पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
चित्रदीपप्रकरणम् १६३
चित्रदीपप्रकरणम् १६३ पुरत्रयं सादयितुं विघ्नेशं सोऽप्यपूजयत् । विनायकं प्राहुरीशं गाणपत्यमते रताः ॥११९॥ गणेश के उपासकों का तो कहना है कि—त्रिपुर को नष्ट करने के लिये शिव ने भी विघ्नेश की पूजा की थी। इस कारण वे 'विनायक' को ही ईश्वर मानते हैं। एवमन्ये स्वस्वपक्षाभिमानेनान्यथाऽन्यथा । मन्त्रार्थवादकल्पादीनाश्रित्य प्रतिपेदिरे ॥१२०॥ और भी भैरव आदि देवताओं के उपासकों ने अपने अपने पक्षों के अभिमान में आ आकर मन्त्रों, अर्थवादों, तथा कल्पों का [झूठ मूठ] सहारा लेकर, कुछ का कुछ वर्णन कर डाला है। अन्तर्यामिणमारभ्य स्थावरान्तेशवादिनः । सन्त्यश्वत्थार्कवंशादेः कुलदैवतदर्शनात् ॥१२१॥ अन्तर्यामी से लेकर स्थावर पर्यन्तों को ईश्वर माननेवाले लोग संसार में हैं। क्योंकि अश्वत्थ, अर्क, तथा वंशादि भी कुल के देवता पाये जाते हैं । तत्वनिश्चयकामेन न्यायागमविचारिणाम् । एकैव प्रतिपत्तिः स्यात् साप्यत्र स्फुटमुच्यते ॥१२२॥ तत्व का निश्चय करने की इच्छा को लेकर जो भी कोई पुरुष न्याय तथा आगमों का विचार करेंगे, उन सब की तो एक ही प्रतिपत्ति [ निश्चय ] होगी [ वे सब तो एक ही निश्चय पर पहुँचेंगे ] उसी निश्चय का वर्णन अब यहाँ स्पष्ट किया जाता है । मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । अस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥१२३ ॥
का उपादान कारण ] जान लेना चाहिये । माया रूपी उपाधि
१६४ पंचदशी सम्पूर्ण विचारकों का एकमात्र निश्चय श्रुति के शब्दों में इस प्रकार है कि—माया को ही प्रकृति [ अर्थात् इस जगत् का उपादान कारण ] जान लेना चाहिये । माया रूपी उपाधि वाले उस अन्तर्यामी को महेश्वर [ किंवा माया का अधिष्ठाता अथवा इस जगत् का निमित्त कारण ] मान लेना चाहिये । इस मायी महेश्वर के अंशरूप जीवों से यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो रहा है । इति श्रुत्यनुसारेण न्याय्यो निर्णय ईश्वरे । तथा सत्यविरोधः स्यात् स्थावरान्तेशवादिनाम् ॥१२४॥ इस श्रुति के अनुसार तो ईश्वर के विषय में ऊपर कहे हुए सभी निर्णय न्याय्य [ ठीक ] हो जाते हैं । ऐसी सूरत में जो लोग स्थावरों तक को ईश्वर मानते हैं उन का भी कोई विरोध नहीं रह जाता है । माया चेयं तमोरूपा तापनीये तदीरणात् । अनुभूतिं तत्र मानं प्रतिजज्ञे श्रुतिः स्वयम् ॥१२५॥ यह माया तमोरूपा है । तापनीय उपनिषत् में इसको तमोरूप बताया गया है । श्रुति ने माया को तमोरूप सिद्ध करने के लिये अनुभव को भी प्रमाण माना है । जडं मोहात्मकं तच्चेत्यनुभावयति श्रुतिः । आबालगोपं स्पष्टत्वादानन्त्यं तस्य साब्रवीत् ॥१२६॥ श्रुति ने उस अनुभव को यों दिखाया है कि वह [ माया ] जड है और मोहरूप है । इस जड और मोहरूप माया को बच्चे और ग्वाले तक सभी जानते हैं । इसी कारण श्रुति ने इस माया को अनन्त भी कहा है ।
चित्रदीपप्रकरणम् १६५
चित्रदीपप्रकरणम् १६५ अचिदात्मघटादीनां यत् स्वरूपं जडं हि तत् । यत्र कुण्ठीभवेद् बुद्धिः स मोह इति लौकिकाः ॥१२७॥ अचित्स्वरूप जो घटादि पदार्थ हैं, उन का जो स्वरूप है, वही 'जड' कहाता है । जहाँ जाकर बुद्धि कुण्ठित हो जाय । वह 'मोह' कहाता है, ऐसा लौकिक लोग कहते हैं । इत्थं लौकिकदृष्ट्यैतत् सर्वैरप्यनुभूयते । युक्तिदृष्ट्या त्वनिर्व्वाच्यं नासदासीदिति श्रुतेः ॥१२८॥ इस प्रकार लौकिक दृष्टि से तो उस माया को सभी जड और मोहरूप अनुभव करत हैं । परन्तु युक्ति की कसौटी पर तो वह अनिर्वाच्य ही सिद्ध होती है । [ युक्ति की दृष्टि में तो उसे सत् या असत् कुछ भी नहीं कह सकते ] । नासदासीत् [ ऋग्वेद ] इस श्रुति में भी उस माया को सदसदनिर्वचनीय ही कहा गया है । नासदासीद् विभातत्वान्नो सदासीच्च बाधनात् । विद्यादृष्ट्या श्रुतं तुच्छं तस्य नित्यनिवृत्तितः ॥१२९॥ [ ऊपर की श्रुति का अभिप्राय यह है ] विभात [ सब को ज्ञात ] होने से वह तत्व असत् नहीं था । नेह नानास्ति किं चन [ बृ० ४-४-१९ ] इस श्रुति में आत्मा से भिन्न सब तत्वों का बाध किया है, इस कारण वह तत्व सत् भी नहीं था । [ सत् और असत् उभय रूप होना तो किसी की समझ में आनेवाली बात ही नहीं है । यों वह माया नामक तत्व युक्ति की दृष्टि से अनिर्वचनीय पदार्थ है ] ज्ञानदृष्टि आ जाने पर तो उस माया की सदा के लिये निवृत्ति हो जाती है इसी कारण श्रुति में उस को तुच्छ कहा है । तुच्छमिदं रूपमस्य
१६६ पञ्चदशी तुच्छाऽनिर्वचनीया च वास्तवी चेत्यसौ त्रिधा । ज्ञेया माया त्रिभिर्बोधैः श्रौत-यौक्तिक-लौकिकैः॥१३०॥ श्रौत बोध को मानें तो वह माया 'तुच्छ' है। यौक्तिक बोध को मानें तो वह 'अनिर्वचनीय' समझ में आती है। लौकिक बोध पर विश्वास कर बैठें तो उसको 'वास्तविक' ही मानना पड़ता है। [श्रुति उसे तुच्छ कहती है, युक्ति उसे अनिर्वचनीय बताती है। लौकिक प्राणी उसे सच्चा मानते हैं।] अस्य सत्वमसत्वं च जगतो दर्शयत्यसौ । प्रसारणाच्च संकोचाद् यथा चित्रपटस्तथा ॥१३१॥ यह माया कभी तो इस जगत् को सत् दिखाती है और कभी इसको असत् बता देती है। मानों लपेटने और फैलाने से कोई चित्रपट कभी चित्रों को सत् और कभी उनको असत् दिखाता हो । अस्वतन्त्रा हि माया स्यादप्रतीतेर्विना चितिम् । स्वतन्त्रापि तथैव स्यादसङ्गस्यान्यथाकृतेः ॥१३२॥ चिति [अर्थात् अपने प्रकाशक चैतन्य] के बिना यह माया प्रतीत ही नहीं होती इस बात पर दृष्टि डालें तो कहना पड़ता है कि वह माया अस्वतन्त्र है—[स्वाधीन नहीं है] परन्तु जब यह देखते हैं कि उसने असङ्ग आत्मा को दूसरी तरह का [ससङ्ग] बना डाला है तब कहना पड़ जाता है कि वह तो स्वतन्त्र भी है। कूटस्थासङ्गमात्मानं जगत्त्वेन करोति सा । चिदाभासस्वरूपेण जीवेशावपि निर्ममे ॥१३३॥
चित्रदीपप्रकरणम् १६७
चित्रदीपप्रकरणम् १६७ उस माया ने, कूटस्थ असङ्ग आत्मा को बिगाड़ कर, उस का जगत् बना दिया है। उसी ने चिदाभास स्वरूप से जीव और ईश्वर का भी निर्माण किया है। [यही उस का अन्यथा- करण कहाता है।] कूटस्थ मनुपद्रुत्य करोति जगदादिकम्। दुर्घटैकविधायिन्यां मायायां का चमत्कृतिः ॥१३४॥ इस माया की होशियारी तो देखो कि—यह माया कूटस्थ में किसी प्रकार का उपद्रव भी नहीं करती है [उसको जैसे का तैसा भी रहने देती है] और उसी से जगदादि को भी बना डालती है। दुर्घट कामों को करने का वीड़ा उठाने वाली इस माया में यह कोई चमत्कार की बात नहीं है [कि कूटस्थता को भी बना रहने दे और उसको जगदादिस्वरूप भी कर डाले। ऐसा न करे तो उसे माया ही कौन कहे?] द्रवत्वमुदके वह्नावौष्ण्यं काठिन्यमश्मनि। मायाया दुर्घटत्वं च स्वतः सिद्ध्यति नान्यतः ॥१३५॥ पानी में द्रवत्व, वह्नि में उष्णता, पत्थर में कठोरता, और माया में दुर्घटपना स्वभाव से ही सिद्ध हो रहा है। [उसमें यह दुर्घटता कहीं अन्यत्र से नहीं आयी है।] न वेत्ति लोको यावत् तां साक्षात् तावच्चमत्कृतिम् । धत्ते मनसि, पश्चात्तु मायैषेत्युपशाम्यति ॥१३६॥ यह लोक जब तक उस माया का साक्षात्कार नहीं कर लेता, तभी तक मन में आश्चर्य किया करता है। साक्षात् कर लेने के पीछे तो 'यह माया है' ऐसा समझ कर शान्त हो जाता है।
