भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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१७० पञ्चदशी को छीलने से जैसे पत्ते ही पत्ते हाथ लगते हैं सार कुछ भी नहीं मिलता इसी प्रकार माया के स्वरूप का विचार करने से तो इसका कोई भी निर्णीत रूप हाथ नहीं आयेगा। मायात्वमेव निश्चेयमिति चेत्तर्हि निश्चिनु । लोकप्रसिद्धमायाया लक्षणं यत्तदीक्ष्यताम् ॥१४०॥ पूर्वपक्षी पूछता है कि—तो फिर क्या मैं इसे माया ही मान लूँ और परिहार का उपाय सोचना प्रारम्भ कर दूँ ? सिद्धा- न्ती कहता है कि हां, अवश्य ही इसको माया मान लो । देख लो कि लोकप्रसिद्ध माया के लक्षण इसमें भी पाये जाते हैं। इसी से कहते हैं कि इसको भी माया ही मान लो। न निरूपयितुं शक्या विस्पष्टं भासते च या । सा मायेतीन्द्रजालादौ लोकाः संप्रतिपेदिरे ॥१४१॥ जिसका निरूपण न हो सकता हो, फिर भी जो स्पष्ट ही भासती हो, वह 'माया' है, ऐसा इन्द्रजालादि में लोग माया को समझते हैं। स्पष्टं भाति जगच्चेद मशक्यं तन्निरूपणम् । मायामयं जगत् तस्मादीक्षस्वापक्षपाततः ॥१४२॥ यह जगत् भी स्पष्ट ही दीख रहा है । परन्तु इसका निरूपण कर सकना किसी के बूते की बात नहीं है। इस कारण कहते हैं कि पक्षपात को छोड़ कर इस जगत् को मायामय समझ लो । निरूपयितुमारब्धे निखिलैरपि पण्डितैः । अज्ञानं पुरतस्तेषां भाति कक्षासु कासुचित् ॥१४३॥ संसार के सम्पूर्ण पण्डित, जब इस जगत् का निरूपण करना