पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
महावाक्यविवेक का संक्षेप ३५
महावाक्यविवेक का संक्षेप ३५
उसी गुप्त एकता का ग्रहण असि [ है ] यह पद करा रहा है। परन्तु कितना ही प्रयत्न करो इस लक्ष्यार्थ तक तो केवल अधिकारी लोगों की ही उदार दृष्टि पहुँचेगी । दूसरे अनधिकारी लोग तो इस महावार्ता को हँसी में ही टाल देंगे और परम पद के साथ खिल- वाड़ कर बैठेंगे । मुमुक्षु लोगों को चाहिये कि 'तत्' 'त्वं' पदों की जो एकता प्रमाणपुष्ट हो चुकी है, उसका दिव्यानुभव वे भी ले लें, और वैसा अनुभव करके अनादिकाल की इस वृथा खटपट को भूल जांय । वे अनुभव करें कि क्या हम अनादि काल से इसी भवजाल में उलझे रहने को यहां उतरे हैं ? क्या इस संसार की वेमतलब उखाड़ पछाड़ ही हमारे इस जीवन का चरमलक्ष्य है ? या हमारा अपना कोई स्थायी रूप भी है ? जिसके कि आधार से हमको शान्ति के सुखद दर्शन मिल सकते हैं। इसी गम्भीर प्रश्न का उत्तर तत्त्वमसि [ तुम तो वह हो, तुम्हें तो इस खटपट की कुछ भी आवश्यकता नहीं है ] यह महावाक्य दे रहा है । अयमात्मा ब्रह्म जो तत्व स्वयंप्रकाश होने के कारण ही यद्यपि सबको प्रत्यक्ष हो रहा है परन्तु हुआ करो, फिर भी मायामोहित प्राणी ने इस स्वयंप्रकाशतत्व की भी ऐसी उपेक्षा की है जैसी कदाचित् शत्रुओं की भी कोई न करता हो। कोटिजन्मों के पुण्यों के परिपाक से जब किसी साधक की सूक्ष्म दृष्टि उस तत्व तक जा पहुँचे तब सूक्ष्म दृष्टि से पकड़ लिये हुए उसी तत्व को हम अयम् [यह] कह रहे हैं-अर्थात् यह तत्व कभी किसी से छिपता नहीं है और यह कभी किसी का दृश्य नहीं होता है। अहंकार,प्राण,मन इन्द्रिय तथा देह का जो समूह है, उस सभी का अधिष्ठान, सभी क
३६ पंचदशी साक्षी, सभी से प्रत्यक्, सभी से आन्तर, जो कोई तत्व है उसी को हम 'आत्मा' कहते हैं। यह जो आकाशादि संसार हमें दीख रहा है यह सब क्षणभंगुर है। यह क्षणभंगुर संसार अपने स्वभाव के अनुसार जब शेष नहीं रह जायगा, तब जो तत्व शेष बचेगा उस तत्व को ही हम 'ब्रह्म' कहते हैं। वह ब्रह्मतत्व साधक की समझ में आया हुआ, यह ऊपर कहा हुआ,खयंप्रकाश आत्मा ही तो है। इस आत्मा से भिन्न कोई ब्रह्मनाम का पदार्थ होता होगा यह विचार प्रमाणानुमोदित नहीं है। इस आत्मा से भिन्न किसी को ब्रह्म समझना भारी से भारी भूल है।
6. Chitradipa
[६] चित्रदीप का संक्षेप तसवीर वाले कपड़े की जैसे चार अवस्थायें हैं—धुला हुआ, मांडी लगाया हुआ, चिह्न किया हुआ और रंगभरा हुआ, इसी प्रकार परमात्मा में भी चार अवस्थायें हैं ( १ ) चेतन ( २ ) अन्तयोमी ( ३ ) सूत्रात्मा ( ४ ) तथा विराट् । खयं तो वह चेतन है, माया का ध्यान करें तो वह 'अन्तर्यामी' है, सूक्ष्म सृष्टि को देखें तो वह 'सूत्रात्मा' कहाता है, स्थूल सृष्टि पर दृष्टि डालें तो उसे विराट् कहना होगा । जो देव मनुष्य पशु आदि के शरीर चैतन्य में अध्यस्त हैं, उनमें जीव नाम के जो चिदा- भास पड़े हैं ये ही तो संसार में भ्रमण कर रहे हैं । चेतनतत्व व्यापक है, पर है, अखण्ड है, वह तो संसार भ्रमण कर ही नहीं सकता । जीव के संसार को ही जो कि चेतन का संसार समझते हैं वे सब भूलते हैं । चिदाभास के विषय में ज्ञातव्य बात यह है कि—देहों में ही चिदाभास पड़ता है, मिट्टी पत्थर आदि में चिदा- भास नहीं पड़ता । जीवभाव अविद्या के कारण उत्पन्न होता है । दीखनेवाला संसार 'परमार्थ है, सब अपने आपे में लगे हैं, ऐसा सम- झना ही 'अविद्या' है—यही बेसमझी है। यह संसार जीव का है 'आत्मतत्व का संसार हो ही नहीं रहा, ऐसा ज्ञान 'विद्या' कहाती है। यह विद्या विचार करते रहने से हाथ आजाती है । उसको पाने के लिए जगत्, जीव और परात्मा का विचार सदा ही करना चाहिये । जीवभाव और जगत् भाव जब हट जायगा, तब आत्मा ही आत्मा
३८ पञ्चदशी
