भारतकोश
संग्रह पर लौटें

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

चित्रदीपप्रकरणम् १४३

[Header] चित्रदीपप्रकरणम् १४३

भी] भाग जाता है । तात्पर्य यह कि जो ज्ञान अविद्या को हटाता है उस ज्ञान से ही यह तादात्म्याध्यास [एकत्व भ्रम] भी निवृत्त हो जाता है । अविद्यावृतितादात्म्ये विद्ययैव विनश्यतः । विक्षेपस्य स्वरूपं तु प्रारब्धक्षयमीक्षते ॥५३॥ अविद्या का उत्पन्न किया हुआ आवरण और तादात्म्य ये दोनों तो विद्या [ज्ञान] से ही नष्ट हो जाते हैं । परन्तु विक्षेप का जो स्वरूप है यह तो प्रारब्धक्षय की वाट देखा ही करता है। शंका यह है कि—अविद्या का कार्य होने से, अविद्या के हटते ही, अध्यास भी हट जाता है, यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि ब्रह्मात्मैकत्वविद्या जब उत्पन्न हो जाती है, तब भी अविद्या के कार्य देहादि तो दीखते ही रहते हैं । इसका समा- धान यह है कि—केवल अविद्या से उत्पन्न होने वाले जो आवरण और तादात्म्य हैं वे तो विद्या [ज्ञान] के उत्पन्न होते ही निवृत्त हो जाते हैं । परन्तु जिस विक्षेप के बनने में अकेली अविद्या ही नहीं किन्तु कर्म और अविद्या दोनों मिलकर कारण होते हैं वह 'विक्षेप' तो तब तक बना ही रहेगा, जब तक कि भोग के द्वारा उस विक्षेप को बनाने वाले प्रारब्ध कर्म पूरे पूरे क्षीण नहीं हो जायेंगे । तात्पर्य यह है कि अकेली अविद्या के नष्ट होने से ही विक्षेप नष्ट नहीं होगा, किन्तु कर्म और अविद्या दोनों ही जब नष्ट हो चुकेंगे तभी इस 'विक्षेप' की निवृत्ति होगी। उपादाने विनष्टेऽपि क्षणं कार्यं प्रतीक्षते । इत्याहुस्तार्किका स्तद्वदस्माकं किं न संभवेत् ॥५४॥

फिर वे कर्म बने भी रहें, परन्तु जब विक्षेप का उपादान

१४४ पञ्चदशी फिर वे कर्म बने भी रहें, परन्तु जब विक्षेप का उपादान (अविद्या) ही नष्ट हो गया तब विक्षेप रूपी कार्य कैसे बना रह जाता है ? सो बताओ ? इसका उत्तर न्यायसिद्धान्त के अनु- सार दिया जाता है] उपादान के नष्ट हो जाने पर भी क्षणभर कार्य ठहरा रहता है। [कार्यकारणभाव को सिद्ध करने के लिये] यह बात तार्किकों ने मानी है। फिर ऐसा ही हमारे सिद्धान्तों में क्यों नहीं हो सकता है। तन्तूनां दिनसंख्यानां तैस्तादृक् क्षण ईरितः । भ्रमस्यासंख्यकल्पस्य योग्यः क्षण इहेष्यताम् ॥५५॥ जिन तन्तुओं की अवस्था दिनों में गिनी जा सकती है उनकी अवस्था के अनुसार ही उनका क्षण भी उन्होंने छोटा सा माना है। परन्तु असंख्य कल्पों की आयु वाले इस भ्रम का क्षण तो इसी अनुपात से कुछ लम्बा होना ही चाहिये। ऐसी अवस्था में यह आक्षेप ठीक नहीं है कि तार्किकों ने तो कार्य को क्षणमात्र रहनेवाला माना है। उनके विपरीत तुम कार्य को चिरकाल तक रहने वाला क्यों मानते हो ? देखो कि यह संसार अनादिकाल से चला आ रहा है। कुम्हार जब अपने चक्र को घुमाकर छोड़ देता है, तब वह पीछे भी चिरकाल तक घूमा ही करता है। इसी प्रकार अनादि काल के संस्कारों की प्रबलता से यह विक्षेप भी कुछ दिनों तो बिना चलाये भी चलता ही रहेगा। वह ज्ञान होते ही तुरन्त नष्ट नहीं हो जायगा। विना क्षोदक्षमं मानं तैर्वृथा परिकल्प्यते । श्रुतियुक्त्यनुभूतिभ्यो वदतां किं नु दुःशकम् ॥५६॥

