पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
चित्रदीपप्रकरणम् १५७
चित्रदीपप्रकरणम् १५७ एक जडता का स्मरण सोकर उठे हुए पुरुषों को होता है । सो यह स्मरण तब तक नहीं हो सकता जब तक कि सुषुप्ति काल की जडता को उसने अनुभव न किया हो [ बस इसी से उस समय की जड़ता का अनुभव मान लिया जाता है । ] द्रष्टुर्दृष्टेरलोपश्च श्रुतः सुप्तौ ततस्त्वयम् । अप्रकाशप्रकाशाभ्यामात्मा खद्योतवद् युतः ॥९७॥ नहि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते अविनाशित्वात् [बृह० ४-३-२३] इस श्रुति में कहा है कि द्रष्टा आत्मा की जो स्वरूपभूत दृष्टि है उसका लोप कभी नहीं होता । क्योंकि वह दृष्टि विनाश- रहित स्वभाव वाली है । इस प्रमाण से भी यही सिद्ध होता है कि यह आत्मा खद्योत के समान प्रकाश और अप्रकाश [ स्फुरण और अस्फुरण ] दोनों ही से युक्त है । निरंशस्योभयात्मत्वं न कथंचिद्घटिष्यते । तेन चिद्रूप एवात्मेत्याहुः सांख्यविवेकिनः ॥९८॥ निरंश [ निरवयव ] पदार्थ किसी प्रकार भी उभय रूप नहीं हो सकता । इस कारण सांख्यविवेकी यह मानते हैं कि आत्मा तो केवल चिद्रूप ही है । जाड्यांशः प्रकृते रूपं विकारि त्रिगुणं च तत् । चितो भोगापवर्गार्थं प्रकृतिः सा प्रवर्तते ॥९९॥ [जाड्य का जो स्मरण उठे हुए पुरुषों को होता है उस स्मरण में] जो जाड्य भाग है वह तो प्रकृति का रूप है । वह विकारी है । वह सत्व रज तम इन त्रिगुणात्मक है । चेतन पुरुष को भोग और अपवर्ग दिलाने के लिये वह प्रकृति प्रवृत्त हुआ करती है ।
जाता है, विवेकी हो जाता है, तब यही उसे अपवर्ग अर्थात्
१५८ पञ्चदशी तक यह प्रकृति उसे भोग देती है जब यह पुरुष भोगों से उकता जाता है, विवेकी हो जाता है, तब यही उसे अपवर्ग अर्थात् मुक्ति दे देती है ] असङ्गायाश्चिते र्बन्धमोक्षौ भेदाग्रहान्मतौ । बन्धमुक्तिव्यवस्थार्थं पूर्वेषामिव चिद्भिदा ॥११०॥ यद्यपि चिति असंग ही है। परन्तु भेदाग्रह के कारण बंध भी जाती है और मुक्त भी हो जाती है। बन्ध और मुक्ति की व्यवस्था के लिये ये सांख्य भी पहलों [नैयायिकों, प्राभाकरों, भाट्टों] की तरह चेतनों का भेद मानते हैं। प्रश्न यह था कि चिति जब असंग है और प्रकृति तथा पुरुष अत्यन्त विविक्त है, फिर विचारी प्रकृति की प्रवृत्ति से असंग पुरुष को भोग और अपवर्ग कैसे होगये ? इसका उत्तर यह है कि—प्रकृति और पुरुष के भेद को ग्रहण न करने से भोग और अपवर्ग [बन्ध और मोक्ष] दोनों ही हो गये हैं। महतः परमव्यक्तमिति प्रकृति रुच्यते । श्रुतावसङ्गता तद्वदसङ्गो हीत्यतः स्फुटा ॥१११॥ महतः परमव्यक्तम् [ कठ० ३-११ ] इस श्रुति में प्रकृति के होने का वर्णन है। असङ्गो ह्ययं पुरुषः [ बृ० ४-३-१५ ] इस श्रुति में पुरुष की असंगता का प्रतिपादन किया गया है। चित्सन्निधौ प्रवृत्तायाः प्रकृतेर्हि नियामकम् । ईश्वरं ब्रुवते योगाः स जीवेभ्यः परः श्रुतः ॥१०२॥ [ जीव के विषय में ही नहीं ईश्वर विषय में भी वादियों के बड़े उलटे सीधे विचार हैं। उन्हीं को अब दिखाया जाता
चित्रदीपप्रकरणम् १५९
चित्रदीपप्रकरणम् १५९ है ] योग वाले कहते हैं कि-चेतन आत्माओं की सन्निधि में जो प्रकृति प्रवृत्त होती है उस प्रकृति को नियम में रखनेवाला 'ईश्वर' है । उसी को श्रुति में जीवों से 'पर' कहा गया है । प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेश इति हि श्रुतिः । आरण्यके संभ्रमेण ह्यन्तर्याम्युपपादितः ॥१०३॥ प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः [ श्वे० ६-१६ ] इस श्रुति में जीव से पर ईश्वर का प्रतिपादन किया गया है कि प्रधान तथा क्षेत्रज्ञों, [ जीवों ] का पालक, सत्त्वादि गुणों का ईश, किंवा नियामक है । बृहदारण्यक के अन्तर्यामि ब्राह्मण में तो बड़ी तत्परता से 'अन्तर्यामी' का उपपादन किया गया है । अत्रापि कलहायन्ते वादिनः स्वस्वयुक्तिभिः । वाक्यान्धपि यथाप्रज्ञं दाढर्यायोदाहरन्ति हि ॥१०४॥ इस ईश्वर विषय में भी वादी लोग अपनी अपनी युक्तियों से विवाद करते हैं और अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार अपने मत की दृढ़ता के लिये श्रुति वाक्यों का उद्धार भी करते हैं । क्लेशकर्मविपाकै स्तदाशयैरप्यसंयुतः । पुंविशेषो भवेदीशो जीववत् सोप्यसंगचित् ॥१०५॥ अविद्या आदि पाँच क्लेशों, चारों प्रकार के कर्मों, कर्म- विपाकों तथा इन सब के संस्कारों से अस्पृष्ट रहनेवाला, जो कोई पुरुषविशेष है, वही ईश्वर है । वह भी जीव के समान ही असङ्ग और चिद्रूप है । तथापि पुंविशेषत्वाद् घटतेऽस्य नियन्तृता । अव्यवस्थौ बन्धमोक्षा वापतेतामिहान्यथा ॥१०६॥ यद्यपि वह ईश्वर असङ्गचित् है तौ भी, पुरुषविशेष होने
१६० पञ्चदशी के कारण, यह नियामक हो सकता है। ईश्वर को यदि निया- मक न मानें तो बन्धामोक्ष की कोई व्यवस्था ही इस लोक में न रहेगी। [फिर इस व्यवस्था को कौन करेगा ?] भीषास्मादित्येवमादा वसङ्गस्य परात्मनः । श्रुतं तद्युक्तमप्यस्य क्लेशकर्माद्यसंगमात् ॥१०७॥ भीषास्माद्वातः पवते [ तै० २-८ ] इत्यादि श्रुतियों में इस असंग परमात्मा को नियन्ता बताया गया है। उसमें जीवों में पाये जाने वाले क्लेशादि के न होने से उसकी नियामकता युक्तिसंगत भी है। जीवानाम्प्यसङ्गत्वात् क्लेशादिर्न ह्यथापि च । विवेकाग्रहः क्लेशकर्मादि प्रागुदीरितम् ॥१०८॥ असङ्ग होने के कारण यद्यपि जीव भी क्लेशादि से रहित ही हैं परन्तु विवेकाग्रह [ प्रकृति और पुरुष के भेद को न समझने ] के कारण इन जीवों को क्लेशादि होते हैं, यह बात हम पहले कह चुके हैं। नित्यज्ञानप्रयत्नेच्छा गुणानीशस्य मन्वते । असङ्गस्य नियन्तृत्व मयुक्तमिति तार्किकाः ॥१०९॥ तार्किक लोग तो असंग आत्मा के नियामकपने को सहन ही नहीं करते इससे उन्होंने तो जीवों से विलक्षण रखने के लिये ईश्वर में नित्य ज्ञान, नित्य प्रयत्न तथा नित्य इच्छा को माना है। पुंविशेषत्वमप्यस्य गुणैरेव न चान्यथा । सत्यकामः सत्यसंकल्प इत्यादि श्रुतिर्जगौ ॥११०॥ [गुणों ही के कारण उसको पुरुष विशेष मान लिया है। जीवों के इच्छा आदि गुण अनित्य हैं। ईश्वर के इच्छा आदि
चित्रदीपप्रकरणम् १६१
चित्रदीपप्रकरणम् १६१ तीनों गुण नित्य हैं । ] इनके अतिरिक्त जीव और ईश्वर के विलक्षण होने का और कोई कारण नहीं है । इन गुणों की नित्यता के विषय में श्रुति ने स्वयं कहा है कि वह् सत्य काम है सत्य संकल्प है । नित्यज्ञानादिमत्त्वेऽस्य सृष्टिरैव सदा भवेत् । हिरण्यगर्भ ईशोऽतो लिङ्गदेहेन संयुतः ॥१११॥ ईश्वर को यदि नित्यज्ञानादिवाला मानें तो वह सदा सृष्टि ही बनाता रहे । इस कारण लिङ्गदेह से युक्त हिरण्यगर्भ को ही ईश्वर मानना चाहिये । [ समष्टि लिङ्ग शरीर के अभि- मानी परमात्मा को हिरण्यगर्भ कहते हैं । उसके लिंगदेह अर्थात् मन में जब इच्छा होगी तभी वह सृष्टि बनायेगा, यों सदा सृष्टि नहीं रहेगी । कभी कभी होगी । ] उद्गीथब्राह्मणे तस्य माहात्म्यमतिविस्तृतम् । लिङ्गसत्त्वेऽपि जीवत्वं नास्य कर्माद्यभावतः ॥११२॥ इस हिरण्यगर्भ की महत्ता उद्गीथ ब्राह्मण में विस्तारपूर्वक वर्णित है । लिङ्ग शरीर होने पर भी इसमें जीवभाव तो इस लिये नहीं आता कि इसके अविद्या, काम तथा कर्म नहीं होते हैं । स्थूलदेहं विना लिङ्गदेहो न क्वापि दृश्यते । वैराजो देह ईशोऽतः सर्वतो मस्तकादिमान् ॥११३॥ स्थूल देह के बिना तो केवल लिङ्गदेह कहीं भी दीखता नहीं है, इस कारण स्थूल शरीरों की समष्टि का अभिमानी जो 'विराट्' है वही ईश्वर है । सहस्रशीर्षेत्येवं च विश्वतश्चक्षुरित्यपि । श्रुतमित्याहुरनिशं विश्वरूपस्य चिन्तकाः ॥११४॥