१६८ पञ्चदशी प्रसरन्ति हि चोद्यानि जगद्वस्तुत्ववादिषु । न चोदनीयं मायायां तस्याश्चोद्यैकरूपतः ॥१३७॥ ये समस्त आक्षेप तो जगत् को सत्य मानने वाले नैयायिक आदियों पर ही हो सकते हैं । मायावाद में ये आक्षेप नहीं चलते । क्योंकि यह माया तो स्वयं ही आक्षेपस्वरूप है [ इस माया का तो दुर्घटपना ही रूप माना जाता है । यदि यह किसी तरह से घटमान हो जाय, यदि समझ में आजाय तो फिर यह माया ही क्या रही ? जो बात बुद्धि को समझ न पड़े, जिस में सब दोष आते हों वही माया है । ] चोद्येऽपि यदि चोद्यं स्याच्चोद्ये चोद्यते मया । परिहार्यं ततश्चोद्यं न पुनः प्रतिचोद्यताम् ॥१३८॥ आक्षेप योग्य बात पर भी [ जिसका कोई उत्तर कभी दिया ही नहीं जा सकता] यदि आक्षेप करते ही जाओगे तो फिर विवश हो कर तुम्हारे उन सिद्धान्तों पर आक्षेप करने लगूँगा [जिनका तुम पर कोई भी सन्तोषजनक उत्तर नहीं है, जिनको तुम अनादि आदि बताकर अपना पीछा छुड़ाया करते हो । फिर इसका परिणाम क्या होगा ] इस कारण किसी तरह इस चोद्य- माया का परिहार करना चाहिये । इस माया पर आक्षेप करते जाना ठीक नहीं है [भला जब तुम्हारे वस्त्र पर धब्बा पड़ गया हो तब क्या ? क्यों ? कैसे ? और कब ? करना भला या कि उसे छुड़ाने के उपाय सोचना भला ? ] जिस कमी को मैं स्वयं मान रहा हूँ, जो कमी मुझ माया- वादी का भूषण है, उसी पर अड़ कर बैठ जाने से मुझे तुम्हारे सिद्धान्त के मर्मस्थल दिखा कर अपना पीछा छुड़ाना पड़ेगा ।
इस कारण मैं तो यही कहता हूँ कि किसी तरह इस माया से अपना पिण्ड छुड़ा लो। इस पर बार बार आक्षेप करते जाना ठीक नहीं है। इसी झगड़े में फँसे रहकर आत्महित में प्रतिबन्ध डाल देना उचित नहीं है। विचार कर तो देख लो कि माया के द्वारा जगद्रचना के जिस प्रश्न पर तुम विचार कर रहे हो वह प्रश्न यदि यों बातचीत में ही हल हो जाय तो फिर सभी सहसा मुक्त हो जायँगे। अजी ! यह प्रश्न ही तो भोग और मोक्ष की मध्य सीमा है। जो इस प्रश्न का उत्तर निर्विकल्प समाधि से मांग लेते हैं वे मुक्त हो जाते हैं, जिन्हें इस का सदुत्तर नहीं मिल पाता वे यहीं भोगों में फँसे रह जाते हैं। फिर ऐसे असाधारण विषय को वाद विवाद से निर्णय कर लेने की दुराकांक्षा क्यों करते हो ? अरे भाई ! इस प्रश्न को समाधिभावना के द्वारा सुलझाने का प्रयत्न करो। ऐसा यत्न करो कि किसी तरह इस माया का परि- हार हो जाय। जैसे अपने जागे बिना अपना स्वप्न नहीं टूटता इसी प्रकार आत्मदर्शन हुए बिना केवल युक्तिवाद से इस महा- प्रश्न का सुलझना किंवा इस महास्वप्न का भंग हो जाना अत्यन्त असम्भव बात है।
विस्मयैकशरीराया मायायाश्चोद्यरूपतः। अन्वेष्यः परिहारोऽस्या बुद्धिमद्भिः प्रयत्नतः ॥१३९॥
देखो कि विस्मयरूपिणी यह माया आक्षेपरूप ही है। बुद्धिमानों को इस विषय में केवल यही करना चाहिये कि वे इस के परिहार का कोई उपाय सोच लें। बुद्धिमान् लोग यह मालूम कर लें कि किस रीति से इस माया का मोहक प्रभाव उनपर पड़ना बन्द हो जायगा ? प्याज़ ०१
१७० पञ्चदशी को छीलने से जैसे पत्ते ही पत्ते हाथ लगते हैं सार कुछ भी नहीं मिलता इसी प्रकार माया के स्वरूप का विचार करने से तो इसका कोई भी निर्णीत रूप हाथ नहीं आयेगा। मायात्वमेव निश्चेयमिति चेत्तर्हि निश्चिनु । लोकप्रसिद्धमायाया लक्षणं यत्तदीक्ष्यताम् ॥१४०॥ पूर्वपक्षी पूछता है कि—तो फिर क्या मैं इसे माया ही मान लूँ और परिहार का उपाय सोचना प्रारम्भ कर दूँ ? सिद्धा- न्ती कहता है कि हां, अवश्य ही इसको माया मान लो । देख लो कि लोकप्रसिद्ध माया के लक्षण इसमें भी पाये जाते हैं। इसी से कहते हैं कि इसको भी माया ही मान लो। न निरूपयितुं शक्या विस्पष्टं भासते च या । सा मायेतीन्द्रजालादौ लोकाः संप्रतिपेदिरे ॥१४१॥ जिसका निरूपण न हो सकता हो, फिर भी जो स्पष्ट ही भासती हो, वह 'माया' है, ऐसा इन्द्रजालादि में लोग माया को समझते हैं। स्पष्टं भाति जगच्चेद मशक्यं तन्निरूपणम् । मायामयं जगत् तस्मादीक्षस्वापक्षपाततः ॥१४२॥ यह जगत् भी स्पष्ट ही दीख रहा है । परन्तु इसका निरूपण कर सकना किसी के बूते की बात नहीं है। इस कारण कहते हैं कि पक्षपात को छोड़ कर इस जगत् को मायामय समझ लो । निरूपयितुमारब्धे निखिलैरपि पण्डितैः । अज्ञानं पुरतस्तेषां भाति कक्षासु कासुचित् ॥१४३॥ संसार के सम्पूर्ण पण्डित, जब इस जगत् का निरूपण करना
चित्रदीपप्रकरणम् १७१
चित्रदीपप्रकरणम् १७१ प्रारम्भ करते हैं तो कुछ कक्षा चलने पर, उनके सामने अज्ञान दीखने लगता है। [वाद कथा की दो तीन श्रेणी चल चुकने पर अन्त में उन्हें अज्ञान की शरण लेनी पड़ जाती है। उन्हें कहना पड़ जाता है 'यह तो हमें मालूम ही नहीं है कि ऐसा क्यों होता है' इत्यादि ।] देहेन्द्रियादयो भावा वीर्येणोत्पादिताः कथम् । कथं वा तत्र चैतन्य मित्यक्ते ते किमुत्तरम् ॥१४४॥ देखो इस संसार का निरूपण यों नहीं हो सकता—कि वीर्य [जैसी द्रव तथा एक वस्तु] से देह इन्द्रिय आदि नाना पदार्थ क्योंकर उत्पन्न हो जाते हैं ? तथा इन देह इन्द्रिय आदि में चेतनता क्योंकर आ जाती हैं ? इन प्रश्नों का तुम्हारे पास क्या समाधान है ? वीर्यस्यैष स्वभावश्चेत् कथं तद् विदितं त्वया । अन्वयव्यतिरेकौ यौ भग्नौ तौ वन्ध्यवीर्यतः ॥१४५॥ यदि वीर्य का यह सब स्वभाव ही मानो तो बताओ कि उसे तुमने कैसे पहचाना ? यदि कहो कि अन्वय व्यतिरेक से यह सब पहचानता हूँ तो तुम्हारे वे अन्वय व्यतिरेक तो बन्ध्यवीर्य से भग्न हो चुके हैं [ वन्ध्या स्त्री में जो वीर्य पड़ता है या जो वीर्य स्वयं ही वन्ध्य होता है, वह व्यर्थ हो जाता है । जहां जहां वीर्य हो वहां वहां देहादि हों ऐसा नहीं होता । ] न जानामि किमप्येतदित्यन्ते शरणं तव । अत एव महान्तोऽस्य प्रवदन्तीन्द्रजालताम् ॥१४६॥ यों बार बार पूछते जाने पर अन्त में तुम्हें यही कहना पड़
जायगा कि यह तो मुझे कुछ भी मालूम नहीं है। यही कारण है कि महापुरुष इसको [पहली बार ही] इन्द्रजाल कह देते हैं। एतस्मात् किमिवेन्द्रजालमपरं यद् गर्भवासस्थितं । रेतश्चेतति हस्तमस्तकपदप्रोग्भूतनानाङ्कुरम् । पर्यायेण शिशुत्व-यौवन-जरोवैपैरनेकैर्वृतं । पश्यत्यत्तिशृणोतिजिघ्रति तथा गच्छत्यथागच्छति।१४७ गर्भपात्र में पड़ा हुआ वीर्य, चेतन होजाता है। उसमें हाथ, मस्तक, पैर आदि नाना अङ्कुर फूट आते हैं। वह फिर क्रम से कभी बालपन, कभी यौवन, तथा कभी वार्धक्य नाम के अनेक वेषों को ओढ़ा करता है और देखता, खाता, सुनता, सूंघता, तथा आने जाने लगता है। बताओ तो इससे बड़ा इन्द्रजाल और क्या होगा ? देहवद् वटधानादौ सुविचार्य विलोक्यताम् । क्व धाना कुत्र वा वृक्षस्तस्मान्मायेति निश्चिनु ॥१४८॥ देह के समान ही बढ़ आदि वृक्षों के क्षुद्र बीजों पर भी भले प्रकार विचार कर देख लो कि—कहां तो वह विचारा क्षुद्र सा बीज और कहां वह विशाल वृक्ष ? यह सब देखकर निश्चय कर लो कि यह सब माया ही तो है। निरुक्तावभिमानं ये दधते तार्किकादयः । हर्षमिश्रादिभिस्ते तु खण्डनादौ सुशिक्षिताः ॥१४९॥ तुम्हें ही नहीं और भी जो बड़े बड़े तार्किक इस संसार की निरुक्ति का दम भरते हैं, खण्डन आदि ग्रन्थों में हर्षमिश्र आदि ने उनकी खूब खबर ली है [ उनके उस अभिमान को प्रबल युक्तियों से चूर्ण चूर्ण कर दिया है।]
अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्। अचिन्त्यरचनारूपं मनसापि जगत् खलु ॥१५०॥ जो भाव अचिन्त्य हैं, उन्हें तर्क की कसौटी पर कभी न कसना चाहिये। क्योंकि इस जगत् की रचना तो ऐसी हैं कि मन से भी उसका चिन्तन नहीं हो सकता। अचिन्त्यरचनाशक्तिर्बीजं मायेति निश्चिनु । मायाबीजं तदेकैकं सुषुप्तावनुभूयते ॥ १५१ ॥ जिस कारण में अचिन्त्य रचनाशक्ति भरी हुई है, जिस कारण की रचनाशक्ति का विचार भी नहीं कर सकते हैं, उसे ही 'माया' समझ लेना चाहिये। सुषुप्ति के समय उसी एक माया रूपी कारण का अनुभव प्रत्येक को हुआ करता है। जाग्रत्स्वप्नजगत् तत्र लीनं बीज इव द्रुमः । तस्मादशेषजगतो वासना स्तत्र संस्थिताः ॥१५२॥ छोटे से बीज में जैसे बड़े बड़े पेड़ छिपे रहते हैं, इसी प्रकार इस माया बीज में जाग्रत तथा स्वप्न नाम का जगत् छिपा रहता है। जगत् का कारण होने से इस सम्पूर्ण जगत् की वासनायें उसी माया में छिपी बैठी रहती हैं। या बुद्धिवासनास्तासु चैतन्यं प्रतिबिम्बति । मेघाकाशवदस्पष्टचिदाभासोऽनुमीयताम् ॥१५३॥ उस माया में जो बुद्धि की वासनायें छिपी पड़ी हैं, उनमें चैतन्य का प्रतिबिम्ब पड़ता रहता है। मेघाकाश के समान उन [ बुद्धियों ] में जो अस्पष्ट चिदाभास पड़ रहा है, उसका अनु- मान करलो [ क्योंकि वह किसी के अनुभव में नहीं आता है इस कारण अनुमान से ही उसे जानते हैं।]
१७४ पञ्चदशी साभासमेव तद् बीजं धीरूपेण प्ररोहति । अतो बुद्धौ चिदाभासो विस्पष्टं प्रतिभासते ॥१५४॥ चिदाभास से युक्त वह बीज [ अज्ञान ] ही बुद्धिरूप से परिणत हो जाता है इस कारण तब तो वह चिदाभास बुद्धि में स्पष्ट ही प्रतीत होने लगता है । [ तात्पर्य यह कि चिदाभासयुक्त वह अज्ञान, जब बुद्धिरूप को धारण कर लेता है तब तो उसमें स्पष्ट ही चिदाभास दीखने लगता है,परन्तु बुद्धि की वासनाओं में चिदाभास प्रतीत नहीं होता है । ] मायाभासेन जीवेशौ करोतीति श्रुतौ श्रुतम् । मेघाकाशजलाकाशाविव तौ सुव्यवस्थितौ ॥१५५॥ वह माया आभास के द्वारा जीव और ईश्वर को बना देती है यह श्रुति में कहा गया है । वे जीव और ईश्वर, मेघाकाश तथा जलाकाश के समान पृथक् पृथक् व्यवस्थित हो जाते हैं [ ऐसी अवस्था में यद्यपि जीव और ईश्वर दोनों मायिक हैं, परन्तु अस्पष्ट और स्पष्ट उपाधि वाला होने से, क्रम से मेघाकाश और जलाकाश के समान, इन दोनों का अवान्तर भेद सिद्ध हो जाता है । ] मेघवद् वर्तते माया मेघस्थिततुषारवत् । धीवासनाश्चिदाभासस्तुषारस्थखवत् स्थितः ॥१५६॥ माया तो मेघ के समान है । मेघ में जो तुषार होते हैं बुद्धि- वासनायें उनके समान होती हैं । उन तुषारों में जो आकाश होता है उसके समान वह चिदाभास है । मायाधीनश्चिदाभासः श्रुतो मायी महेश्वरः । अन्तर्यामी च सर्वज्ञो जगद्योनिः स एव हि ॥१५७॥
चिदाभास तो माया के अधीन होता है। महेश्वर को श्रुतियों में मायी अर्थात् माया का स्वामी कहा है। वह महेश्वर ही अन्त- र्यामी है, वही सर्वज्ञ है, तथा वही इस जगत् का मूल कारण भी है। सौषुप्तमानन्दमयं प्रक्रम्यैवं श्रुतिर्जगौ । एष सर्वेश्वर इति सोयं वेदोक्त ईश्वरः ॥१५८॥ सुषुप्ति के समय, अपने शुद्धरूप में प्रकट होनेवाले, आनन्द मय के विषय में सुषुप्तस्थाने एकीभूतः प्रज्ञानघनः मा. ५ इत्यादि श्रुति ने कहा है कि यही 'सर्वेश्वर' है। यों यह कहा जा सकता है कि बुद्धिवासनाओं में प्रतिबिम्ब रूप यह आनन्दमय ही वेदोक्त ईश्वर तत्व है। सर्वज्ञत्वादिके तस्य नैव विप्रतिपद्यताम् । श्रौतार्थस्यावितर्क्यत्वान्मायायां सर्वसंभवात् ॥१५९॥ इस आनन्दमय की सर्वज्ञता आदि [ यद्यपि अनुभव में आने वाली बात नहीं है, तो भी उस ] में शंका नहीं करनी चाहिये। क्योंकि श्रुति का बताया हुआ पदार्थ अवितर्क्य होता है। इसके अतिरिक्त माया में तो इतना सामर्थ्य है ही कि उसमें सब कुछ संभव हो जाता है। अयं यत् सृजते विश्वं तदन्यथयितुं पुमान् । न कोपि शक्तस्तेनायं 'सर्वेश्वर' इतीरितः ॥१६०॥ देखो यह 'आनन्दमय' जिस [ मानस सृष्टि किंवा जिस जाग्रदादि] जगत् को उत्पन्न कर लेता है, उसको कोई भी पुरुष अन्यथा नहीं कर सकता। यही कारण है कि उसको 'सर्वे- श्वर' कहा गया है। [उस आनन्दमय की सर्वेश्वरता का यही अभिप्राय समझना चाहिये।]
