षते । इत्याहुस्तार्किका स्तद्वदस्माकं किं न संभवेत् ॥५४॥