शेष रह जायगा—तब कैवल्य आ धमकेगा। आत्मतत्व केवल रूप में ज्योंही आ विराजेगा त्यों ही विचार स्वयं छूट जायगा। आत्मतत्व को केवल रूप में लाने के लिये विचार की सहायता की ज़रूरत पड़ती है, उसके लिये आत्मतत्व पर थोड़ा सा विचार करलें। 'कूटस्थ' और 'जीव' तथा 'ब्रह्म' और 'ईश्वर' यों चार तरह का चेतन,चेतनतत्व को समझने के लिये कल्पित कर लिया है। दोनों देहों के अन्दर जो चेतना रहती है, उसमें तो कभी भी कोई विकार नहीं आता। उतनी चेतना 'कूटस्थ' चेतना कहाती है। उस कूटस्थ चेतना में पहले बुद्धि की कल्पना हुई, फिर उसमें चेतना का प्रतिबिम्ब पड़ा; फिर उसमें प्राणशक्ति उत्पन्न हुई, बस यही जीव है। यही संसार में फंसने वाली चीज़ है। इसने अन्दर के कूटस्थ चेतन को पूरा पूरा ढक डाला है। अब तो यह इस तत्व को पृथक् रूप में कभी भी नहीं जानता। इसका यह न जानना, अनादि काल से है। यही 'मूलाज्ञान' कहाता है। यह अज्ञान दो रूप में काम करता है—एक तो यह स्वरूप को ढकता है, दूसरे यह स्वरूप को किसी विकृतरूप में (शरीर आदि के रूप में) दिखाता है। यही 'आवरण' और 'विक्षेप है'। आवरण से अपने रूप की प्रतीति रुक जाती है-- अपना आपा दूसरे पदार्थों में रिलमिल जाता है। ये दोनों ही बातें तत्वज्ञान होते ही नष्ट हो जाती हैं। परन्तु विक्षेप के नष्ट होने में, तत्वज्ञान के बाद भी कुछ समय लगता है। क्योंकि विक्षेप की उत्पत्ति कर्मों से और अज्ञान से, दो से मिल कर होती है। कर्मों का प्रभाव जितने दिनों तक रहना चाहिये, उतने दिन रहकर ही विक्षेप नष्ट होता है। यही कारण है कि ज्ञान हो जाने पर भी ज्ञानी का प्रारब्ध कर्म नष्ट नहीं होता। आत्मा के
चित्रदीप का संक्षेप ३९ विषय में लोगों को बहुत से भ्रम हैं कोई इसको कुछ मानता है और कोई कुछ। इसके परिमाण के और स्वरूप के विषय में भी बहुत से विवाद हैं। सारे विचारों में जो सार है वह तो यही है कि मायी महेश्वर है और माया उसका एक औज़ार है। उस माया का जो अधिपति है उसके [कल्पित] अवयवों ने इस सब जगत् को व्याप्त कर रक्खा है। उसकी इस माया पर यदि कुछ विचार न करें तो यह सच्ची मालूम होती है, विचार करें तो वह अनिर्व- चनीय सिद्ध होती है, श्रुति का कहना मानें तो यह तुच्छ है। यह माया शक्ति चेतन के बिना प्रतीत नहीं होती, इससे यह स्वतन्त्र नहीं है, तथा असंग को ससंग बना देने के कारण यह स्वतन्त्र भी है। जब तक माया को समझ लिया नहीं जाता, तब तक आश्चर्य मालूम होता है। जब यह समझ में आ जाती है तब माया समझ लेने से ही आश्चर्य नहीं रहता। निद्रानाम की जो जीव की माया है, उसमें जैसे कोई कानून लागू नहीं हो सकता—वह जैसी दीखे वैसी ही ठीक है। इसी प्रकार यह माया जैसी उल्टी-सीधी दीखे वैसी ही ठीक है। इसको तर्क की कसौटी पर कसने से इसके स्वरूप को समझने में चूक हो जायगी। श्रद्धा के मार्ग से चलते-चलते जो बात ज्ञान के यौवन में दीखने वाली थी उन्मार्ग में पड़ जाने से उससे वंचित रह जाना पड़ेगा। सम्पूर्ण आक्षेप जगत् को सत्य मानने वालों पर ही लागू हो सकते हैं। नींद की तरह माया पर कोई आक्षेप चल नहीं सकता। माया पर आक्षेप न करके उसको तो हटाने के उपाय सोचने में ही आत्मकल्याण है। जिसका निरूपण न हो और दीखे भी 'लौकिक माया' का यह लक्षण इस 'ऐश्वरी माया' में भी है। जिस कारण में अचिन्त्यरचना की शक्ति है, उस माया
४० पंचदशी नाम के बीज का अनुभव सुषुप्ति में सभी को होता है। बीज में पेड़ की तरह सारा जगत् उस सुषुप्ति में लीन रहता है। उस माया में सारे जगत् की वासनायें रहती हैं। उन वासनाओं में जो चैतन्य है वह स्पष्ट नहीं होता। इसी से अपनी वासनाओं का पता किसी को नहीं होता कि वे कैसी कैसी हैं। चेतन के आभास से युक्त वह माया ( अज्ञान ) जब बुद्धिरूप में प्रकट होती है तब उसमें का वह चिदाभास स्पष्ट मालूम होने लगता है। जब वासनाओं की बुद्धिवृत्तियें बन जाती हैं तब मालूम होता है कि ऐसी वासना भी इसमें थी। माया के अधीन जो चिदा- भास है वही तो वेदों का 'महेश्वर' है, वही 'अन्तर्यामी' है, वही 'सर्वज्ञ' है, वही 'जगत् का कारण' भी कहाता है। यह जिस मानस या बाह्य जगत् को बना लेता है, उसे बदल देने का सामर्थ्य किसी में नहीं है, यही तो इस की सर्वेश्वरता है। इसी कारण से जिस पर जो धुन सवार हो जाती है वह किसी के समझाने से हटती नहीं है। इस सुषुप्ति के अज्ञान में