चित्रदीपप्रकरणम् १४५

चित्रदीपप्रकरणम् १४५ जो प्रमाण क्षोद अर्थात् विचार को सह लेते हैं—विचार करने पर जिनका निर्णय उलट पुलट नहीं हो जाता—उन प्रमाणों के बिना ही उन तार्किकों ने तो मिथ्या की कल्पना कर रक्खी है, परन्तु श्रुति [ तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये ] युक्ति [ चक्र भ्रमादि के दृष्टान्त ] तथा विद्वान् लोगों के अनुभव रूपी प्रमाणों के सहारे से ही बोलने वाले हमको क्या दुःशक है । [ तात्पर्य यह है कि तार्किकों में और हममें इतना भेद है कि वे तो विचारसह प्रमाण के बिना ऐसा कहते हैं तथा हम श्रुति, युक्ति और विद्वदनुभव के आधार से ऐसा बोलते हैं । ] आस्तां दुस्तार्किकैः साकं विवादः प्रकृतं ब्रुवे । स्वाह्वयोः सिद्धमेकत्वं कूटस्थपरिणामिनोः ॥५७॥ दुस्तार्किकों के साथ विवाद को यहीं छोड़कर अब हम प्रकृत पर आते हैं । स्व जो कूटस्थ है तथा अहं जो परिणामी है उन दोनों की एकता [ भ्रान्तिसे ] हो जाती है, यह बात तो सिद्ध की जा चुकी है । भ्राम्यन्ते पण्डितम्मन्याः सर्वे लौकिकतैर्थिकाः । अनादृत्य श्रुतिं मौर्यात् केवलां युक्तिमाश्रिताः ॥५८॥ जितने भी लौकिक और तैर्थिक लोग हैं, वे सभी अपने आप को महाज्ञानी मानते हैं और भ्रम में ही गोते खाया करते हैं । ये लोग अपनी मूर्खता से श्रुति का अनादर करके केवल युक्ति पर निर्भर हो गये हैं । [ इसी कारण से कूटस्थ और जीव की जो भ्रान्तिसिद्ध एकता है उसको वे पहचानते नहीं

१४६ पञ्चदशी हैं। यदि वे श्रुति के तात्पर्य का विचार करते तो इस भ्रान्ति- सिद्ध एकता को पहचान जाते । ] पूर्वापरपरामर्शविकलास्तत्र केचन । वाक्याभासान् स्वस्वपक्षे योजयन्त्यप्यलज्जया ॥५९॥ उन्हीं लोगों में से कुछ लोग पूर्वापर का विचार तक नहीं करते हैं और निर्लज्ज होकर श्रुति के वाक्याभासों को अपने अपने पक्ष में लगाया भी करते हैं। कूटस्थादिशरीरान्तसंघातस्यात्मतां जगुः। लोकायताः पामराश्च प्रत्यक्षाभासमाश्रिताः ॥६०॥ प्रत्यक्षाभास का आश्रय लिये हुए लोकायतों ने तथा पामर [ महामूर्ख ] लोगों ने, कूटस्थ से लेकर शरीर पर्यन्त अनेक पदार्थों के इस संघात [जमघट] को ही आत्मा कह डाला है। श्रौतीकर्तुं स्वपक्षं ते कोशमन्नमयं तथा । विरोचनस्य सिद्धान्तं प्रमाणं प्रतिजज्ञिरे ॥६१॥ उन्होंने अपने पक्ष पर श्रुति की मोहर लगाने के लिये, अन्नमय कोश का प्रतिपादन करनेवाले 'स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः' इस वाक्य का उद्धरण किया है। तथा विरोचन के 'आत्मैव देहमयः' इस सिद्धान्त को प्रमाण मान लिया है [परन्तु प्रकरण- विरोध के कारण ऐसा उपपादन करने का सामर्थ्य उनमें नहीं है]। जीवात्मनिर्गमे देहमरणस्यात्र दर्शनात् । देहातिरिक्त एवात्मेत्याहुर्लोकायताः परे ॥६२॥ जीवात्मा जब निकल जाता है तब यह देह मर जाता है। इस कारण आत्मा देह से भिन्न है, यह बात दूसरे लोकायत मानते हैं।

चित्रदीपप्रकरणम् १४७

चित्रदीपप्रकरणम् १४७ प्रत्यक्षत्वेनाभिमतांधीं देहातिरेकिणम् । गमयेदिन्द्रियात्मानं वच्मीत्यादिप्रयोगतः ॥६३॥ अहं वच्मि अहं पश्यामि=मैं बोलता हूँ मैं देखता हूँ इत्यादि प्रयोगों से प्रतीत होता है कि प्रत्यक्ष मानी हुई यह अहंबुद्धि, देह से भिन्न इन्द्रियों को आत्मा बता रही है । वागादीनामिन्द्रियाणां कलहः श्रुतिषु श्रुतः । तेन चैतन्यमेतेषा मात्मत्वं तत एव हि ॥६४॥ श्रुतियों में वाणी आदि इन्द्रियों का कलह सुना गया है । इस कारण ये इन्द्रियाँ चेतन है । चेतन होने के कारण ही ये इन्द्रियां आत्मा भी हैं । हैरण्यगर्भाः प्राणात्मवादिनस्त्वेवमूचिरे । चक्षुराद्यक्षलोपेऽपि प्राणसत्वे तु जीवति ॥६५॥ प्राणात्मवादी हैरण्यगर्भ तो यह कहते हैं कि चक्षु आदि इन्द्रियाँ जब टूट फूट भी जाती हैं, तब भी प्राण के रहने पर जीता ही रहता है, इस कारण प्राण ही आत्मा है । प्राणो जागर्ति सुप्तेऽपि प्राणश्रैष्ठ्यादिकं श्रुतम् । कोशः प्राणमयः सम्यग्विस्तरेण प्रपञ्चितः ॥६६॥ प्राणादय एवैतस्मिन् पुरे जाग्रति (प्रश्न ४-३) इसमें कहा गया है कि सो जाने पर भी प्राण जागता रहता है । तदेदुक्थम् (छा० १-७-५) इसमें प्राण को श्रेष्ठ बताया गया है । अन्यो- ऽन्तर आत्मा प्राणमयः (तै० २-२) इसमें प्राणमय कोश का कथन विस्तार से किया गया है। यों प्राण को आत्मा सिद्ध करने वाले अनेक श्रौत लिंग हैं ।

