पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें१६६ पञ्चदशी तुच्छाऽनिर्वचनीया च वास्तवी चेत्यसौ त्रिधा । ज्ञेया माया त्रिभिर्बोधैः श्रौत-यौक्तिक-लौकिकैः॥१३०॥ श्रौत बोध को मानें तो वह माया 'तुच्छ' है। यौक्तिक बोध को मानें तो वह 'अनिर्वचनीय' समझ में आती है। लौकिक बोध पर विश्वास कर बैठें तो उसको 'वास्तविक' ही मानना पड़ता है। [श्रुति उसे तुच्छ कहती है, युक्ति उसे अनिर्वचनीय बताती है। लौकिक प्राणी उसे सच्चा मानते हैं।] अस्य सत्वमसत्वं च जगतो दर्शयत्यसौ । प्रसारणाच्च संकोचाद् यथा चित्रपटस्तथा ॥१३१॥ यह माया कभी तो इस जगत् को सत् दिखाती है और कभी इसको असत् बता देती है। मानों लपेटने और फैलाने से कोई चित्रपट कभी चित्रों को सत् और कभी उनको असत् दिखाता हो । अस्वतन्त्रा हि माया स्यादप्रतीतेर्विना चितिम् । स्वतन्त्रापि तथैव स्यादसङ्गस्यान्यथाकृतेः ॥१३२॥ चिति [अर्थात् अपने प्रकाशक चैतन्य] के बिना यह माया प्रतीत ही नहीं होती इस बात पर दृष्टि डालें तो कहना पड़ता है कि वह माया अस्वतन्त्र है—[स्वाधीन नहीं है] परन्तु जब यह देखते हैं कि उसने असङ्ग आत्मा को दूसरी तरह का [ससङ्ग] बना डाला है तब कहना पड़ जाता है कि वह तो स्वतन्त्र भी है। कूटस्थासङ्गमात्मानं जगत्त्वेन करोति सा । चिदाभासस्वरूपेण जीवेशावपि निर्ममे ॥१३३॥