भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 726 में से

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१६२ पञ्चदशी विराट् के उपासक अपने समर्थन में कहते हैं कि सहस्र शीर्षा पुरुषः [ श्वे० ३-४ ] तथा विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतस्पात् [ श्वे० ३-३ ] इत्यादि वाक्य अनेक बार श्रुतियों में आये हैं । इन वाक्यों से विराट् के ईश्वरभाव का समर्थन होता है । सर्वतः पाणिपादत्वे कृम्यादेरपि चेशता । ततश्चतुर्मुखो देव एवेशो नेतरः पुमान् ॥११५॥ उपर्युक्त श्रुति के अनुसार यदि उस ईश्वर को सब ओर हाथ पैर वाला मान लें तो ऐसी कीड़ियां भी हैं जिनके चारों ओर हाथ पैर होते हैं वे भी ईश्वर हो जांयगी । इस कारण चार मुख वाला देवता ही ईश्वर है दूसरा कोई नहीं । पुत्रार्थं तमुपासीना एवमाहुः, प्रजापतिः । प्रजा असृजतेत्यादिश्रुतिं चोदाहरन्त्यमी ॥११६॥ सन्तान के लिये उसके उपासक लोगों ने यह बात कही है । वे लोग अपनी पुष्टि में 'प्रजापतिः प्रजा असृजत' इत्यादि श्रुति का प्रमाण भी देते हैं । विष्णोर्नाभेः समुद्भूतो वेधाः कमलजस्ततः । विष्णुरेवेश इत्याहुर्लोके भागवता जनाः ॥११७॥ भागवतों का कहना है कि—कमलयोनि विधाता तो विष्णु की नाभि से उत्पन्न हुआ है । इस कारण 'विष्णु' ही ईश्वर है । शिवस्य पादावन्वेष्टुं शार्ङ्ग्यशक्तस्ततः शिवः । ईशो न विष्णु रित्याहुः शैवा आगममानिनः ॥११८॥ आगममानी शैव तो कहते हैं कि—शिव के पैरों को ढूँढते ढूँढते शार्ङ्गी अशक्त हो गया था । इस कारण विष्णु ईश्वर नहीं है किन्तु 'शिव' ही ईश्वर है ।

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