१४८ पञ्चदशी मन आत्मेति मन्यन्त उपासनपरा जनाः । प्राणस्याभोक्तृता स्पष्टा भोक्तृत्वं मनसस्ततः ॥६७॥ उपासना करने वाले मन को ही आत्मा मानते हैं। क्योंकि प्राण का अभोक्ता पन तो सबको विदित ही है। इस कारण मन ही भोक्ता है (और वही आत्मा है)। मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । श्रुतो मनोमयो कोश स्तेनात्मेतीरितं मनः ॥६८॥ मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण है। तस्माद्वा एतस्मात् प्राणमयादन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः (तै० २-३) इस श्रुति में मनोमय कोश का वर्णन भी आता है। इसी से मन को आत्मा कहा जाता है। विज्ञान मात्मेति पर आहुः क्षणिकवादिनः । यतो विज्ञानमूलत्वं मनसो गम्यते स्फुटम् ॥६९॥ दूसरे क्षणिकवादी बौद्ध लोग विज्ञान को ही आत्मा कहते हैं। क्योंकि यह मन विज्ञानमूलक है, यह तो सभी को प्रत्यक्ष होता है। अहंवृत्ति रिदंवृत्ति रित्यन्तःकरणं द्विधा । विज्ञानं स्यादहंवृत्ति रिदंवृत्तिर्मनो भवेत् ॥७०॥ अन्तःकरण दो प्रकार का होता है—एक 'अहंवृत्ति' दूसरा 'इदंवृत्ति'। विज्ञान अर्थात् बुद्धि को 'अहंवृत्ति' कहते हैं, मन को 'इदंवृत्ति' कहा जाता है। इस प्रकार एक होने पर भी वृत्ति- भेद के कारण 'मन' और 'विज्ञान' कहाने लगता है।

चित्रदीपप्रकरणम् १४९

चित्रदीपप्रकरणम् १४९ [जब बाहर के पदार्थों का ज्ञान होता है, तब मन उत्पन्न हो जाता है। जब बाहर के पदार्थों का ज्ञान नहीं होता जब केवल अपने आपे का बोध ही रहता है तब बुद्धि का राज्य रहता है । बुद्धि का काम आपे को जानना है मन का काम बाहर के पदार्थों की देख भाल करना है !] अहंप्रत्ययबीजत्व मिदंवृत्तेरिति स्फुटम् । अविदित्वा स्वमात्मानं बाह्यं वेत्ति न तु क्वचित् ॥७१॥ [मन और विज्ञान का कार्यकारणभाव इस श्लोक में बताया गया है ] यह ‘इदंवृत्ति’ [ बाहर के पदार्थों की प्रतीति ] ‘अहं प्रत्यय’ से [ मैं इस ज्ञान के अन्दर से ] उत्पन्न हुआ करती है । जभी तो अपने आपे को पहले बिना जाने कहीं भी कोई बाह्य पदार्थ को नहीं जानता। [तात्पर्य यह कि पहले अहंवृत्ति [ मैं भाव ] उदय हो लेती है, तब पीछे से इदंवृत्ति पैदा हुआ करती है। यों इन दोनों में कार्य कारण भाव है।] क्षणे क्षणे जन्मनाशावहंवृत्तेर्मितौ यतः । विज्ञानं क्षणिकं तेन, स्वप्रकाशं स्वतो मितेः ॥७२॥ इस अहंवृत्ति का जन्म और नाश क्षण क्षण में होता रहता है । कभी यह पैदा होती है, क्षण भर बाद फिर मर जाती है । यों अनुभव से विज्ञान (अहंवृत्ति) की क्षणिकता सिद्ध हो जाती है । अपने से ही प्रमित होने के कारण यह विज्ञान स्वयं प्रकाश भी है । [क्योंकि यह ज्ञान ही अपने आपको जानता है, इसलिये यह स्वयं प्रकाश है ।]

१५० पञ्चदशी विज्ञानमयकोशोयं जीव इत्यागमा जगुः । सर्वसंसार एतस्य जन्मनाशसुखादिकः ॥७३॥ 'तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयादन्योऽन्तरआत्मा विज्ञानमयः' (तै० २-४) 'विज्ञानं यज्ञं तनुते' (तै० २-५) इत्यादि आगमों ने विज्ञानमय कोष को ही 'जीव' कहा है । जन्म, नाश तथा सुखादि नामक यह सम्पूर्ण संसार इस विज्ञानमय कहलाने वाले जीव का ही तो है । विज्ञानं क्षणिकं नात्मा विद्युदभ्रनिमेषवत् । अन्यस्यानुपलब्धत्वाच्छून्यं माध्यमिका जगुः ॥७४॥ माध्यमिक नाम के शून्यवादी बौद्ध तो कहते हैं कि— बिजली, बादल, तथा निमेष के समान क्षण भर में नष्ट हो जाने वाला क्षणिक विज्ञान, आत्मा नहीं है। इसके अतिरिक्त और तो कुछ दीखता ही नहीं, इसलिये 'शून्य' ही आत्मा है । असदेवेदमित्यादाविदमीव श्रुतं ततः । ज्ञानज्ञेयात्मकं सर्वं जगद् भ्रान्तिप्रकल्पितम् ॥७५॥ निरधिष्ठानविभ्रान्ते रभावादात्मनोऽस्तिता । शून्यस्यापि ससाक्षित्वा दन्यथा नोक्तिरस्य ते ॥७६॥ उन शून्यवादियों का यह मत ठीक नहीं है। क्योंकि बिना अधिष्ठान का तो कोई भ्रम होता ही नहीं। इस कारण से इस भ्रान्त जगत्कल्पना के अधिष्ठान आत्मा को तो मानना ही पड़ता है। शून्यवादी का यह शून्य भी तो ससाक्षिक ही होना चाहिये । [इस शून्य का साक्षी अर्थात् शून्य को जानने वाला भी तो कोई होना ही चाहिये] यदि उस साक्षी को न मानोगे