ही सम्पूर्ण प्राणियों की बुद्धियों की वे सब वासनायें रहती हैं जिन्होंने इस सब जगत् को घेर रक्खा है। सारा जगत् इन्हीं सूक्ष्म वासनाओं के अधीन होकर अपने अपने कार्यों में संलग्न हो रहा है। इसी से उसे 'सर्वज्ञ' कहा है। इसकी सर्वज्ञता का ज्ञान हमें क्यों नहीं होता, इसका कारण तो यह है कि वासनाओं का प्रत्यक्ष ज्ञान हमें किसी को भी नहीं होता है। जो जो विषय सामने आते जाते हैं उन-उन विषयों की वासनायें प्रकट होती जाती हैं। यों एक काल में न सही किन्तु कालान्तर में सर्वविषयानुभावी होने से उसकी सर्वज्ञता सिद्ध होती है। यों एक समय में उसकी सर्वज्ञता की प्रतीति न होने से उसके सर्वज्ञपन का प्रत्यक्ष नहीं होता। उसको
जैसे उपादान रूप से पट में रहता है, इसी तरह सब-का उपा-
चित्रदीप का संक्षेप ४१
तो अनुमान से जानना पड़ता है। विज्ञानमय आदि कोशों में तथा अन्यत्र भी अन्दर रहकर यह तत्व उन उन का नियमन करता रहता है इसी से उसे 'अन्तर्यामी' कहा जाता है। धागा जैसे उपादान रूप से पट में रहता है, इसी तरह सब-का उपा- दान होने से यह तत्व सर्वत्र ही रहता है। धागा जब हिले तब पट अवश्य हिलता है, इसी प्रकार यह अन्तर्यामी तत्व जिस पदार्थ की वासना से प्रभावित हो जाता है, वह वह कार्य अवश्य ही होकर रहता है। इस अन्तर्यामी में यदि घट की वासना जाग उठे तो घट अवश्य बनता है। इसी भाव से गीता में हृदय में बैठ कर सब यन्त्रारूढ भूतों को घुमाने की बात कही है। वही ईश्वर तत्व पुरुषार्थ का रूप धरकर भी आता है, इसका कारण पुरुषार्थ भी व्यर्थ नहीं होता है। अन्तर्यामी की यह प्रेरणा ध्यान में भले प्रकार आ जाय तो आत्मतत्व का असंगपना भी समझ में आ ही जायगा। इसकी असंगता के ज्ञान से मुक्ति के मिलने की बात जहां-तहां शास्त्रों में कही ही है। यही ईश्वर प्राणियों के कर्मों की अपेक्षा करके कभी तो जगत् को उत्पन्न कर देता है और कभी उसे अपने अन्दर छिपा लेता है। जगत् के पदार्थों के सृष्टि और प्रलय तो ठीक ऐसे हैं जैसे हमारे दिन रात, हमारे जागरण और स्वप्न या हमारे उन्मेष और निमेष या हमारे मौन और मनोराज्य हों। यह ईश्वर और वह ब्रह्मतत्व एक नहीं है। परन्तु सर्वसाधारण को इस भेद का पता नहीं है। वे इन दोनों को एक ही समझते हैं। शास्त्रों का तात्पर्य तो यही है कि ब्रह्मतत्व असंग है। जगत् का सर्जन करनेवाला महेश्वर तो मायावी है। अब दूसरा जो 'सूत्रात्मा' है उसके विषय में भी सुनिये—
जैसे अस्पष्ट दीखता है वैसा ही अस्पष्ट संसार इस 'सूत्रात्मा'
४२ पंचदशी
वह सब सूक्ष्म देहों में अहंभाव रखता है। 'इच्छा' 'ज्ञान' तथा 'क्रिया' नाम की शक्तियें इसमें रहती हैं। मन्द अंधेरे में जगत् जैसे अस्पष्ट दीखता है वैसा ही अस्पष्ट संसार इस 'सूत्रात्मा' में दीखता है। अंकुर फूटने वाले पौधे की जो अवस्था होती है वही अवस्था इस 'सूत्रात्मा' (हिरण्यगर्भ) की है। 'विराट्' नाम की जो तीसरी अवस्था है वह तो धूप में चमकते हुए संसार की-सी है। संसार के बड़े से बड़े और छोटे से छोटे जो भी जड या चेतन पदार्थ हैं वे सब के सब छोटे या बड़े ईश्वर तत्व ही तो हैं। जमी तो लोक में जब कोई किसी की विपत्ति को टाल देता है तब कहते हैं कि तुम तो मेरे ईश्वर होकर आये हो। अस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्। यह सारा संसार इन छोटे बड़े ईश्वरों की पूजा ही तो कर रहा है तथा इन ईश्वरों में जितनी शक्ति है, यह उनसे उतना ही छोटा या बड़ा फल भी पा रहा है। यह सब कुछ है परन्तु ईश्वरों की पूजा से मुक्ति नाम का महाफल तो कभी भी मिलने वाला नहीं 'है। मुक्ति तो ब्रह्मतत्व को जान लेने से ही मिलेगी। जैसे अपने जागे बिना अपना स्वप्न नहीं टूटता इसी प्रकार आत्मज्ञान के बिना यह भवबन्धन कटेगा नहीं। अद्वितीय ब्रह्मतत्व में यह सब जगत् एक महास्वप्न है। इस सुपने में कोई 'ईश्वर' है कोई 'जीव' है कोई 'चेतन' है और कोई 'जड' है। 'आनन्द ॰ मय' ईश्वर है तथा 'विज्ञानमय' जीव है। ईश्वरतत्व अस्पष्ट होता है जीवतत्व स्पष्ट होता है। ये दोनों ही माया के बनाये हुए हैं इनसे अगले संसार को इन दोनों ने ही बनाया है। माया के खिलौने जो 'जीव' और 'ईश्वर' हैं उनके विषय में तो विवाद बहुत होते रहते हैं, परन्तु असंग रहने वाला जो अद्वितीय ब्रह्म