Here is the accurate transcription of the text in Devanagari with line markers:
१७६ पञ्चदशी अशेषप्राणिबुद्धीनां वासनास्तत्र संस्थिताः । ताभिः क्रोडीकृतं सर्वं तेन सर्वज्ञ ईरितः ॥१६१॥ सुषुप्ति काल के उस अज्ञान में [ जो कि सब का कारण है ] सम्पूर्ण प्राणियों की बुद्धियों की वासनायें निवास किये रहती हैं। उन सूक्ष्म वासनाओं ने इस सब जगत् को ही अपना विषय बना रक्खा है, इस कारण से उसको सर्वज्ञ कह दिया जाता है । [तात्पर्य यह है,कि सम्पूर्ण बुद्धियों की वासना वाला अज्ञान उस आनन्दमय की उपाधि है इसी से उसको सर्वज्ञ कहते हैं। ऐसा सर्वज्ञ यदि उसको समझें तो फिर उसकी सर्व- ज्ञता पर आक्षेप करने की कोई बात ही नहीं रह जाती । ] वासनानां परोक्षत्वात् सर्वज्ञत्वं न हीक्ष्यते । सर्वबुद्धिषु तद् दृष्ट्वा वासनास्वनुमीयताम् ॥१६२॥ उसकी उपाधि रूपी जो वासनायें हैं, वे तो सदा परोक्ष ही रहती हैं। इसी कारण उसकी सर्वज्ञता का अनुभव किसी को भी नहीं होता । परन्तु सम्पूर्ण बुद्धियों [ को मिला कर फिर उन] में सर्वज्ञता को देखकर, वासनाओं में भी सर्वज्ञता को अनु- मान से ही जान लेना चाहिये । विज्ञानमयमुख्येषु कोशेष्वन्यत्र चैव हि । अन्तस्तिष्ठन् यमयति तेनान्तर्यामितां व्रजेत् ॥१६३॥ विज्ञानमय आदि कोशों के तथा पृथिव्यादि भूतों के अन्दर बैठकर, इन सब को नियम में रखता रहता है, इसी से उसको 'अन्तर्यामी' [अन्दर रहकर नियमन करने वाला] कहा जाता है। यही अन्तर्यामी प्राणियों के पूर्व कर्मों के अनुसार चोर से,
चित्रदीपप्रकरणम् १७७
चित्रदीपप्रकरणम् १७७
चोरी करने को उकसाता है, मालिक को सावधान रहने की प्रेरणा किया करता है। बहादुर से तोप के मुँह में सिर दे देने को कहता है। भीरु को भाग जाने.की सम्मति देता है। यों सब जीवों की कर्म की डोर को अन्दर बैठा ही बैठा हिलाता रहता है। वहीं से सब पर शासन किया करता है। बुद्धौ तिष्ठन्नान्तरोऽस्या धियानीक्ष्यश्च धीवपुः । धियमन्तर्यमयतीत्येवं वेदेन घोषितम् ॥१६४॥ वह अन्तर्यामी बुद्धि के अन्दर रहता है। बुद्धि उसको देख नहीं सकती। बुद्धि ही उसका शरीर है। वह अन्दर रह कर इस बुद्धि को नियम में रख रहा है। अन्तर्यामी का ऐसा वर्णन यो विज्ञाने तिष्ठन् [ बृ० ३-७-२२ ] इत्यादि श्रुतियों ने स्वयमेव किया है। तन्तुः पटे स्थितो यद्वदुपादानतया तथा । सर्वोपादानरूपत्वात् सर्वत्रायमवस्थितः ॥१६५॥ जिस प्रकार तन्तु उपादानरूप से पट में स्थित रहता है, इसी प्रकार सब का उपादान होने से यह [ अन्तर्यामी ] सब जगह स्थित हो रहा है। यह बात यः सर्वेषु तिष्ठन् [ बृ० ३-७-१५ ] इत्यादि श्रुति में कही गयी है। पटादप्यान्तरस्तन्तु स्तन्तोरप्यंशुगन्तरः । आन्तरत्वस्य विश्रान्ति र्यत्रासावानुमीयताम् ॥१६६॥ उपादान रूप से यद्यपि वह सर्वत्र विराज रहा है, परन्तु उसका सर्वान्तर होना ही उसे उपलब्ध नहीं होने देता। यही बात इस श्लोक में कही गयी है—देखो, पट से अन्दर तन्तु होता है। तन्तु से भी आन्तर.अंशु होता है। इस आन्तरपने
१७८ पञ्चदशी