[Header] चित्रदीपप्रकरणम् १५१

[Header] चित्रदीपप्रकरणम् १५१ तो तुम्हारे [बौद्ध के] मत में शून्य का कहना भी सिद्ध नहीं हो सकेगा। [यों शून्य को जानने वाला तत्व तो तुम्हें भी मानना ही पड़ेगा।] अन्यो विज्ञानमयत आनन्दमय आन्तरः। अस्तीत्येवोपलब्धव्य इति वैदिकदर्शनम् ॥७७॥ [सभी को मना करते जाते हो फिर आत्मा क्या चीज है? इस बात का उत्तर इस श्लोक में दिया है] तस्माद्वा एतस्मा द्विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः (तै० २-५) अस्तीत्येवोपलब्ध- व्यस्तत्वभावेन (क० २-६-१३) इन श्रुतियों के आधार से इन सब से भिन्न आनन्दमय आत्मा मानना चाहिये। ऐसा वैदिक सिद्धान्त है। अणुर्महान् मध्यमो वेत्येवं तत्रापि वादिनः। बहुधा विवदन्ते हि श्रुतियुक्तिसमाश्रयात् ॥७८॥ ['आत्मस्वरूप में ही नहीं उसके परिमाण में भी लोगों के अनेक मत हैं' यह अब दिखाया जाता है] श्रुति और युक्ति के सहारे से वादी लोग आत्मा को अणु, महान् या मध्यम बताते हैं और आपस में एक दूसरे से अनेक प्रकार के विवाद करते हैं। अणुं वदन्त्यन्तरालाः सूक्ष्मनाडीप्रचारतः । रोम्णः सहस्रभागेन तुल्यासु प्रचरत्ययम् ॥७९॥ अणुत्ववादी लोग सूक्ष्म नाडियों में प्रचार के कारण आत्मा को अणु कहते हैं। रोम के सहस्र भाग के तुल्य जो सूक्ष्म नाडियां हैं उनमें भी वह घूमा करता है। [ऐसी सूक्ष्म नाडियों में अणु होने के बिना आत्मा का प्रचार कैसे हो ?]

१५२ पञ्चदशी अणोरणीयानेषोऽणुः सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरं त्विति । अणुत्वमाहुः श्रुतयः शतशोऽथ सहस्रशः ॥८०॥ अणोरणीयान् महतो महीयान् (कठ० १-२-२०) एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं त्विति (मुण्ड० ३-१-९) इत्यादि श्रुतियों में अनेक स्थान पर आत्मा को अणु से भी अणीयान् तथा सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर कहा गया है । वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च । भागो जीवः स विज्ञेय इति चाहापरा श्रुतिः ॥८१॥ वालाग्र का सौवां भाग लिया जाय, फिर उसके भी सौवें भाग की कल्पना की जाय तो उस अत्यन्त छोटे भाग को ही जीव जानना चाहिये । यह भी एक श्रुति में कहा है । दिगम्बरा मध्यमत्व माहुरापादमस्तकम् । चैतन्यव्याप्तिसंदृष्टे रानखाग्रश्रुतेरपि ॥८२॥ दिगम्बर [जैन] लोग आत्मा को मध्यम परिमाण वाला मानते हैं। क्योंकि चैतन्य की व्याप्ति पैर से लेकर चोटी पर्यन्त देखी जाती है । स एष इह प्रविष्ट आनखाग्रेभ्यः इस श्रुति से भी वे आत्मा को मध्यम परिमाण वाला सिद्ध करते हैं। सूक्ष्मनाडीप्रचारस्तु सूक्ष्मैरवयवैर्भवेत् । स्थूलदेहस्य हस्ताभ्यां कञ्चुकप्रतिमोकवत् ॥८३॥ आत्मा को मध्यम परिमाण वाला मानने पर भी उस आत्मा का सूक्ष्म नाडियों में प्रचार तो सूक्ष्म अवयवों के द्वारा ठीक इसी प्रकार हो जायगा. जैसे कि देह के हाथ आदि अवयव जब कुरते में घुस जाते हैं तब वह देह का ही कुरते में घुसना

