भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 186

१६८ पञ्चदशी प्रसरन्ति हि चोद्यानि जगद्वस्तुत्ववादिषु । न चोदनीयं मायायां तस्याश्चोद्यैकरूपतः ॥१३७॥ ये समस्त आक्षेप तो जगत् को सत्य मानने वाले नैयायिक आदियों पर ही हो सकते हैं । मायावाद में ये आक्षेप नहीं चलते । क्योंकि यह माया तो स्वयं ही आक्षेपस्वरूप है [ इस माया का तो दुर्घटपना ही रूप माना जाता है । यदि यह किसी तरह से घटमान हो जाय, यदि समझ में आजाय तो फिर यह माया ही क्या रही ? जो बात बुद्धि को समझ न पड़े, जिस में सब दोष आते हों वही माया है । ] चोद्येऽपि यदि चोद्यं स्याच्चोद्ये चोद्यते मया । परिहार्यं ततश्चोद्यं न पुनः प्रतिचोद्यताम् ॥१३८॥ आक्षेप योग्य बात पर भी [ जिसका कोई उत्तर कभी दिया ही नहीं जा सकता] यदि आक्षेप करते ही जाओगे तो फिर विवश हो कर तुम्हारे उन सिद्धान्तों पर आक्षेप करने लगूँगा [जिनका तुम पर कोई भी सन्तोषजनक उत्तर नहीं है, जिनको तुम अनादि आदि बताकर अपना पीछा छुड़ाया करते हो । फिर इसका परिणाम क्या होगा ] इस कारण किसी तरह इस चोद्य- माया का परिहार करना चाहिये । इस माया पर आक्षेप करते जाना ठीक नहीं है [भला जब तुम्हारे वस्त्र पर धब्बा पड़ गया हो तब क्या ? क्यों ? कैसे ? और कब ? करना भला या कि उसे छुड़ाने के उपाय सोचना भला ? ] जिस कमी को मैं स्वयं मान रहा हूँ, जो कमी मुझ माया- वादी का भूषण है, उसी पर अड़ कर बैठ जाने से मुझे तुम्हारे सिद्धान्त के मर्मस्थल दिखा कर अपना पीछा छुड़ाना पड़ेगा ।