चित्रदीप का संक्षेप ४३
तत्व है उसको लोग जानते ही नहीं हैं। इस अद्वितीय ब्रह्मतत्व को बिना जाने मुक्ति या लौकिक सुख कुछ भी पूरा पूरा प्राप्त नहीं हो सकता। इस लिये मुमुक्षु सदा ही ब्रह्मतत्व का विचार किया करें। यह ब्रह्मतत्व जैसा सृष्टि से पहले था, जैसा इस सृष्टि के नष्ट हो जाने पर रहेगा, वैसा ही अब भी है और मुक्ति में भी यह ऐसा ही रहेगा। यह जितना भी कुछ निरोध, उत्पत्ति, बद्धता साधकभाव आदि बखेड़ा हो रहा है यह सब इस ब्रह्म- समुद्र की केवल ऊपर की सतह पर ही हो रहा है। इसके एकान्त अन्तरतम तक इस किसी भी खटपट की कोई सूचना नहीं पहुँच पाती है। यह तत्व तो शिवलिंग की भाँति शान्त भाव से कभी भी न टूटने वाली मौनमुद्रा में बैठा हुआ है। परन्तु माया ने लोगों को वृथा ही भरमा रक्खा है। वे समझते हैं कि अद्वैत नाम की वस्तु न तो है ही और न वह प्रतीत ही होती है। ज्ञानी का निश्चय इसके विपरीत होता है। एक तो अपने निश्चय से बद्ध है दूसरा अपने ही निश्चय से मुक्त हो जाता है। बद्ध प्राणी रेशम के कीड़े की तरह अपने आपही बंधा पड़ा है। गधे और खच्चर वालों के पास जब उनको बांधने की बेड़ नहीं होती, तब वे उनके पैरों को बांध देने का नाटक करके उनके पैरों को चारों तरफ़ से स्पर्श कर देते हैं। हैं। गधे और खच्चर समझते हैं कि हम बांध दिये गये हैं। वे रात भर अपने उस संकल्प से बंधे खड़े रहते हैं। इसी तरह यह प्राणी अपने ही संकल्पों से अनादि काल से वृथा ही बंधा पड़ा है। जैसे लकड़ी में छेद कर देने वाले भौंरे से कमल का कोमल फूल तक नहीं कटता, इसी प्रकार प्राणी का यह अपने ही संकल्प का बन्धन बड़ा ही दुर्भेद्य हो गया है। यह अब
४४ पंचदशी
इससे टूटता नहीं है। इस संकल्प को धारण किये हुए इसे अनन्त सृष्टियाँ बीत चुकी हैं। इसकी बद्धपन की कल्पना दृढ- मूल हो गयी है। यह समझने लगा है कि मैं तो बद्धप्राणी हूँ। मुझे जन्म-मरण स्वभाव से मिलना ही है, कर्मों का फल मुझे भोगना ही है, मेरा गर्भवास टलना नहीं है, जन्ममरण के चक्र से मेरा छुटकारा कभी भी नहीं होना है, बस इसी तरह के विचार ही तो बन्धन कहाते हैं। बद्धता की प्रतीति के सिवाय और तो कुछ बन्धन है ही नहीं। रेशम का कीड़ा जैसे अपने आपको बांधकर मौत को नौता दे लेता है—अपने हाथ से अपनी क़बर तय्यार कर लेता है, इसी प्रकार अपने को बद्ध मानकर—स्वयं स्वीकृतअपराधी (इक़रारी मुजरिम) होकर अपने आप अपनी मरज़ी से बद्ध हुआ फिरता है और जन्म-जरा-मरण आदि की चौपाल बन रहा है। अद्वैत तत्व का प्रत्यक्ष जब तक नहीं होता, तब तक बद्धपन नष्ट नहीं होता। अद्वैत के प्रत्यक्षपन की बात समझ न पड़ती हो तो यों समझो कि ज्ञानरूप से वह अद्वैत तत्व सभी को प्रत्यक्ष है। द्युलोक, पृथ्वीलोक तथा पाताल लोक सभी को इस ज्ञान ने अपने पेट में रख छोड़ा है। कोई भी देश और काल ऐसा नहीं है जो ज्ञानसमुद्र में डूबा न पड़ा हो। यों स्थालीपुलाक न्याय से थोड़े अद्वैत को समझ कर परिपूर्ण अद्वैत को समझ लेना चाहिये। कार्य और कारण के एक होने की युक्ति से तथा तंजलान् (उसी से उत्पन्न उसी में जीवन तथा उसी में प्रलय) इस न्याय से अद्वैत तत्व का विचार करते रहना चाहिए और मायामय द्वैत जब जब आये तब तब विचार से उसे हटाते रहना चाहिये। जैसे फल पक कर डण्ठल को छोड़ देता है इसी प्रकार साक्षात्कार में जब पूर्णता आती है तब यह विचार
चित्रदीप का संक्षेप ४५