सर्वतः पाणिपादत्वे कृम्यादेरपि चेशता ।
१६२ पञ्चदशी विराट् के उपासक अपने समर्थन में कहते हैं कि सहस्र शीर्षा पुरुषः [ श्वे० ३-४ ] तथा विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतस्पात् [ श्वे० ३-३ ] इत्यादि वाक्य अनेक बार श्रुतियों में आये हैं । इन वाक्यों से विराट् के ईश्वरभाव का समर्थन होता है । सर्वतः पाणिपादत्वे कृम्यादेरपि चेशता । ततश्चतुर्मुखो देव एवेशो नेतरः पुमान् ॥११५॥ उपर्युक्त श्रुति के अनुसार यदि उस ईश्वर को सब ओर हाथ पैर वाला मान लें तो ऐसी कीड़ियां भी हैं जिनके चारों ओर हाथ पैर होते हैं वे भी ईश्वर हो जांयगी । इस कारण चार मुख वाला देवता ही ईश्वर है दूसरा कोई नहीं । पुत्रार्थं तमुपासीना एवमाहुः, प्रजापतिः । प्रजा असृजतेत्यादिश्रुतिं चोदाहरन्त्यमी ॥११६॥ सन्तान के लिये उसके उपासक लोगों ने यह बात कही है । वे लोग अपनी पुष्टि में 'प्रजापतिः प्रजा असृजत' इत्यादि श्रुति का प्रमाण भी देते हैं । विष्णोर्नाभेः समुद्भूतो वेधाः कमलजस्ततः । विष्णुरेवेश इत्याहुर्लोके भागवता जनाः ॥११७॥ भागवतों का कहना है कि—कमलयोनि विधाता तो विष्णु की नाभि से उत्पन्न हुआ है । इस कारण 'विष्णु' ही ईश्वर है । शिवस्य पादावन्वेष्टुं शार्ङ्ग्यशक्तस्ततः शिवः । ईशो न विष्णु रित्याहुः शैवा आगममानिनः ॥११८॥ आगममानी शैव तो कहते हैं कि—शिव के पैरों को ढूँढते ढूँढते शार्ङ्गी अशक्त हो गया था । इस कारण विष्णु ईश्वर नहीं है किन्तु 'शिव' ही ईश्वर है ।
चित्रदीपप्रकरणम् १६३
चित्रदीपप्रकरणम् १६३ पुरत्रयं सादयितुं विघ्नेशं सोऽप्यपूजयत् । विनायकं प्राहुरीशं गाणपत्यमते रताः ॥११९॥ गणेश के उपासकों का तो कहना है कि—त्रिपुर को नष्ट करने के लिये शिव ने भी विघ्नेश की पूजा की थी। इस कारण वे 'विनायक' को ही ईश्वर मानते हैं। एवमन्ये स्वस्वपक्षाभिमानेनान्यथाऽन्यथा । मन्त्रार्थवादकल्पादीनाश्रित्य प्रतिपेदिरे ॥१२०॥ और भी भैरव आदि देवताओं के उपासकों ने अपने अपने पक्षों के अभिमान में आ आकर मन्त्रों, अर्थवादों, तथा कल्पों का [झूठ मूठ] सहारा लेकर, कुछ का कुछ वर्णन कर डाला है। अन्तर्यामिणमारभ्य स्थावरान्तेशवादिनः । सन्त्यश्वत्थार्कवंशादेः कुलदैवतदर्शनात् ॥१२१॥ अन्तर्यामी से लेकर स्थावर पर्यन्तों को ईश्वर माननेवाले लोग संसार में हैं। क्योंकि अश्वत्थ, अर्क, तथा वंशादि भी कुल के देवता पाये जाते हैं । तत्वनिश्चयकामेन न्यायागमविचारिणाम् । एकैव प्रतिपत्तिः स्यात् साप्यत्र स्फुटमुच्यते ॥१२२॥ तत्व का निश्चय करने की इच्छा को लेकर जो भी कोई पुरुष न्याय तथा आगमों का विचार करेंगे, उन सब की तो एक ही प्रतिपत्ति [ निश्चय ] होगी [ वे सब तो एक ही निश्चय पर पहुँचेंगे ] उसी निश्चय का वर्णन अब यहाँ स्पष्ट किया जाता है । मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । अस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥१२३ ॥
का उपादान कारण ] जान लेना चाहिये । माया रूपी उपाधि
