पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४ पंचदशी
का जो प्रभाव है वह तो व्यवहार में ही देखा जा सकता है। व्यवहार रुक जाने पर तत्वज्ञान का प्रभाव देखने को मिल ही नहीं सकता। यही कारण है कि निर्विकल्प समाधि को तत्वज्ञान की अवस्था माना ही नहीं जाता। निर्विकल्प समाधि तो उपरति की ही एक अवस्था है। वह ज्ञान की कोई सी भी अवस्था नहीं है। हां, यह बात तो है कि जगत् की मायामयता का सम्पूर्ण दर्शन 'तभी हो सकता है जब कि चित्त का निरोध हो चुका हो। मनुष्य- जीवन की गम्भीर समस्याओं को समझने का अवसर चित्त के रुकने पर ही आता है। इस भाव को लेकर चित्त के रोकने का अभ्यास किया जा सकता है। परन्तु चित्तनिरोध ही हमारा एकमात्र लक्ष्य नहीं है। आत्मरूप का अनुभवयुक्त ज्ञान हो जाना ही राजयोग का मुख्य ध्येय है। आत्मा के स्वरूप का इस प्रकार का दर्शन मिल जाने पर ही शरीरों के साथ सुखी दुखी न हो सकने की शान्तिवर्धक अवस्था आती है। हमारे ये तीनों शरीर स्वभाव से ही दुःखों के निवासभवन हैं। शरीर में वात,पित्त, कफ की न्यूनाधिकता से करोड़ों बीमारी खड़ी होती रहती हैं। मन में काम क्रोध आदि की अशान्तिकारक भावनाएँ आती ही रहती हैं। यों इन शरीरों में स्वभाव से ही दोष भरे पड़े हैं। इन दोषों से इनका वियोग कर सकना ऐसा ही असंभव है जैसे घड़े को मिट्टी से अलग करना। परन्तु अविद्या से प्रभावित होकर जब इन दुःखपूर्ण शरीरों की और आत्मा की परस्पर एकता मान ली जाती है तब परस्पर में धर्मों का लेन देन हो जाता है। आत्मा की सत्यता इन शरीरों में मान कर इस सम्पूर्ण मिश्रण को अपना स्वरूप समझने की भूल की जाती है। शरीर दुःखी हो तो कुटुम्ब के किसी भी व्यक्ति के दुःखी होने से अपने को ही दुःखी