चित्रदीपप्रकरणम् १५३

चित्रदीपप्रकरणम् १५३

माना जाता है [आत्मा के अवयव जब सूक्ष्म नाडियों में प्रचार करेंगे तब उसे आत्मा का ही प्रचार मान लिया जायगा।] न्यूनाधिकशरीरेषु प्रवेशोऽपि गमागमैः । आत्मांशानां भवेत्, तेन मध्यमत्वं विनिश्चितम् ॥८४॥ आत्मा का जब एक नियत मध्यम परिमाण मानेंगे तब जब वह छोटे बड़े शरीरों में प्रवेश करेगा, उस समय आत्मा के कुछ अवयव घट बढ़ जाया करेंगे। फिर जैसे देह छोटे बड़े हो जाते हैं इसी प्रकार आत्मा के अंश भी घट बढ़ जायँगे। यों आत्मा तो मध्यम परिमाण ही है ऐसा उन्होंने अपने मन को समझा रक्खा है। सांशस्य घटवन्नाशो भवत्येव, तथा सति । कृतनाशाकृताभ्यागमयोः को वारको भवेत् ॥८५॥ आत्मा को सावयव मानने पर घटादि की तरह उसका नाश होगा ही। फिर कृतनाश और अकृताभ्यागम नाम के दोषों को हटानेवाला कौन होगा उसे बताओ ? [किये हुए पुण्य पाप जब बिना भोग दिये नष्ट हो जाते हैं तब उसे 'कृत- नाश' कहते हैं। जब तो बिना किये ही कुछ भोगना पड़ जाता है तब वह 'अकृताभ्यागम' कहा जाता है। आत्मा को अनित्य मानने में ये दो दोष आते हैं।] तस्मादात्मा महानेव नैवाणुर्नापि मध्यमः । आकाशवत् सर्वगतो निरंशः श्रुतिसम्मतः ॥८६॥ यों परिशेष से यही सिद्ध होता है कि यह आत्मा तो महान् [विभु=व्यापक] ही है। यह न तो अणु है और न यह मध्यम परिमाण वाला ही है। आकाशवत् सर्वगतश्च नित्यः १०

१५४ पञ्चदशी निष्कलं निष्क्रियम् [ श्वेता० ६-१९ ] इत्यादि श्रुतियें आत्मा को आकाश की तरह सर्वत्र व्यापक तथा निरवयव मानती हैं । इत्युक्त्वा तद्विशेषे तु बहुधा कलहं ययुः । अचिद्रूपोऽथ चिद्रूपश्चिदचिद्रूप इत्यपि ॥८७॥ यों आत्मा की विभुता तो सिद्ध हो गयी । परन्तु उसके विशेष धर्मों के विषय में भी अनेक विवाद चलते हैं । कोई कहता है आत्मा 'अचिद्रूप' है। दूसरा आत्मा को 'चिद्रूप' मानता है । कोई उसे चिदचिद्रूप भी बता देता है । प्राभाकरास्तार्किकाश्च प्राहुरस्याचिदात्मताम् । आकाशवद् द्रव्यमात्मा शब्दवत् तद्गुणश्चितिः ॥८८॥ प्राभाकर और तार्किक दोनों ही इसको अचिद्रूप बताते हैं। वे कहते हैं कि—आत्मा भी आकाश की तरह एक द्रव्य है। शब्द जैसे आकाश का गुण है इसी प्रकार चिति [ चैतन्य ] उस. आत्मा का गुण है। [ इस चैतन्य गुण ने ही इस आत्मा को पृथिवी आदि सब से भिन्न कर दिया है ] । इच्छाद्वेषप्रयत्नाश्च धर्माधर्मौ सुखासुखे । तत्संस्काराश्च तस्यैते गुणाश्चितिवदीरिताः ॥८९॥ इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्माधर्म, सुख, दुःख, तथा उनके संस्कार ये सब चेतना के समान ही आत्मा के गुण हैं । आत्मनो मनसा योगे स्वादृष्टवशतो गुणाः । जायन्तेऽथ प्रलीयन्ते सुषुप्तेऽदृष्टसंक्षयात् ॥९०॥ आत्मा का जब मन से योग हो जाता है, तब अपने अदृष्ट के प्रताप से ये गुण उत्पन्न हो जाते हैं, तथा सुषुप्ति के समय जब अदृष्ट का क्षय हो जाता है तब ये गुण नष्ट हो जाते हैं ।

चितिमत्त्वाच्चेतनोऽयमिच्छाद्वेषप्रयत्नवान् । स्याद्धर्माधर्मयोः कर्ता भोक्ता दुःखादिमत्त्वतः ॥९१॥ चिति नामक गुणवाला होने से यह चेतन है [ यों स्वयं अचिद्रूप होने पर भी इसको चेतन मान लिया जाता है ] चेतन होने का एक और भी प्रमाण है कि इसमें इच्छा, द्वेष तथा प्रयत्न नाम के गुण विद्यमान हैं। यह आत्मा धर्माधर्म का कर्ता है। दुःखादिवाला होने से इसे भोक्ता माना जाता है [ यों उसमें ईश्वर तत्व से विलक्षणता पायी जाती है। ] यथात्र कर्मवशतः कादाचित्कं सुखादिकम् । तथा लोकान्तरे देहे कर्मणेच्छादि जन्यते ॥९२॥ जैसे कर्म के वश यहाँ ( इस लोक में ) कभी कभी होने वाले सुखादि होते हैं, इसी प्रकार लोकान्तर में [ मिले हुए ] दूसरे देह में भी, कर्म से ही इच्छादि हो जाते हैं। विभु होने पर आत्मा लोकान्तर गमन आदि कैसे करेगा ? इसका समाधान यह है कि—जैसे इस देह में कर्म के वश इच्छा आदि उत्पन्न होते हैं तो इसे यहाँ आत्मा का रहना मान लिया जाता है, इसी प्रकार कर्म के वश जब लोकान्तर में देहान्तर मिलता है तब उस देहावच्छिन्न आत्मा के प्रदेश में ही सुखादि उत्पन्न होने लगते हैं और वहाँ आत्मा का गमनादि मान लिया जाता है। वस्तुतः आत्मा में गमनादि कुछ नहीं होता। एवं च सर्वगस्यापि संभवेतां गमागमौ । कर्मकाण्डः समग्रोऽत्र प्रमाणमिति तेऽवदन् ॥९३॥ इस प्रकार सर्वग [ सर्वत्र व्यापक ] आत्मा का भी आना