स्वयमेव छूट जाता है । इस तत्व का ज्ञान होने पर भी यदि भूख प्यास से इस तत्व को चोट लगती हो, यह तत्व, भाग जाने को या ओझल हो जाने को तय्यार होता हो, तो भूख प्यास जिस अहंकार को लगी है उसी में रहने दो । दूसरे के धर्मों को अपने में मत लादो । ये भूख प्यास तादात्म्य कर लेने से ही आत्मा को लगती है। उस अध्यास को हटाकर विवेक की आवृत्तियें सदा करनी चाहिये । क्योंकि अध्यास रूपी शत्रु के हमलों को विवेक की ढाल से ही रोका जा सकता है । चिदात्मा को अलग रक्खा जाय और अहंकार को पृथक् जाना जाय तो अब आप आजाद होकर करोड़ों पदार्थों की इच्छा कीजिये, ग्रन्थि भेद हो चुकने से अब आपको बाधा नहीं होगी । ग्रन्थि भेद हो चुकने पर भी प्रारब्ध के दोष से इच्छायें हो ही सकती हैं । इच्छाओं से घबराने की ज़रूरत नहीं है । देह में व्याधि हों, वृक्ष आदि पैदा हो या सूखे, अहंकार में इच्छा हो तो इससे चेतन आत्मा का क्या बिगाड़ होता है ? आत्म तत्व का बिगाड़ वैसे तो ग्रन्थिभेद से पहले कुछ भी नहीं होता था यह बात अगर समझ में आती है तो इसी को 'ग्रन्थि-भेद' होना कहते हैं । परन्तु अज्ञानी पुरुष इस बात को समझते नहीं हैं, यही तो एक 'ग्रन्थि' है । अज्ञानी और ज्ञानी में इस 'ग्रन्थि' के होने और न होने का ही भेद है । वैसे देखने में-व्यवहार में-तो दोनों एक ही से होते हैं । ग्रन्थि के टूटने की पहचान गीता में यों कही है कि आये हुए दुःखों से द्वेष नहीं करता तथा जाने वाले सुखों से 'और ठहरो' नहीं कहता । किन्तु उदासीन की तरह से काम करता है । अर्थात् अंदर से त्याग और बाहर से संग रख कर काम में लगा रहता है। जो लोग काम करना छोड़ देने को ही
४६ पंचदशी
ज्ञान का फल मानते हैं वे चूक करते हैं। उनकी समझ में आया हुआ ज्ञान तो शरीर आदि को निकम्मा कर देने वाला एक प्रकार का रोग ही है। छोड़ने की चीज़ तो संग है। व्यवहार छोड़ने की चीज़ ही नहीं है। जिसे सुख की इच्छा हो वह संग का परित्याग करे। व्यवहार से किसी का भी कुछ नहीं बिगड़ता। किन्तु संग से बिगाड़ होता है। लोक में भी किसी से मनुष्य- हत्या का व्यवहार हो जाय और उसमें उसकी सक्ति न हो तो वह उस पाप का अपराधी नहीं होता। व्यवहार के बन्द होने का कारण ज्ञान नहीं है। व्यवहार के चलने और बन्द होने की बात को समझने के लिये 'वैराग्य' 'ज्ञान' तथा 'उपरम' को भले प्रकार समझ लेना चाहिये। भोगों में दोषदर्शन से वैराग्य उत्पन्न होता है, भोगों को त्याग देने की इच्छा, वैराग्य का स्वरूप है, भोगों में दीनभाव न रहना वैराग्य का कार्य है। श्रवण, मनन और निदिध्यासन करने से तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है, सत्य और असत्य की पहचान हो जाना तत्वज्ञान का स्वरूप है, ग्रन्थि का फिर न लगना तत्वज्ञान का कार्य है। यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) नियम (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरभक्ति) आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि करते रहने से उपरम पैदा होता है, बुद्धि का रुक कर खड़ा हो जाना उपरम का स्वरूप है, व्यवहार का घट जाना या बन्द हो जाना यह उपरम का कार्य है, तत्वज्ञान होते ही जो लोग जल्दबाजी में आकर बाह्य व्यवहार को बन्द कर देने पर तुल जाते हैं, उनके मनो-व्यापार तो चलते ही हैं। यों ज़बर- दस्ती व्यवहार को त्यागनेवाले की अन्दर अन्दर अवनति होती ही जाती है। उसकी अतृप्त वासनायें कभी भी जाग कर उपद्रव
चित्रदीप का संक्षेप ४७
खड़ा कर देती हैं। होना यह चाहिये कि तत्वज्ञान होने पर जब हमारा मानस-संसार (या जीव का द्वैत) मर जाय या मार दिया जाय तब हम ईश्वर के संसार को (ईश्वर के द्वैत को) ध्यान में रखकर व्यवहार करने लगें। अर्थात् अब तक जो कर्म हमारे संसार में आसक्ति-पूर्वक हो रहे थे, वे अब ईश्वर के संसार में अनासक्तिपूर्वक होने लगें। यमादि का अभ्यास करने से हमारा मानस जगत् छिपने लगेगा तथा ईश्वर का संसार हमारी आंखों के सामने आ जायगा। यों दैवी सम्पत्ति का विकास होगा और वह भी धीरे-धीरे हमको पूर्ण-तत्व में जाकर जब छोड़ देगा, तब अपने आप स्वाभाविक रीति से व्यवहार क्षीण होगा। उपरति के अभ्यास से ही सच्चा व्यवहार क्षय होगा। यदि व्यवहार क्षय करने में आसक्ति होगी तो वह भी तो व्यवहार की तरह ही बन्धक होगी। व्यवहार का क्षय तो उपरम से होता है ज्ञान से व्यवहार का क्षय कदापि नहीं होता। वैराग्य और उपरम पूर्ण हों बोध रुका हो तो मोक्ष मिलने वाला नहीं है। बोध में पूर्णता हो फिर चाहे वैराग्य और उपरम पूर्ण न भी हो (अधूरे हों) तो भी मोक्ष अवश्य मिलेगा, परन्तु जीवन्मुक्ति का देवदुर्लभ आनन्द नसीव नहीं होगा। ब्रह्म-लोक तक को तृण-तुल्य समझना वैराग्य की अन्तिम सीमा है। देहात्मा की तरह पर तत्व को आत्मा समझ लिया जाय यह बोध की अन्तिम दशा है। सुप्ति की तरह संसार को जागरण में भी भूल जाना उपरम की सीमा है। हमारे आत्म-चैतन्य में जो यह जगत् रूपी चित्र माया ने बना दिया है ज्ञान की महिमा से इसकी ओर न देखकर जब हम अपने आत्म-चैतन्य को शेष रख लेंगे तब जगच्चित्र को देखकर भी मोह नहीं होगा।