१६४ पंचदशी सम्पूर्ण विचारकों का एकमात्र निश्चय श्रुति के शब्दों में इस प्रकार है कि—माया को ही प्रकृति [ अर्थात् इस जगत् का उपादान कारण ] जान लेना चाहिये । माया रूपी उपाधि वाले उस अन्तर्यामी को महेश्वर [ किंवा माया का अधिष्ठाता अथवा इस जगत् का निमित्त कारण ] मान लेना चाहिये । इस मायी महेश्वर के अंशरूप जीवों से यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो रहा है । इति श्रुत्यनुसारेण न्याय्यो निर्णय ईश्वरे । तथा सत्यविरोधः स्यात् स्थावरान्तेशवादिनाम् ॥१२४॥ इस श्रुति के अनुसार तो ईश्वर के विषय में ऊपर कहे हुए सभी निर्णय न्याय्य [ ठीक ] हो जाते हैं । ऐसी सूरत में जो लोग स्थावरों तक को ईश्वर मानते हैं उन का भी कोई विरोध नहीं रह जाता है । माया चेयं तमोरूपा तापनीये तदीरणात् । अनुभूतिं तत्र मानं प्रतिजज्ञे श्रुतिः स्वयम् ॥१२५॥ यह माया तमोरूपा है । तापनीय उपनिषत् में इसको तमोरूप बताया गया है । श्रुति ने माया को तमोरूप सिद्ध करने के लिये अनुभव को भी प्रमाण माना है । जडं मोहात्मकं तच्चेत्यनुभावयति श्रुतिः । आबालगोपं स्पष्टत्वादानन्त्यं तस्य साब्रवीत् ॥१२६॥ श्रुति ने उस अनुभव को यों दिखाया है कि वह [ माया ] जड है और मोहरूप है । इस जड और मोहरूप माया को बच्चे और ग्वाले तक सभी जानते हैं । इसी कारण श्रुति ने इस माया को अनन्त भी कहा है ।
चित्रदीपप्रकरणम् १६५
चित्रदीपप्रकरणम् १६५ अचिदात्मघटादीनां यत् स्वरूपं जडं हि तत् । यत्र कुण्ठीभवेद् बुद्धिः स मोह इति लौकिकाः ॥१२७॥ अचित्स्वरूप जो घटादि पदार्थ हैं, उन का जो स्वरूप है, वही 'जड' कहाता है । जहाँ जाकर बुद्धि कुण्ठित हो जाय । वह 'मोह' कहाता है, ऐसा लौकिक लोग कहते हैं । इत्थं लौकिकदृष्ट्यैतत् सर्वैरप्यनुभूयते । युक्तिदृष्ट्या त्वनिर्व्वाच्यं नासदासीदिति श्रुतेः ॥१२८॥ इस प्रकार लौकिक दृष्टि से तो उस माया को सभी जड और मोहरूप अनुभव करत हैं । परन्तु युक्ति की कसौटी पर तो वह अनिर्वाच्य ही सिद्ध होती है । [ युक्ति की दृष्टि में तो उसे सत् या असत् कुछ भी नहीं कह सकते ] । नासदासीत् [ ऋग्वेद ] इस श्रुति में भी उस माया को सदसदनिर्वचनीय ही कहा गया है । नासदासीद् विभातत्वान्नो सदासीच्च बाधनात् । विद्यादृष्ट्या श्रुतं तुच्छं तस्य नित्यनिवृत्तितः ॥१२९॥ [ ऊपर की श्रुति का अभिप्राय यह है ] विभात [ सब को ज्ञात ] होने से वह तत्व असत् नहीं था । नेह नानास्ति किं चन [ बृ० ४-४-१९ ] इस श्रुति में आत्मा से भिन्न सब तत्वों का बाध किया है, इस कारण वह तत्व सत् भी नहीं था । [ सत् और असत् उभय रूप होना तो किसी की समझ में आनेवाली बात ही नहीं है । यों वह माया नामक तत्व युक्ति की दृष्टि से अनिर्वचनीय पदार्थ है ] ज्ञानदृष्टि आ जाने पर तो उस माया की सदा के लिये निवृत्ति हो जाती है इसी कारण श्रुति में उस को तुच्छ कहा है । तुच्छमिदं रूपमस्य
१६६ पञ्चदशी तुच्छाऽनिर्वचनीया च वास्तवी चेत्यसौ त्रिधा । ज्ञेया माया त्रिभिर्बोधैः श्रौत-यौक्तिक-लौकिकैः॥१३०॥ श्रौत बोध को मानें तो वह माया 'तुच्छ' है। यौक्तिक बोध को मानें तो वह 'अनिर्वचनीय' समझ में आती है। लौकिक बोध पर विश्वास कर बैठें तो उसको 'वास्तविक' ही मानना पड़ता है। [श्रुति उसे तुच्छ कहती है, युक्ति उसे अनिर्वचनीय बताती है। लौकिक प्राणी उसे सच्चा मानते हैं।] अस्य सत्वमसत्वं च जगतो दर्शयत्यसौ । प्रसारणाच्च संकोचाद् यथा चित्रपटस्तथा ॥१३१॥ यह माया कभी तो इस जगत् को सत् दिखाती है और कभी इसको असत् बता देती है। मानों लपेटने और फैलाने से कोई चित्रपट कभी चित्रों को सत् और कभी उनको असत् दिखाता हो । अस्वतन्त्रा हि माया स्यादप्रतीतेर्विना चितिम् । स्वतन्त्रापि तथैव स्यादसङ्गस्यान्यथाकृतेः ॥१३२॥ चिति [अर्थात् अपने प्रकाशक चैतन्य] के बिना यह माया प्रतीत ही नहीं होती इस बात पर दृष्टि डालें तो कहना पड़ता है कि वह माया अस्वतन्त्र है—[स्वाधीन नहीं है] परन्तु जब यह देखते हैं कि उसने असङ्ग आत्मा को दूसरी तरह का [ससङ्ग] बना डाला है तब कहना पड़ जाता है कि वह तो स्वतन्त्र भी है। कूटस्थासङ्गमात्मानं जगत्त्वेन करोति सा । चिदाभासस्वरूपेण जीवेशावपि निर्ममे ॥१३३॥
