भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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इस कारण मैं तो यही कहता हूँ कि किसी तरह इस माया से अपना पिण्ड छुड़ा लो। इस पर बार बार आक्षेप करते जाना ठीक नहीं है। इसी झगड़े में फँसे रहकर आत्महित में प्रतिबन्ध डाल देना उचित नहीं है। विचार कर तो देख लो कि माया के द्वारा जगद्रचना के जिस प्रश्न पर तुम विचार कर रहे हो वह प्रश्न यदि यों बातचीत में ही हल हो जाय तो फिर सभी सहसा मुक्त हो जायँगे। अजी ! यह प्रश्न ही तो भोग और मोक्ष की मध्य सीमा है। जो इस प्रश्न का उत्तर निर्विकल्प समाधि से मांग लेते हैं वे मुक्त हो जाते हैं, जिन्हें इस का सदुत्तर नहीं मिल पाता वे यहीं भोगों में फँसे रह जाते हैं। फिर ऐसे असाधारण विषय को वाद विवाद से निर्णय कर लेने की दुराकांक्षा क्यों करते हो ? अरे भाई ! इस प्रश्न को समाधिभावना के द्वारा सुलझाने का प्रयत्न करो। ऐसा यत्न करो कि किसी तरह इस माया का परि- हार हो जाय। जैसे अपने जागे बिना अपना स्वप्न नहीं टूटता इसी प्रकार आत्मदर्शन हुए बिना केवल युक्तिवाद से इस महा- प्रश्न का सुलझना किंवा इस महास्वप्न का भंग हो जाना अत्यन्त असम्भव बात है।

विस्मयैकशरीराया मायायाश्चोद्यरूपतः। अन्वेष्यः परिहारोऽस्या बुद्धिमद्भिः प्रयत्नतः ॥१३९॥

देखो कि विस्मयरूपिणी यह माया आक्षेपरूप ही है। बुद्धिमानों को इस विषय में केवल यही करना चाहिये कि वे इस के परिहार का कोई उपाय सोच लें। बुद्धिमान् लोग यह मालूम कर लें कि किस रीति से इस माया का मोहक प्रभाव उनपर पड़ना बन्द हो जायगा ? प्याज़ ०१