7. Triptidipa
:[७] तृप्तिदीप का संक्षेप पुरुष यदि अपने आपे को पहचान जाय कि यह तत्व मैं हूँ ( मेरा स्वरूप यह है ) तो फिर न तो इच्छा करने की कोई वस्तु ही रह जाती है और न कोई इच्छा करने वाला तत्व ही शेष रहता है। यों आत्मज्ञानी को शरीर के सुखदुःखों के साथ साथ सुखी या दुःखी होना नहीं पड़ता। इसी बात का विस्तार पूर्वक वर्णन इस 'तृप्तिदीप' नामक प्रकरण में जीवन्मुक्त महाशयों में रहने वाली तृप्ति को बताने के लिये किया है। इसे समझने के लिये जीव को दो भागों पर विचार कीजिये— एक इसका भ्रम भाग है दूसरा इसका अधिष्ठान भाग है। जब भ्रम भाग की प्रधानता होती है और अधिष्ठान भाग दबा सा रहता है तब तो यह 'जीव' अपने को 'संसारी' माना करता है। जब तो भ्रम भाग को मिथ्या समझ कर उसका अनादर कर दिया जाता है—जब भ्रम को भुला दिया जाता है और अधिष्ठान भाग ही प्रधान बन जाता है तब यही जीव 'मैं तो चिदात्मा हूँ मैं तो असंग हूँ' ऐसा जानने लग पड़ता है। कल्पित सर्प का वहां से नष्ट हो जाना जैसे सत्य नहीं होता है,इसी प्रकार जीवों को होने वाला 'मैं असंग हूँ' इत्यादि ज्ञान भी सत्य तो नहीं होता है परन्तु जैसे कांटों से कांटों को निकाल देते हैं इसी प्रकार इन असत्य ज्ञानों से भी असत्य संसार का नाश तो हो ही जाता है।
तृप्तिदीप का संक्षेप ४९ जब हम किसी बड़े भारी जनसमुदाय में घुसते हैं तब अपने खो जाने के डर से अपने शरीर पर कोई भी चिह्न नहीं कर देते हैं। क्योंकि हमको इन शरीरों के आत्मा होने का सन्देह भी नहीं होता है, और हमें इस विषय में विपर्यय भी कुछ नहीं होता है। इतना ही पक्का ज्ञान जब किसी को आत्मतत्व के विषय में हो जाय—व्यापक जगदात्मा को ही जब कोई अपना आपा समझने लग पड़े, जब कोई देहात्मज्ञान की पूरी पूरी बाधा कर सके—तब ऐसे पुरुष की मुक्ति उसके न चाहने पर भी होती ही है। यों तो यह आत्मतत्व सब को सदा प्रत्यक्ष ही रहता है, परन्तु नित्य प्रत्यक्ष रहनेवाले भी इस आत्मतत्व में 'परोक्षता' और 'अपरोक्षता' तथा 'ज्ञान' और 'अज्ञान' दोनों ही बातें दसवें की तरह रहती हैं—कोई दस मनुष्य नदी को पार करके अपने को गिनने लगे। गिनने वाला अपने को छोड़कर शेष नौ को गिन लेता था, और रोता था कि हाय ! दसवां तो नदी में डूब गया। इस उदाहरण में दसवें को अपना 'ज्ञान' भी है और 'अज्ञान' भी है। दसवें का उसे 'प्रत्यक्ष' भी है और 'अप्रत्यक्ष' भी है। अब कोई भलामानस उन सब को गिनकर उसको ही दसवां बता देता है, तब उसे उसका पूर्ण प्रत्यक्ष हो जाता है। फिर दसवें का अप्रत्यक्ष या अज्ञान कभी नहीं होता। इसी प्रकार आत्मतत्त्व की बात भी है। यह आत्मतत्त्व संसार की सब वस्तुओं को तो जानता है, परन्तु संसार के पदार्थों में आसक्त होकर, संसार के सब पदार्थों को जाननेवाला जो उसका अपना आपा है, उसके विषय में उसे कुछ भी ज्ञात नहीं है। अनुभवी लोगों के मुख से जब यह मार्मिक आत्मकथा सुनता है और उसपर बार बार विचार करता है, तब उसे आत्मा का—सर्वव्यापक चेतना
५० पंचदशी