चित्रदीपप्रकरणम् १६७
चित्रदीपप्रकरणम् १६७ उस माया ने, कूटस्थ असङ्ग आत्मा को बिगाड़ कर, उस का जगत् बना दिया है। उसी ने चिदाभास स्वरूप से जीव और ईश्वर का भी निर्माण किया है। [यही उस का अन्यथा- करण कहाता है।] कूटस्थ मनुपद्रुत्य करोति जगदादिकम्। दुर्घटैकविधायिन्यां मायायां का चमत्कृतिः ॥१३४॥ इस माया की होशियारी तो देखो कि—यह माया कूटस्थ में किसी प्रकार का उपद्रव भी नहीं करती है [उसको जैसे का तैसा भी रहने देती है] और उसी से जगदादि को भी बना डालती है। दुर्घट कामों को करने का वीड़ा उठाने वाली इस माया में यह कोई चमत्कार की बात नहीं है [कि कूटस्थता को भी बना रहने दे और उसको जगदादिस्वरूप भी कर डाले। ऐसा न करे तो उसे माया ही कौन कहे?] द्रवत्वमुदके वह्नावौष्ण्यं काठिन्यमश्मनि। मायाया दुर्घटत्वं च स्वतः सिद्ध्यति नान्यतः ॥१३५॥ पानी में द्रवत्व, वह्नि में उष्णता, पत्थर में कठोरता, और माया में दुर्घटपना स्वभाव से ही सिद्ध हो रहा है। [उसमें यह दुर्घटता कहीं अन्यत्र से नहीं आयी है।] न वेत्ति लोको यावत् तां साक्षात् तावच्चमत्कृतिम् । धत्ते मनसि, पश्चात्तु मायैषेत्युपशाम्यति ॥१३६॥ यह लोक जब तक उस माया का साक्षात्कार नहीं कर लेता, तभी तक मन में आश्चर्य किया करता है। साक्षात् कर लेने के पीछे तो 'यह माया है' ऐसा समझ कर शान्त हो जाता है।
१६८ पञ्चदशी प्रसरन्ति हि चोद्यानि जगद्वस्तुत्ववादिषु । न चोदनीयं मायायां तस्याश्चोद्यैकरूपतः ॥१३७॥ ये समस्त आक्षेप तो जगत् को सत्य मानने वाले नैयायिक आदियों पर ही हो सकते हैं । मायावाद में ये आक्षेप नहीं चलते । क्योंकि यह माया तो स्वयं ही आक्षेपस्वरूप है [ इस माया का तो दुर्घटपना ही रूप माना जाता है । यदि यह किसी तरह से घटमान हो जाय, यदि समझ में आजाय तो फिर यह माया ही क्या रही ? जो बात बुद्धि को समझ न पड़े, जिस में सब दोष आते हों वही माया है । ] चोद्येऽपि यदि चोद्यं स्याच्चोद्ये चोद्यते मया । परिहार्यं ततश्चोद्यं न पुनः प्रतिचोद्यताम् ॥१३८॥ आक्षेप योग्य बात पर भी [ जिसका कोई उत्तर कभी दिया ही नहीं जा सकता] यदि आक्षेप करते ही जाओगे तो फिर विवश हो कर तुम्हारे उन सिद्धान्तों पर आक्षेप करने लगूँगा [जिनका तुम पर कोई भी सन्तोषजनक उत्तर नहीं है, जिनको तुम अनादि आदि बताकर अपना पीछा छुड़ाया करते हो । फिर इसका परिणाम क्या होगा ] इस कारण किसी तरह इस चोद्य- माया का परिहार करना चाहिये । इस माया पर आक्षेप करते जाना ठीक नहीं है [भला जब तुम्हारे वस्त्र पर धब्बा पड़ गया हो तब क्या ? क्यों ? कैसे ? और कब ? करना भला या कि उसे छुड़ाने के उपाय सोचना भला ? ] जिस कमी को मैं स्वयं मान रहा हूँ, जो कमी मुझ माया- वादी का भूषण है, उसी पर अड़ कर बैठ जाने से मुझे तुम्हारे सिद्धान्त के मर्मस्थल दिखा कर अपना पीछा छुड़ाना पड़ेगा ।
इस कारण मैं तो यही कहता हूँ कि किसी तरह इस माया से अपना पिण्ड छुड़ा लो। इस पर बार बार आक्षेप करते जाना ठीक नहीं है। इसी झगड़े में फँसे रहकर आत्महित में प्रतिबन्ध डाल देना उचित नहीं है। विचार कर तो देख लो कि माया के द्वारा जगद्रचना के जिस प्रश्न पर तुम विचार कर रहे हो वह प्रश्न यदि यों बातचीत में ही हल हो जाय तो फिर सभी सहसा मुक्त हो जायँगे। अजी ! यह प्रश्न ही तो भोग और मोक्ष की मध्य सीमा है। जो इस प्रश्न का उत्तर निर्विकल्प समाधि से मांग लेते हैं वे मुक्त हो जाते हैं, जिन्हें इस का सदुत्तर नहीं मिल पाता वे यहीं भोगों में फँसे रह जाते हैं। फिर ऐसे असाधारण विषय को वाद विवाद से निर्णय कर लेने की दुराकांक्षा क्यों करते हो ? अरे भाई ! इस प्रश्न को समाधिभावना के द्वारा सुलझाने का प्रयत्न करो। ऐसा यत्न करो कि किसी तरह इस माया का परि- हार हो जाय। जैसे अपने जागे बिना अपना स्वप्न नहीं टूटता इसी प्रकार आत्मदर्शन हुए बिना केवल युक्तिवाद से इस महा- प्रश्न का सुलझना किंवा इस महास्वप्न का भंग हो जाना अत्यन्त असम्भव बात है।