१५६ पञ्चदशी जाना संभव हो जाता है। आत्मा में कर्तृत्वादि धर्म रहते हैं इस बात में सम्पूर्ण कर्मकाण्ड प्रमाण है ऐसा वे कहते हैं। [ यदि आत्मा कर्ता नहीं है तो कर्मकाण्ड की रचना क्यों की गयी है ? ] आनन्दमयकोशो यः सुषुप्तौ परिशिष्यते । अस्पष्टचित् स आत्मैषां पूर्वकोशोऽस्य ते गुणाः ॥९४॥ सुषुप्ति के समय जो 'आनन्दमय कोश' शेष रह जाता है जिसमें चेतनता अस्पष्ट रूप से रहती है, कोशों में सबसे पहला कोश यह आनन्दमय कोश ही इन प्रभाकर आदियों का आत्मा है। वे पूर्वोक्त इच्छा आदि इसी के गुण हैं। [ तात्पर्य यह कि जिस आत्मा को हमने पहले आनन्दमय कहा था इच्छादि वाला वही उनका सम्मत आत्मा है । ] गूढं चैतन्यमुत्प्रेक्ष्य जडबोधस्वरूपताम् । आत्मनो ब्रुवते भाट्टाश्चिदुत्प्रेक्षोत्थितस्मृतेः ॥९५॥ कुमारिल भट्ट के अनुयायी तो इसी आत्मा के गूढ अर्थात् अस्पष्ट चैतन्य की ऊहना कर लेते हैं फिर इसको चैतन्य और जड उभय रूप मानते हैं। वे कहते हैं कि सोकर उठे हुए पुरुष को जो स्मृति होती है उससे चैतन्य की उत्प्रेक्षा होती है। सो- कर उठा हुआ पुरुष जब स्मरण करता है तब उससे सुषुप्ति के समय के चैतन्य की ऊहना कर ली जाती है। जडो भूत्वा तदास्वाप्समिति जाड्यस्मृतिस्तदा । विना जाड्यानुभूतिं न कथंचिदुपपद्यते ॥९६॥ [ चैतन्य की उत्प्रेक्षा करने की उनकी परिपाटी यह है 'कि ]—सुषुप्ति के समय 'मैं जड होकर सोया पड़ा था' ऐसा

चित्रदीपप्रकरणम् १५७

चित्रदीपप्रकरणम् १५७ एक जडता का स्मरण सोकर उठे हुए पुरुषों को होता है । सो यह स्मरण तब तक नहीं हो सकता जब तक कि सुषुप्ति काल की जडता को उसने अनुभव न किया हो [ बस इसी से उस समय की जड़ता का अनुभव मान लिया जाता है । ] द्रष्टुर्दृष्टेरलोपश्च श्रुतः सुप्तौ ततस्त्वयम् । अप्रकाशप्रकाशाभ्यामात्मा खद्योतवद् युतः ॥९७॥ नहि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते अविनाशित्वात् [बृह० ४-३-२३] इस श्रुति में कहा है कि द्रष्टा आत्मा की जो स्वरूपभूत दृष्टि है उसका लोप कभी नहीं होता । क्योंकि वह दृष्टि विनाश- रहित स्वभाव वाली है । इस प्रमाण से भी यही सिद्ध होता है कि यह आत्मा खद्योत के समान प्रकाश और अप्रकाश [ स्फुरण और अस्फुरण ] दोनों ही से युक्त है । निरंशस्योभयात्मत्वं न कथंचिद्घटिष्यते । तेन चिद्रूप एवात्मेत्याहुः सांख्यविवेकिनः ॥९८॥ निरंश [ निरवयव ] पदार्थ किसी प्रकार भी उभय रूप नहीं हो सकता । इस कारण सांख्यविवेकी यह मानते हैं कि आत्मा तो केवल चिद्रूप ही है । जाड्यांशः प्रकृते रूपं विकारि त्रिगुणं च तत् । चितो भोगापवर्गार्थं प्रकृतिः सा प्रवर्तते ॥९९॥ [जाड्य का जो स्मरण उठे हुए पुरुषों को होता है उस स्मरण में] जो जाड्य भाग है वह तो प्रकृति का रूप है । वह विकारी है । वह सत्व रज तम इन त्रिगुणात्मक है । चेतन पुरुष को भोग और अपवर्ग दिलाने के लिये वह प्रकृति प्रवृत्त हुआ करती है ।