का—जो असली कूटस्थ रूप है, उसका प्रत्यक्ष होजाता है। अनु- भवी लोगों के समझाने से आत्मा के न होने के भ्रान्त विचार तो सदा के लिए नष्ट होजाते हैं, परन्तु आत्मा के प्रतीत न होने के जो भ्रान्त विचार हैं वे तो तब नष्ट होते हैं जब समाधिभावना ( तीव्र लगन ) से आत्मा का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। यह पिछली अवस्था जब आती है तब ही जीवभाव नष्ट होता है और सब शोक छिप जाते हैं। अपने नित्यमुक्तपने की नष्ट स्मृति दुबारा जाग उठती है। इसी अवस्था को ध्यान में रखकर कहा है कि “आत्मा को यदि जाना जाय कि यह तत्त्व मैं हूँ”। यों तो आत्मा स्वयंप्रकाश तत्व है ही, परन्तु इतने से साधक का कुछ भी उप- कार नहीं होता। जब साधक की बुद्धि आत्मा के इस स्वयंप्रकाशपने को अनुभव (महसूस) भी करले तब उस अवस्था की ओर को इस श्लोक में संकेत (इशारा) किया है कि 'यह मैं हूँ।' 'तू ही तो दसवाँ है' इस वाक्य पर जब विचार किया जाता है, तब खोया हुआ दसवां उसके सामने आ खड़ा होता है। इसी प्रकार 'आत्मा ब्रह्म है' इस वाक्य पर जब विचार किया जाता है तब आत्मा और ब्रह्म के एक होने की बात आंखों के सामने आखड़ी होती है। दसवां कौन सा है ? इस प्रश्न के उत्तर में जब दसवां तू ही है, यह कहा जाता है और जब शेष नौ के साथ मिलाकर अपने आपको गिना जाता है, तब अपने आपके दसवेंपन की स्मृति जाग उठती है। अब आप उसे हज़ार बार नदी में को निकाल लीजिये और गिनवाइये अब वह दसवें को कभी भी नहीं भूलेगा। क्योंकि उसे दसवें का अनुभवपूर्ण ज्ञान हो चुका है । इसी प्रकार विचार के द्वारा जब आत्मा के व्यापक होने का ज्ञान अनुभव का रूप धारण कर लेता है—या यों कहिये कि जब इस ज्ञान का
तृप्तिदीप का संक्षेप ५१
विज्ञान बनजाता है, तब शरीरों के किसी भी व्यवहार में लगे रहने पर भी अपनी व्यापकता भूल जाने वाली बात नहीं रहती । वह अवस्था अभ्यास से पकते-पकते जब पूर्ण यौवन पर आती है तब ब्रह्माभ्यासी पुरुष अपने को सर्वत्र परिपूर्ण ज्ञान और आनन्दरूप में पाकर स्वभावतृप्त रहने लग पड़ता है। हमारा जो जीव है वह क्योंकि अन्तःकरण से युक्त है इस कारण से हमें केवल उतने ही भाग के प्रत्यक्ष होने की बात तो समझ में आती है, परन्तु अन्तःकरण से रहित जो सर्वत्र व्यापक महा- चेतना है, उसका हमें कभी प्रत्यक्ष हो सकेगा, यह बात जिनकी समझ में न आती हो वे इस पर यों विचार करें-दो गुरु शिष्यों में से गुरु के कान में कुण्डल पहने हुए हों तथा शिष्य के कान में कुण्डल न हों। अब हमें उन दोनों का पृथक् पृथक् परिचय देने में एक का चिह्न तो कुण्डल का होना बताना पड़ेगा तथा दूसरे शिष्य का चिह्न कुण्डल न होना ही बताना पड़ेगा कि जिसके कान में कुण्डल नहीं है वही शिष्य है। यों जैसे किसी वस्तु का 'होना' लक्षण हो सकता है वैसे ही किसी वस्तु का 'न होना' भी लक्षण हो सकता है। इसी प्रकार 'अन्तःकरण का होना' जीव- भाव की पहचान है तथा 'अन्तःकरण का न होना' या न रहना ब्रह्मभाव की पहचान मानी जाती है। यही कारण है कि कभी तो वेदान्त सच्चिदानन्द आदि धर्मों से उसका प्रतिपादन करते हैं और कभी नेतिनेति की निषेध प्रक्रिया से उसका वर्णन करने लग पड़ते हैं। जब हम अपने चिदात्मा पर से अपने अन्तःकरण का बन्धन (किंवा पाबन्दी) उठा सकेंगे, तब यही हमारी अब की क्षुद्र चेतना, व्यापक चेतना के रूप में, किंवा ब्रह्म के रूप में, प्रकट होकर रहेगी। इस स्वयंप्रकाश चेतन के दर्शन के लिए, हमको केवल
५२ पंचदशी इतना ही करना पड़ेगा, कि हम अपनी बुद्धिवृत्ति को, उसके आकार का बना डालें। ऐसा करने पर व्यापक चेतन को आवृत कर रखने वाला अज्ञान, नष्ट हो जायगा और स्वयं प्रकाश तत्व अपने आप ही दीखने लग पड़ेगा। परन्तु अनादि काल से हमारे मन में बैठे हुए ये विचार ही कि "हम व्यापक कैसे हो सकते हैं ? हम तो कुछ करने और कुछ भोगने वाले तथा परिमित क्षेत्र में बद्ध रहने वाले प्राणी हैं" हमारे इस व्यापक रूप के दर्शन को दृढ नहीं होने देते हैं। हमें अपने इस व्यापक रूप में या तो संदेह बना रह जाता है या अपना यह व्यापक रूप भूल कर फिर फिर वही संकीर्णता की भावना जाग उठती है। परन्तु जब हम सर्वात्मना तत्पर होंगे, तब तो व्यापक रूप के दर्शन में सफल न होने का कोई कारण ही नहीं रह जायगा। इस प्रकार के आत्म- दर्शन में विघ्न डालने वाली असंभावना और विपरीत भावना को हटाने का एक मात्र यही उपाय है कि आत्मतत्व में बुद्धि की एकाग्रता के प्रयत्न को निरन्तर चालू रखा जाय। नहीं तो अनादि काल की वासनाएँ इस विचार