भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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[header] तृप्तिदीप का संक्षेप ५५ [/header]

मानते हुए कुटुम्बनेता की तरह अपने आपको ही दुःखी माना जाने लगता है । यह भूल साक्षित्व का ध्यान न आने तक ही चलती है । सर्पबुद्धि से भयभीत पुरुष पीछे से रज्जु रूप को पहचान कर जैसे अपनी पहली समझ पर हँसता है, उसी तरह ज्ञानी को भी अपनी पहली भ्रान्ति पर उपहासपूर्ण उपेक्षा का भाव आता है । जड और चेतन के मिश्रण रूपी इसी अपराध को क्षमा कराने के लिये ही मानो साधक, ज्ञान की अनन्त आवृत्तियाँ किया करता है और जब तक स्पष्ट रूप से व्यापक चेतन अलग और ये शरीर अलग दिखायी देने नहीं लगते, तब तक ज्ञान की आवृत्ति करता ही जाता है। इस अपने पूर्वापराध को क्षमा कराने की इसके सिवाय दूसरी कोई विधि ही नहीं है। जब तक यह प्रारब्ध देह है तब तक जीवभाव की गन्ध कभी कभी तो ज्ञानी के व्यवहार में आया ही करेगी। परन्तु इतनी सी घटना से तत्वज्ञान को विनष्ट हुआ नहीं समझा जायगा। क्योंकि जीवन्मुक्ति नाम का कोई व्रत नहीं है जो साधकों पर लागू कर दिया गया हो। यह तो जिस क्रम से चलता है—जैसे धीरे धीरे उन्नति करता है—इसे तो वैसा का वैसा ही चलने देना पड़ेगा। दसवें के हमारे उपर्युक्त दृष्टान्त में भी यही बात है कि दसवें की अप्राप्ति के लिये रोना तो उसका ज्ञान होते ही नष्ट हो जाता है। परन्तु दसवें के शोक में सिर पीटते पीटते जो घाव पड़ गया है, वह तो महीने दो महीने में जाकर अच्छा हो पाता है। हां, यह बात तो है कि दसवें के न मरने के महालाभ से उसे जो हर्ष होता है वह सिर के घाव की पीड़ा को उपेक्षित करा देता है। इसी प्रकार जड़ चेतन के ग्रन्थिमोक्ष से प्रारब्ध दुःख तो ढक ही जाते हैं—वे