की जहां समाप्ति हो जाती है, वहीं जाकर इस [ अन्तर्यामी ] को अनुमान से ढूँढ लेना चाहिये । द्वित्रान्तरत्वकक्षाणां दर्शनेऽप्ययमान्तरः । न वीक्ष्यते, ततो युक्तिश्रुतिभ्यामेव निर्णयः ॥१६७॥ आन्तर भाव की दो तीन कक्षायें लौकिक [बाह्य] पटादि पदार्थों में दीख भी जायें, परन्तु यह अन्तर्यामी तो आन्तर [अन्दर का] होने से दीखता नहीं है । इस कारण युक्ति और श्रुति के सहारे से ही इसकी सत्ता का निर्णय करना पड़ता है । [ कोई भी अचेतन पदार्थ किसी चेतन अधिष्ठाता के बिना प्रवृत्त नहीं हुआ करता, यह युक्ति अन्तर्यामी को सिद्ध कर देती है । ] पटरूपेण संस्थानात् पट स्तन्तो र्वपुर्यथा । सर्वरूपेण संस्थानात् सर्वमस्य वपुस्तथा ॥१६८॥ पट रूप में आ जाने पर वह पट, उस तन्तु का शरीर माना जाता है । इसी प्रकार सर्व रूप से स्थित हो जाने के कारण, यह सब जगत्, उस अन्तर्यामी का देह माना गया है [ यही बात 'यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरम्' [बृ०३-७-१५] इस श्रुति में कही गयी है । ] तन्तोः संकोचविस्तारचलनादौ पटस्तथा । अवश्यमेव भवति, न स्वातन्त्र्यं पटे मनाक् ॥१६९॥ तथान्तर्याम्ययं यत्र यया वासनया यथा । विक्रियेत तथावश्यं भवत्येव न संशयः ॥१७०॥ तन्तु को जब सकोड़ा जाय, फैलाया जाय, या चलाया जाय, तो पट में भी अवश्य ही संकोच, विस्तार, या चलन
[चित्रदीपप्रकरणम् १७९]
[चित्रदीपप्रकरणम् १७९]
आ जाता है । पट में तो लेशमात्र भी स्वतन्त्रता नहीं है । ठीक इसी प्रकार उपादान रूप से पृथ्वी आदियों में रहनेवाला यह अन्तर्यामी, जिस जिस वासना से, जैसे जैसे घटादि रूप में विकृत हो जाता है, वह वह कार्य अवश्य ही बन जाते हैं। इसमें कुछ भी संशय नहीं है । [यही बात यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयति [ बृ० ३-७-१५ ] इत्यादि में कही गयी है । ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥१७१॥ [ गीता में भी अन्तर्यामी के विषय में यों कहा है] हे अर्जुन ! ईश्वरतत्व तो सब भूतों के हृदय धाम में घुसा बैठा है । वह वहाँ बैठा बैठा ही अपनी माया के प्रताप से सब यन्त्रारूढ भूतों को घुमाता रहता है । सर्वभूतानि विज्ञानमयास्ते हृदये स्थिताः । तदुपादानभूतेश स्तत्र विक्रियते खलु ॥१७२॥ गीता के इस श्लोक में जो 'सर्वभूतानि' शब्द है उसका अभिप्राय 'विज्ञानमय' से ही है। वे सब विज्ञानमय हृदय- कमल में ही रहते हैं । क्योंकि उनका उपादान कारण ईश्वर वहाँ हृदय में ही तो विकार को प्राप्त हुआ करता है [ वह अन्तर्यामी हृदय में ही विज्ञानमय का रूप धारण कर लेता है।] देहादि पञ्जरं यन्त्रं तदारोहोभिमानिता । विहितप्रतिषिद्धेषु प्रवृत्ति र्भ्रमणं भवेत् ॥१७३॥ [ गीता के 'यन्त्रारूढ' का अभिप्राय यह है कि] देहादि नाम का यह पींजरा ही 'यन्त्र' कहाता है । इस पींजरे में अभि- मान कर बैठना [इसी को 'मैं' मान लेना] ही इस पर 'आरो-
१८० पञ्चदशी हण' करना [चढ़ना] कहा जाता है। उसके पश्चात् विहित और प्रतिषिद्ध बातों में प्रवृत्त हो जाना ही 'भ्रमण' किंवा घूमना कहाता है। विज्ञानमयरूपेण तत्प्रवृत्तिस्वरूपतः । खशक्त्येशो विक्रियते मायया भ्रामणं हि तत् ॥१७४॥ अपनी ही शक्ति से प्रभावित होकर वह ईश्वरतत्व विज्ञान- मय रूप होकर तथा उसकी प्रवृत्ति रूप बनकर विकृत हुआ करता है। गीता के उपर्युक्त श्लोक में इसी को 'माया से जीवों का भ्रामण, अर्थात् घुमाना कहा जाता है। अन्तर्यमयतीत्युक्त्याऽयमेवार्थः श्रुतौ श्रुतः । पृथिव्यादिषु सर्वत्र न्यायोऽयं योज्यतां धिया ॥१७५॥ यही बात यः पृथिव्यां तिष्ठन् यः पृथिवीमन्तरो यमयति [बृ० ३-७-३] इस श्रुति में कही गयी है। अन्य सब पदार्थों में भी यही न्याय अपनी बुद्धि से लगा लेना चाहिये। जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति— जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः । केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि ॥१७६॥ मैं धर्म को खूब पहचानता हूँ, परन्तु धर्म म मेरी प्रवृत्ति ही नहीं होती। मैं अधर्म को भी भले प्रकार जानता हूँ, परन्तु मैं उससे बच भी नहीं रहा हूँ। असली बात तो यह है कि कोई देवता मेरे हृदय में मेरा हृदयेश्वर बना बैठा है। वह जैसे जैसे मुझे आज्ञा देता रहता है मैं वैसा वैसा करता रहता हूँ