रूपी नन्हें बालक को पनपने ही नहीं देंगी। एक बात विशेष ध्यान रखने की है कि इस तत्व को यदि हम कुछ काल के लिए भूल भी जायेंगे तो भी कोई अनर्थ नहीं हो जायगा। अनर्थ तो तब होता है जब हम इस तत्व को पहले की तरह फिर संकीर्ण समझने लग पड़ते हैं। तत्परता से जब कि यह तत्व बार बार स्मृति में लाया ही जा रहा है तब इस प्रकार की विपरीत वृत्ति के जाग उठने का कोई अवसर ही नहीं रह जाता है। जब आन्तरदर्शन पर विश्वास बढ़ता है और बाह्यदर्शन पर से विश्वास उठ चुकता है तब जितने दिनों तक के लिए यह शरीर रचा गया है, उतने दिनों तक बाह्य प्रवृत्ति
तृप्तिदीप का संक्षेप ५३
रहती तो है, परन्तु दृष्टिकोण बदल जाने से अब क्लेशरहित जीवन-
यात्रा होने लग पड़ती है। अब उसे शरीर के सुख दुःखों के
अनुसार सुखी दुःखी नहीं होना पड़ता है। जगत् की असारता
को समझ चुकने पर इच्छा करने वाले की और अभिलाषा करने
योग्य पदार्थ की विचारहीन भावना पर कुठाराघात हो जाता है।
फिर तो तैलरहित दीपक जैसे बुझ जाता है उसी तरह संसारताप
स्वयं शान्त हो जाता है। अब तो तमाशे में देखते हुए काल्प-
निक पदार्थों की तरह इस संसार के प्रिय से प्रिय समझे जाने
वाले पदार्थों को भी खुशी खुशी छोड़ा जा सकता है। इस प्रकार
का तत्त्व दर्शन हो चुकने पर भी जब तक इस शरीर के जीवन
का काल रहता है तब तक इच्छा अनिच्छा और परेच्छा प्रारब्धों
से प्रभावित होकर लौकिक भोगों में प्रवृत्त होते ही रहते हैं। इस
प्रकार की प्रारब्धप्रवृत्ति की रोक थाम करना अत्यन्त असंभव
है। युधिष्ठिर और राम जैसे तत्त्वदर्शी लोग भी इस प्रकार के व्यव-
हार को रोक नहीं सके हैं। आत्मदर्शी की तथा दूसरों की
इच्छाओं में यही भेद होता है कि आत्मदर्शी की इच्छा से आगे
को व्यसन की उत्पत्ति नहीं हो पाती। उसे भोगों का भोग तो प्राप्त
हो जाता है परन्तु वह भोगों का व्यसनी (दास) नहीं बन जाता।
जब कि हम संसारी लोग भोग भी भोगते हैं और आगे को उनके
दास भी बन जाते हैं। भोग देकर चरितार्थ हुआ प्रारब्ध कर्म
ज्ञानी और अज्ञानी दोनों का ही मर जाता है परन्तु अज्ञानी लोगों
की इस भ्रान्त धारणा से कि ये भोग तो सच्चे हैं आगे को भी
भोगों का व्यसन लग जाता है। वह ज्ञानी को नहीं लगता। जब
कि यह सारा ही जगत् उसका आत्मा बन चुकता है तब व्यसन
से प्रभावित होने का कोई अवसर ही नहीं रह जाता। तत्त्वज्ञान
५४ पंचदशी
का जो प्रभाव है वह तो व्यवहार में ही देखा जा सकता है। व्यवहार रुक जाने पर तत्वज्ञान का प्रभाव देखने को मिल ही नहीं सकता। यही कारण है कि निर्विकल्प समाधि को तत्वज्ञान की अवस्था माना ही नहीं जाता। निर्विकल्प समाधि तो उपरति की ही एक अवस्था है। वह ज्ञान की कोई सी भी अवस्था नहीं है। हां, यह बात तो है कि जगत् की मायामयता का सम्पूर्ण दर्शन 'तभी हो सकता है जब कि चित्त का निरोध हो चुका हो। मनुष्य- जीवन की गम्भीर समस्याओं को समझने का अवसर चित्त के रुकने पर ही आता है। इस भाव को लेकर चित्त के रोकने का अभ्यास किया जा सकता है। परन्तु चित्तनिरोध ही हमारा एकमात्र लक्ष्य नहीं है। आत्मरूप का अनुभवयुक्त ज्ञान हो जाना ही राजयोग का मुख्य ध्येय है। आत्मा के स्वरूप का इस प्रकार का दर्शन मिल जाने पर ही शरीरों के साथ सुखी दुखी न हो सकने की शान्तिवर्धक अवस्था आती है। हमारे ये तीनों शरीर स्वभाव से ही दुःखों के निवासभवन हैं। शरीर में वात,पित्त, कफ की न्यूनाधिकता से करोड़ों बीमारी खड़ी होती रहती हैं। मन में काम क्रोध आदि की अशान्तिकारक भावनाएँ आती ही रहती हैं। यों इन शरीरों में स्वभाव से ही दोष भरे पड़े हैं। इन दोषों से इनका वियोग कर सकना ऐसा ही असंभव है जैसे घड़े को मिट्टी से अलग करना। परन्तु अविद्या से प्रभावित होकर जब इन दुःखपूर्ण शरीरों की और आत्मा की परस्पर एकता मान ली जाती है तब परस्पर में धर्मों का लेन देन हो जाता है। आत्मा की सत्यता इन शरीरों में मान कर इस सम्पूर्ण मिश्रण को अपना स्वरूप समझने की भूल की जाती है। शरीर दुःखी हो तो कुटुम्ब के किसी भी व्यक्ति के दुःखी होने से अपने को ही दुःखी