जाता है, विवेकी हो जाता है, तब यही उसे अपवर्ग अर्थात्

१५८ पञ्चदशी तक यह प्रकृति उसे भोग देती है जब यह पुरुष भोगों से उकता जाता है, विवेकी हो जाता है, तब यही उसे अपवर्ग अर्थात् मुक्ति दे देती है ] असङ्गायाश्चिते र्बन्धमोक्षौ भेदाग्रहान्मतौ । बन्धमुक्तिव्यवस्थार्थं पूर्वेषामिव चिद्भिदा ॥११०॥ यद्यपि चिति असंग ही है। परन्तु भेदाग्रह के कारण बंध भी जाती है और मुक्त भी हो जाती है। बन्ध और मुक्ति की व्यवस्था के लिये ये सांख्य भी पहलों [नैयायिकों, प्राभाकरों, भाट्टों] की तरह चेतनों का भेद मानते हैं। प्रश्न यह था कि चिति जब असंग है और प्रकृति तथा पुरुष अत्यन्त विविक्त है, फिर विचारी प्रकृति की प्रवृत्ति से असंग पुरुष को भोग और अपवर्ग कैसे होगये ? इसका उत्तर यह है कि—प्रकृति और पुरुष के भेद को ग्रहण न करने से भोग और अपवर्ग [बन्ध और मोक्ष] दोनों ही हो गये हैं। महतः परमव्यक्तमिति प्रकृति रुच्यते । श्रुतावसङ्गता तद्वदसङ्गो हीत्यतः स्फुटा ॥१११॥ महतः परमव्यक्तम् [ कठ० ३-११ ] इस श्रुति में प्रकृति के होने का वर्णन है। असङ्गो ह्ययं पुरुषः [ बृ० ४-३-१५ ] इस श्रुति में पुरुष की असंगता का प्रतिपादन किया गया है। चित्सन्निधौ प्रवृत्तायाः प्रकृतेर्हि नियामकम् । ईश्वरं ब्रुवते योगाः स जीवेभ्यः परः श्रुतः ॥१०२॥ [ जीव के विषय में ही नहीं ईश्वर विषय में भी वादियों के बड़े उलटे सीधे विचार हैं। उन्हीं को अब दिखाया जाता

चित्रदीपप्रकरणम् १५९

चित्रदीपप्रकरणम् १५९ है ] योग वाले कहते हैं कि-चेतन आत्माओं की सन्निधि में जो प्रकृति प्रवृत्त होती है उस प्रकृति को नियम में रखनेवाला 'ईश्वर' है । उसी को श्रुति में जीवों से 'पर' कहा गया है । प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेश इति हि श्रुतिः । आरण्यके संभ्रमेण ह्यन्तर्याम्युपपादितः ॥१०३॥ प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः [ श्वे० ६-१६ ] इस श्रुति में जीव से पर ईश्वर का प्रतिपादन किया गया है कि प्रधान तथा क्षेत्रज्ञों, [ जीवों ] का पालक, सत्त्वादि गुणों का ईश, किंवा नियामक है । बृहदारण्यक के अन्तर्यामि ब्राह्मण में तो बड़ी तत्परता से 'अन्तर्यामी' का उपपादन किया गया है । अत्रापि कलहायन्ते वादिनः स्वस्वयुक्तिभिः । वाक्यान्धपि यथाप्रज्ञं दाढर्यायोदाहरन्ति हि ॥१०४॥ इस ईश्वर विषय में भी वादी लोग अपनी अपनी युक्तियों से विवाद करते हैं और अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार अपने मत की दृढ़ता के लिये श्रुति वाक्यों का उद्धार भी करते हैं । क्लेशकर्मविपाकै स्तदाशयैरप्यसंयुतः । पुंविशेषो भवेदीशो जीववत् सोप्यसंगचित् ॥१०५॥ अविद्या आदि पाँच क्लेशों, चारों प्रकार के कर्मों, कर्म- विपाकों तथा इन सब के संस्कारों से अस्पृष्ट रहनेवाला, जो कोई पुरुषविशेष है, वही ईश्वर है । वह भी जीव के समान ही असङ्ग और चिद्रूप है । तथापि पुंविशेषत्वाद् घटतेऽस्य नियन्तृता । अव्यवस्थौ बन्धमोक्षा वापतेतामिहान्यथा ॥१०६॥ यद्यपि वह ईश्वर असङ्गचित् है तौ भी, पुरुषविशेष होने

१६० पञ्चदशी के कारण, यह नियामक हो सकता है। ईश्वर को यदि निया- मक न मानें तो बन्धामोक्ष की कोई व्यवस्था ही इस लोक में न रहेगी। [फिर इस व्यवस्था को कौन करेगा ?] भीषास्मादित्येवमादा वसङ्गस्य परात्मनः । श्रुतं तद्युक्तमप्यस्य क्लेशकर्माद्यसंगमात् ॥१०७॥ भीषास्माद्वातः पवते [ तै० २-८ ] इत्यादि श्रुतियों में इस असंग परमात्मा को नियन्ता बताया गया है। उसमें जीवों में पाये जाने वाले क्लेशादि के न होने से उसकी नियामकता युक्तिसंगत भी है। जीवानाम्प्यसङ्गत्वात् क्लेशादिर्न ह्यथापि च । विवेकाग्रहः क्लेशकर्मादि प्रागुदीरितम् ॥१०८॥ असङ्ग होने के कारण यद्यपि जीव भी क्लेशादि से रहित ही हैं परन्तु विवेकाग्रह [ प्रकृति और पुरुष के भेद को न समझने ] के कारण इन जीवों को क्लेशादि होते हैं, यह बात हम पहले कह चुके हैं। नित्यज्ञानप्रयत्नेच्छा गुणानीशस्य मन्वते । असङ्गस्य नियन्तृत्व मयुक्तमिति तार्किकाः ॥१०९॥ तार्किक लोग तो असंग आत्मा के नियामकपने को सहन ही नहीं करते इससे उन्होंने तो जीवों से विलक्षण रखने के लिये ईश्वर में नित्य ज्ञान, नित्य प्रयत्न तथा नित्य इच्छा को माना है। पुंविशेषत्वमप्यस्य गुणैरेव न चान्यथा । सत्यकामः सत्यसंकल्प इत्यादि श्रुतिर्जगौ ॥११०॥ [गुणों ही के कारण उसको पुरुष विशेष मान लिया है। जीवों के इच्छा आदि गुण अनित्य हैं। ईश्वर के इच्छा आदि

