भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 181

चित्रदीपप्रकरणम् १६३ पुरत्रयं सादयितुं विघ्नेशं सोऽप्यपूजयत् । विनायकं प्राहुरीशं गाणपत्यमते रताः ॥११९॥ गणेश के उपासकों का तो कहना है कि—त्रिपुर को नष्ट करने के लिये शिव ने भी विघ्नेश की पूजा की थी। इस कारण वे 'विनायक' को ही ईश्वर मानते हैं। एवमन्ये स्वस्वपक्षाभिमानेनान्यथाऽन्यथा । मन्त्रार्थवादकल्पादीनाश्रित्य प्रतिपेदिरे ॥१२०॥ और भी भैरव आदि देवताओं के उपासकों ने अपने अपने पक्षों के अभिमान में आ आकर मन्त्रों, अर्थवादों, तथा कल्पों का [झूठ मूठ] सहारा लेकर, कुछ का कुछ वर्णन कर डाला है। अन्तर्यामिणमारभ्य स्थावरान्तेशवादिनः । सन्त्यश्वत्थार्कवंशादेः कुलदैवतदर्शनात् ॥१२१॥ अन्तर्यामी से लेकर स्थावर पर्यन्तों को ईश्वर माननेवाले लोग संसार में हैं। क्योंकि अश्वत्थ, अर्क, तथा वंशादि भी कुल के देवता पाये जाते हैं । तत्वनिश्चयकामेन न्यायागमविचारिणाम् । एकैव प्रतिपत्तिः स्यात् साप्यत्र स्फुटमुच्यते ॥१२२॥ तत्व का निश्चय करने की इच्छा को लेकर जो भी कोई पुरुष न्याय तथा आगमों का विचार करेंगे, उन सब की तो एक ही प्रतिपत्ति [ निश्चय ] होगी [ वे सब तो एक ही निश्चय पर पहुँचेंगे ] उसी निश्चय का वर्णन अब यहाँ स्पष्ट किया जाता है । मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । अस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥१२३ ॥