विस्मयैकशरीराया मायायाश्चोद्यरूपतः। अन्वेष्यः परिहारोऽस्या बुद्धिमद्भिः प्रयत्नतः ॥१३९॥
देखो कि विस्मयरूपिणी यह माया आक्षेपरूप ही है। बुद्धिमानों को इस विषय में केवल यही करना चाहिये कि वे इस के परिहार का कोई उपाय सोच लें। बुद्धिमान् लोग यह मालूम कर लें कि किस रीति से इस माया का मोहक प्रभाव उनपर पड़ना बन्द हो जायगा ? प्याज़ ०१
१७० पञ्चदशी को छीलने से जैसे पत्ते ही पत्ते हाथ लगते हैं सार कुछ भी नहीं मिलता इसी प्रकार माया के स्वरूप का विचार करने से तो इसका कोई भी निर्णीत रूप हाथ नहीं आयेगा। मायात्वमेव निश्चेयमिति चेत्तर्हि निश्चिनु । लोकप्रसिद्धमायाया लक्षणं यत्तदीक्ष्यताम् ॥१४०॥ पूर्वपक्षी पूछता है कि—तो फिर क्या मैं इसे माया ही मान लूँ और परिहार का उपाय सोचना प्रारम्भ कर दूँ ? सिद्धा- न्ती कहता है कि हां, अवश्य ही इसको माया मान लो । देख लो कि लोकप्रसिद्ध माया के लक्षण इसमें भी पाये जाते हैं। इसी से कहते हैं कि इसको भी माया ही मान लो। न निरूपयितुं शक्या विस्पष्टं भासते च या । सा मायेतीन्द्रजालादौ लोकाः संप्रतिपेदिरे ॥१४१॥ जिसका निरूपण न हो सकता हो, फिर भी जो स्पष्ट ही भासती हो, वह 'माया' है, ऐसा इन्द्रजालादि में लोग माया को समझते हैं। स्पष्टं भाति जगच्चेद मशक्यं तन्निरूपणम् । मायामयं जगत् तस्मादीक्षस्वापक्षपाततः ॥१४२॥ यह जगत् भी स्पष्ट ही दीख रहा है । परन्तु इसका निरूपण कर सकना किसी के बूते की बात नहीं है। इस कारण कहते हैं कि पक्षपात को छोड़ कर इस जगत् को मायामय समझ लो । निरूपयितुमारब्धे निखिलैरपि पण्डितैः । अज्ञानं पुरतस्तेषां भाति कक्षासु कासुचित् ॥१४३॥ संसार के सम्पूर्ण पण्डित, जब इस जगत् का निरूपण करना
चित्रदीपप्रकरणम् १७१
चित्रदीपप्रकरणम् १७१ प्रारम्भ करते हैं तो कुछ कक्षा चलने पर, उनके सामने अज्ञान दीखने लगता है। [वाद कथा की दो तीन श्रेणी चल चुकने पर अन्त में उन्हें अज्ञान की शरण लेनी पड़ जाती है। उन्हें कहना पड़ जाता है 'यह तो हमें मालूम ही नहीं है कि ऐसा क्यों होता है' इत्यादि ।] देहेन्द्रियादयो भावा वीर्येणोत्पादिताः कथम् । कथं वा तत्र चैतन्य मित्यक्ते ते किमुत्तरम् ॥१४४॥ देखो इस संसार का निरूपण यों नहीं हो सकता—कि वीर्य [जैसी द्रव तथा एक वस्तु] से देह इन्द्रिय आदि नाना पदार्थ क्योंकर उत्पन्न हो जाते हैं ? तथा इन देह इन्द्रिय आदि में चेतनता क्योंकर आ जाती हैं ? इन प्रश्नों का तुम्हारे पास क्या समाधान है ? वीर्यस्यैष स्वभावश्चेत् कथं तद् विदितं त्वया । अन्वयव्यतिरेकौ यौ भग्नौ तौ वन्ध्यवीर्यतः ॥१४५॥ यदि वीर्य का यह सब स्वभाव ही मानो तो बताओ कि उसे तुमने कैसे पहचाना ? यदि कहो कि अन्वय व्यतिरेक से यह सब पहचानता हूँ तो तुम्हारे वे अन्वय व्यतिरेक तो बन्ध्यवीर्य से भग्न हो चुके हैं [ वन्ध्या स्त्री में जो वीर्य पड़ता है या जो वीर्य स्वयं ही वन्ध्य होता है, वह व्यर्थ हो जाता है । जहां जहां वीर्य हो वहां वहां देहादि हों ऐसा नहीं होता । ] न जानामि किमप्येतदित्यन्ते शरणं तव । अत एव महान्तोऽस्य प्रवदन्तीन्द्रजालताम् ॥१४६॥ यों बार बार पूछते जाने पर अन्त में तुम्हें यही कहना पड़