चित्रदीपप्रकरणम् १६१

चित्रदीपप्रकरणम् १६१ तीनों गुण नित्य हैं । ] इनके अतिरिक्त जीव और ईश्वर के विलक्षण होने का और कोई कारण नहीं है । इन गुणों की नित्यता के विषय में श्रुति ने स्वयं कहा है कि वह् सत्य काम है सत्य संकल्प है । नित्यज्ञानादिमत्त्वेऽस्य सृष्टिरैव सदा भवेत् । हिरण्यगर्भ ईशोऽतो लिङ्गदेहेन संयुतः ॥१११॥ ईश्वर को यदि नित्यज्ञानादिवाला मानें तो वह सदा सृष्टि ही बनाता रहे । इस कारण लिङ्गदेह से युक्त हिरण्यगर्भ को ही ईश्वर मानना चाहिये । [ समष्टि लिङ्ग शरीर के अभि- मानी परमात्मा को हिरण्यगर्भ कहते हैं । उसके लिंगदेह अर्थात् मन में जब इच्छा होगी तभी वह सृष्टि बनायेगा, यों सदा सृष्टि नहीं रहेगी । कभी कभी होगी । ] उद्गीथब्राह्मणे तस्य माहात्म्यमतिविस्तृतम् । लिङ्गसत्त्वेऽपि जीवत्वं नास्य कर्माद्यभावतः ॥११२॥ इस हिरण्यगर्भ की महत्ता उद्गीथ ब्राह्मण में विस्तारपूर्वक वर्णित है । लिङ्ग शरीर होने पर भी इसमें जीवभाव तो इस लिये नहीं आता कि इसके अविद्या, काम तथा कर्म नहीं होते हैं । स्थूलदेहं विना लिङ्गदेहो न क्वापि दृश्यते । वैराजो देह ईशोऽतः सर्वतो मस्तकादिमान् ॥११३॥ स्थूल देह के बिना तो केवल लिङ्गदेह कहीं भी दीखता नहीं है, इस कारण स्थूल शरीरों की समष्टि का अभिमानी जो 'विराट्' है वही ईश्वर है । सहस्रशीर्षेत्येवं च विश्वतश्चक्षुरित्यपि । श्रुतमित्याहुरनिशं विश्वरूपस्य चिन्तकाः ॥११४॥

सर्वतः पाणिपादत्वे कृम्यादेरपि चेशता ।

१६२ पञ्चदशी विराट् के उपासक अपने समर्थन में कहते हैं कि सहस्र शीर्षा पुरुषः [ श्वे० ३-४ ] तथा विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतस्पात् [ श्वे० ३-३ ] इत्यादि वाक्य अनेक बार श्रुतियों में आये हैं । इन वाक्यों से विराट् के ईश्वरभाव का समर्थन होता है । सर्वतः पाणिपादत्वे कृम्यादेरपि चेशता । ततश्चतुर्मुखो देव एवेशो नेतरः पुमान् ॥११५॥ उपर्युक्त श्रुति के अनुसार यदि उस ईश्वर को सब ओर हाथ पैर वाला मान लें तो ऐसी कीड़ियां भी हैं जिनके चारों ओर हाथ पैर होते हैं वे भी ईश्वर हो जांयगी । इस कारण चार मुख वाला देवता ही ईश्वर है दूसरा कोई नहीं । पुत्रार्थं तमुपासीना एवमाहुः, प्रजापतिः । प्रजा असृजतेत्यादिश्रुतिं चोदाहरन्त्यमी ॥११६॥ सन्तान के लिये उसके उपासक लोगों ने यह बात कही है । वे लोग अपनी पुष्टि में 'प्रजापतिः प्रजा असृजत' इत्यादि श्रुति का प्रमाण भी देते हैं । विष्णोर्नाभेः समुद्भूतो वेधाः कमलजस्ततः । विष्णुरेवेश इत्याहुर्लोके भागवता जनाः ॥११७॥ भागवतों का कहना है कि—कमलयोनि विधाता तो विष्णु की नाभि से उत्पन्न हुआ है । इस कारण 'विष्णु' ही ईश्वर है । शिवस्य पादावन्वेष्टुं शार्ङ्ग्यशक्तस्ततः शिवः । ईशो न विष्णु रित्याहुः शैवा आगममानिनः ॥११८॥ आगममानी शैव तो कहते हैं कि—शिव के पैरों को ढूँढते ढूँढते शार्ङ्गी अशक्त हो गया था । इस कारण विष्णु ईश्वर नहीं है किन्तु 'शिव' ही ईश्वर है ।