भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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चित्रदीपप्रकरणम् १६५ अचिदात्मघटादीनां यत् स्वरूपं जडं हि तत् । यत्र कुण्ठीभवेद् बुद्धिः स मोह इति लौकिकाः ॥१२७॥ अचित्स्वरूप जो घटादि पदार्थ हैं, उन का जो स्वरूप है, वही 'जड' कहाता है । जहाँ जाकर बुद्धि कुण्ठित हो जाय । वह 'मोह' कहाता है, ऐसा लौकिक लोग कहते हैं । इत्थं लौकिकदृष्ट्यैतत् सर्वैरप्यनुभूयते । युक्तिदृष्ट्या त्वनिर्व्वाच्यं नासदासीदिति श्रुतेः ॥१२८॥ इस प्रकार लौकिक दृष्टि से तो उस माया को सभी जड और मोहरूप अनुभव करत हैं । परन्तु युक्ति की कसौटी पर तो वह अनिर्वाच्य ही सिद्ध होती है । [ युक्ति की दृष्टि में तो उसे सत् या असत् कुछ भी नहीं कह सकते ] । नासदासीत् [ ऋग्वेद ] इस श्रुति में भी उस माया को सदसदनिर्वचनीय ही कहा गया है । नासदासीद् विभातत्वान्नो सदासीच्च बाधनात् । विद्यादृष्ट्या श्रुतं तुच्छं तस्य नित्यनिवृत्तितः ॥१२९॥ [ ऊपर की श्रुति का अभिप्राय यह है ] विभात [ सब को ज्ञात ] होने से वह तत्व असत् नहीं था । नेह नानास्ति किं चन [ बृ० ४-४-१९ ] इस श्रुति में आत्मा से भिन्न सब तत्वों का बाध किया है, इस कारण वह तत्व सत् भी नहीं था । [ सत् और असत् उभय रूप होना तो किसी की समझ में आनेवाली बात ही नहीं है । यों वह माया नामक तत्व युक्ति की दृष्टि से अनिर्वचनीय पदार्थ है ] ज्ञानदृष्टि आ जाने पर तो उस माया की सदा के लिये निवृत्ति हो जाती है इसी कारण श्रुति में उस को तुच्छ कहा है । तुच्छमिदं रूपमस्य