जायगा कि यह तो मुझे कुछ भी मालूम नहीं है। यही कारण है कि महापुरुष इसको [पहली बार ही] इन्द्रजाल कह देते हैं। एतस्मात् किमिवेन्द्रजालमपरं यद् गर्भवासस्थितं । रेतश्चेतति हस्तमस्तकपदप्रोग्भूतनानाङ्कुरम् । पर्यायेण शिशुत्व-यौवन-जरोवैपैरनेकैर्वृतं । पश्यत्यत्तिशृणोतिजिघ्रति तथा गच्छत्यथागच्छति।१४७ गर्भपात्र में पड़ा हुआ वीर्य, चेतन होजाता है। उसमें हाथ, मस्तक, पैर आदि नाना अङ्कुर फूट आते हैं। वह फिर क्रम से कभी बालपन, कभी यौवन, तथा कभी वार्धक्य नाम के अनेक वेषों को ओढ़ा करता है और देखता, खाता, सुनता, सूंघता, तथा आने जाने लगता है। बताओ तो इससे बड़ा इन्द्रजाल और क्या होगा ? देहवद् वटधानादौ सुविचार्य विलोक्यताम् । क्व धाना कुत्र वा वृक्षस्तस्मान्मायेति निश्चिनु ॥१४८॥ देह के समान ही बढ़ आदि वृक्षों के क्षुद्र बीजों पर भी भले प्रकार विचार कर देख लो कि—कहां तो वह विचारा क्षुद्र सा बीज और कहां वह विशाल वृक्ष ? यह सब देखकर निश्चय कर लो कि यह सब माया ही तो है। निरुक्तावभिमानं ये दधते तार्किकादयः । हर्षमिश्रादिभिस्ते तु खण्डनादौ सुशिक्षिताः ॥१४९॥ तुम्हें ही नहीं और भी जो बड़े बड़े तार्किक इस संसार की निरुक्ति का दम भरते हैं, खण्डन आदि ग्रन्थों में हर्षमिश्र आदि ने उनकी खूब खबर ली है [ उनके उस अभिमान को प्रबल युक्तियों से चूर्ण चूर्ण कर दिया है।]
अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्। अचिन्त्यरचनारूपं मनसापि जगत् खलु ॥१५०॥ जो भाव अचिन्त्य हैं, उन्हें तर्क की कसौटी पर कभी न कसना चाहिये। क्योंकि इस जगत् की रचना तो ऐसी हैं कि मन से भी उसका चिन्तन नहीं हो सकता। अचिन्त्यरचनाशक्तिर्बीजं मायेति निश्चिनु । मायाबीजं तदेकैकं सुषुप्तावनुभूयते ॥ १५१ ॥ जिस कारण में अचिन्त्य रचनाशक्ति भरी हुई है, जिस कारण की रचनाशक्ति का विचार भी नहीं कर सकते हैं, उसे ही 'माया' समझ लेना चाहिये। सुषुप्ति के समय उसी एक माया रूपी कारण का अनुभव प्रत्येक को हुआ करता है। जाग्रत्स्वप्नजगत् तत्र लीनं बीज इव द्रुमः । तस्मादशेषजगतो वासना स्तत्र संस्थिताः ॥१५२॥ छोटे से बीज में जैसे बड़े बड़े पेड़ छिपे रहते हैं, इसी प्रकार इस माया बीज में जाग्रत तथा स्वप्न नाम का जगत् छिपा रहता है। जगत् का कारण होने से इस सम्पूर्ण जगत् की वासनायें उसी माया में छिपी बैठी रहती हैं। या बुद्धिवासनास्तासु चैतन्यं प्रतिबिम्बति । मेघाकाशवदस्पष्टचिदाभासोऽनुमीयताम् ॥१५३॥ उस माया में जो बुद्धि की वासनायें छिपी पड़ी हैं, उनमें चैतन्य का प्रतिबिम्ब पड़ता रहता है। मेघाकाश के समान उन [ बुद्धियों ] में जो अस्पष्ट चिदाभास पड़ रहा है, उसका अनु- मान करलो [ क्योंकि वह किसी के अनुभव में नहीं आता है इस कारण अनुमान से ही उसे जानते हैं।]
१७४ पञ्चदशी साभासमेव तद् बीजं धीरूपेण प्ररोहति । अतो बुद्धौ चिदाभासो विस्पष्टं प्रतिभासते ॥१५४॥ चिदाभास से युक्त वह बीज [ अज्ञान ] ही बुद्धिरूप से परिणत हो जाता है इस कारण तब तो वह चिदाभास बुद्धि में स्पष्ट ही प्रतीत होने लगता है । [ तात्पर्य यह कि चिदाभासयुक्त वह अज्ञान, जब बुद्धिरूप को धारण कर लेता है तब तो उसमें स्पष्ट ही चिदाभास दीखने लगता है,परन्तु बुद्धि की वासनाओं में चिदाभास प्रतीत नहीं होता है । ] मायाभासेन जीवेशौ करोतीति श्रुतौ श्रुतम् । मेघाकाशजलाकाशाविव तौ सुव्यवस्थितौ ॥१५५॥ वह माया आभास के द्वारा जीव और ईश्वर को बना देती है यह श्रुति में कहा गया है । वे जीव और ईश्वर, मेघाकाश तथा जलाकाश के समान पृथक् पृथक् व्यवस्थित हो जाते हैं [ ऐसी अवस्था में यद्यपि जीव और ईश्वर दोनों मायिक हैं, परन्तु अस्पष्ट और स्पष्ट उपाधि वाला होने से, क्रम से मेघाकाश और जलाकाश के समान, इन दोनों का अवान्तर भेद सिद्ध हो जाता है । ] मेघवद् वर्तते माया मेघस्थिततुषारवत् । धीवासनाश्चिदाभासस्तुषारस्थखवत् स्थितः ॥१५६॥ माया तो मेघ के समान है । मेघ में जो तुषार होते हैं बुद्धि- वासनायें उनके समान होती हैं । उन तुषारों में जो आकाश होता है उसके समान वह चिदाभास है । मायाधीनश्चिदाभासः श्रुतो मायी महेश्वरः । अन्तर्यामी च सर्वज्ञो जगद्योनिः स एव हि ॥१५७॥
चिदाभास तो माया के अधीन होता है। महेश्वर को श्रुतियों में मायी अर्थात् माया का स्वामी कहा है। वह महेश्वर ही अन्त- र्यामी है, वही सर्वज्ञ है, तथा वही इस जगत् का मूल कारण भी है। सौषुप्तमानन्दमयं प्रक्रम्यैवं श्रुतिर्जगौ । एष सर्वेश्वर इति सोयं वेदोक्त ईश्वरः ॥१५८॥ सुषुप्ति के समय, अपने शुद्धरूप में प्रकट होनेवाले, आनन्द मय के विषय में सुषुप्तस्थाने एकीभूतः प्रज्ञानघनः मा. ५ इत्यादि श्रुति ने कहा है कि यही 'सर्वेश्वर' है। यों यह कहा जा सकता है कि बुद्धिवासनाओं में प्रतिबिम्ब रूप यह आनन्दमय ही वेदोक्त ईश्वर तत्व है। सर्वज्ञत्वादिके तस्य नैव विप्रतिपद्यताम् । श्रौतार्थस्यावितर्क्यत्वान्मायायां सर्वसंभवात् ॥१५९॥ इस आनन्दमय की सर्वज्ञता आदि [ यद्यपि अनुभव में आने वाली बात नहीं है, तो भी उस ] में शंका नहीं करनी चाहिये। क्योंकि श्रुति का बताया हुआ पदार्थ अवितर्क्य होता है। इसके अतिरिक्त माया में तो इतना सामर्थ्य है ही कि उसमें सब कुछ संभव हो जाता है। अयं यत् सृजते विश्वं तदन्यथयितुं पुमान् । न कोपि शक्तस्तेनायं 'सर्वेश्वर' इतीरितः ॥१६०॥ देखो यह 'आनन्दमय' जिस [ मानस सृष्टि किंवा जिस जाग्रदादि] जगत् को उत्पन्न कर लेता है, उसको कोई भी पुरुष अन्यथा नहीं कर सकता। यही कारण है कि उसको 'सर्वे- श्वर' कहा गया है। [उस आनन्दमय की सर्वेश्वरता का यही अभिप्राय समझना चाहिये।]
Here is the accurate transcription of the text in Devanagari with line markers:
१७६ पञ्चदशी अशेषप्राणिबुद्धीनां वासनास्तत्र संस्थिताः । ताभिः क्रोडीकृतं सर्वं तेन सर्वज्ञ ईरितः ॥१६१॥ सुषुप्ति काल के उस अज्ञान में [ जो कि सब का कारण है ] सम्पूर्ण प्राणियों की बुद्धियों की वासनायें निवास किये रहती हैं। उन सूक्ष्म वासनाओं ने इस सब जगत् को ही अपना विषय बना रक्खा है, इस कारण से उसको सर्वज्ञ कह दिया जाता है । [तात्पर्य यह है,कि सम्पूर्ण बुद्धियों की वासना वाला अज्ञान उस आनन्दमय की उपाधि है इसी से उसको सर्वज्ञ कहते हैं। ऐसा सर्वज्ञ यदि उसको समझें तो फिर उसकी सर्व- ज्ञता पर आक्षेप करने की कोई बात ही नहीं रह जाती । ] वासनानां परोक्षत्वात् सर्वज्ञत्वं न हीक्ष्यते । सर्वबुद्धिषु तद् दृष्ट्वा वासनास्वनुमीयताम् ॥१६२॥ उसकी उपाधि रूपी जो वासनायें हैं, वे तो सदा परोक्ष ही रहती हैं। इसी कारण उसकी सर्वज्ञता का अनुभव किसी को भी नहीं होता । परन्तु सम्पूर्ण बुद्धियों [ को मिला कर फिर उन] में सर्वज्ञता को देखकर, वासनाओं में भी सर्वज्ञता को अनु- मान से ही जान लेना चाहिये । विज्ञानमयमुख्येषु कोशेष्वन्यत्र चैव हि । अन्तस्तिष्ठन् यमयति तेनान्तर्यामितां व्रजेत् ॥१६३॥ विज्ञानमय आदि कोशों के तथा पृथिव्यादि भूतों के अन्दर बैठकर, इन सब को नियम में रखता रहता है, इसी से उसको 'अन्तर्यामी' [अन्दर रहकर नियमन करने वाला] कहा जाता है। यही अन्तर्यामी प्राणियों के पूर्व कर्मों के अनुसार चोर से,