चित्रदीपप्रकरणम् १८१
चित्रदीपप्रकरणम् १८१
यह सिद्ध होता है कि सम्पूर्ण प्रवृत्तियें उसी सर्वेश्वर के
अधीन हैं ।]
नार्थः पुरुषकारेणेत्येवं मा शंक्यतां यतः ।
ईशः पुरुषकारस्य रूपेणापि विवर्तते ॥१७७॥
'जब सभी प्रवृत्तियाँ ईश्वर के अधीन हैं तब फिर पुरुष के
प्रयत्न की आवश्यकता ही क्या रह जाती है' ऐसी शंका न
करनी चाहिये । क्योंकि वह ईश्वर ही तो पुरुषकार का रूप भी
धारण कर लेता है [पुरुष का प्रयत्न भी ईश्वर रूप ही है, यों
पुरुषार्थ करना भी सफल हो जाता है । ]
ईदृग्बोधेनेश्वरस्य प्रवृत्तिर्नैव वार्यताम् ।
तथापीशस्य बोधेन स्वात्मासङ्गत्वधीजनिः ॥१७८॥
जब किसी को ऐसा बोध हो जाय [कि ईश्वर ही पुरुष-
कारादि रूप में विवर्त हो जाता है] तब भी ईश्वर की अन्तर्यामी
रूप से प्रेरणा को वारण नहीं करना चाहिये [किंवा अन्तर्यामी
की प्रेरणा को व्यर्थ नहीं मान लेना चाहिये] क्योंकि उस रूप से
जब कोई ईश्वर तत्व को जान लेगा तब उसे अपने आत्मा की
असङ्गता का स्पष्ट ज्ञान उत्पन्न हो जायगा ।
तावता मुक्तिरित्याहुः श्रुतयः स्मृतयस्तथा ।
श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे इत्यपीश्वरभाषितम् ॥१७९॥
"आत्मा की असङ्गता का ज्ञान हो जाने से ही मुक्ति हो
जाती है" यह बात श्रुतियों और स्मृतियों ने कही है । ईश्वर
ने यह भी कहा है कि ये श्रुतियां और स्मृतियां मेरी ही
आज्ञायें हैं। ऐसी अवस्था में इन के कहने को टालना नहीं चाहिये ।
श्रुतिं स्मृतीममैवाज्ञे यस्ते उल्लंघ्य वर्तते । आज्ञोच्छेदी ममद्वेषी न मद्भक्तो
१८२ पञ्चदशी न मप्रियः। अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम् हमारा हाकिम हमारे अन्दर बैठा हुवा है। जब हम कोई बुरा काम करने लगते हैं तब अन्दर से घृणा भय और संकोच आदि की आवाज़ आती हैं। जब हम कोई शुभ कार्य करते हैं तब अन्दर से प्रेम निर्भयता और उत्साह आदि की स्फूर्ति होती है। ये ही सब ईश्वर की आज्ञायें हैं ! जो लोग मनुष्यसमाज में अधिक संस्कृत होते हैं उन्हें ये आज्ञायें बड़ी स्पष्ट सुनाई पड़ा करती हैं। जो निरन्तर पापाचारी होते हैं उन्हें ये आवाजें सुनाई पड़नी बन्द हो जाती हैं। जिन्हें ये आज्ञायें स्पष्ट सुनाई पड़ती हैं उन्होंने ही उन आवाज़ों को साधारण लोगों के उपकार के लिये, उनके अन्दर की मुर्दा आवाज़ को जगाने के लिए और उसके अनुकूल उनका आचरण कराने के लिये, पुस्तकों में लिख दिया है। ऐसे ये लेख ही 'श्रुति' और 'स्मृति' हैं। यों 'श्रुति' और 'स्मृति' ईश्वर की आज्ञायें हैं। वेदों के अपौरुषेय होने का कारण भी यही है कि ये आवाजें बनायी नहीं जाती किन्तु ऐसी की ऐसी ही साधक लोगों को—सत्यान्वेषी लोगों को सुनाई पड़ा करती हैं। सुनाई पड़ने के कारण ही उनको 'श्रुति' कहा है । आज्ञाया भीतिहेतुत्वं भीषास्मादिति हि श्रुतम् । सर्वेश्वरत्वमेतत् स्यादन्तर्यामित्वतः पृथक् ॥१८०॥ भीषास्माद्वातः पवते तै० २-८ इत्यादि श्रुतियों में आज्ञा के द्वारा ईश्वर को भय का कारण बताया गया है। [आज्ञा के कारण] उस ईश्वर में जो 'सर्वेश्वरता' आती है वह 'अन्तर्यामि- पने' से पृथक् ही एक धर्म है। 'अन्तर्यामी' वह है जो हम सब को अन्दर से अपने बस