पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
5. Mahavakya Viveka
महावाक्यविवेक का संक्षेप
'महाश्रोत्रिय' 'महाराजा' 'महायात्रा' 'महाप्रस्थान' 'महा- ज्ञानी' आदि जैसे शब्द हैं वैसा ही यह 'महावाक्य' भी है। इसका एक यह भी अर्थ हो सकता है कि—जिस से बड़ा, जिससे व्यापक अर्थ वाला कोई अन्य वाक्य न हो सकता हो। दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि—जिसके पश्चात् दूसरा वाक्य बोलना ही पड़ता हो। या यों कहो कि बोलने की आवश्यकता ही न रह जाती हो। जो प्राणी दिन रात बहिर्मुख बने रहते हैं, जो प्राणी आठों पहर इन्द्रियद्वारों पर ही डटे रहते हैं, उनमें से कोई जब किसी नाटक के नटों, या पालतू तोते मैनाओं के समान इन महावाक्यों को बोल उठे तो उसकी बात हम नहीं कहते हैं। हम तो केवल उन महामना मुनियों की ओर को संकेत करना चाहते हैं, जिनके हृदयधाम में धधकती हुई ज्ञानाग्नि की ज्वाला में सृष्टि के पदार्थों की स्वाधीन सत्ता सरकण्डे की रूई के समान भड़भड़ा कर भस्म हो चुकी हो। वे जब अपने एकान्त हृदय- मन्दिर के मौनप्रदेश में बैठकर इन वाक्यों को बोल बैठते हैं और जब उनके हृदय-प्रदेश में सदा के लिये सन्नाटा छा जाता है—जिसके बाद एक भी अन्यर्थ वाक्य ऐसा सुनाई नहीं पड़ा सकता जो उनके उस गंभीर सन्नाटे को कभी भी भंग कर सकता हो, तब इन वाक्यों को 'महावाक्य' कहना बड़े ही गौरव की बात प्रतीत होती है। यह प्रकरण आगमप्रधान है—इसमें कुतर्क और व्यर्थ विवाद को थोड़ा सा भी अवकाश नहीं है। इसमें
३० पंचदशी
जिन महावाक्यों का उल्लेख है वे सभी प्राणियों के अन्दर गुप्तभाव से रहनेवाले 'पूर्ण अहं' का वर्णन करनेवाले हैं। क्षुद्र अहं ने जीवात्माओं को संकुचित कर रखा है। विचार की आँच से जब क्षुद्र अहं जल जाता है तब वही पूर्ण अहं प्रत्यक्ष दर्शन दे देता है। आंख का पलक खुलते ही जैसे अनन्त आकाश आंखों के सामने आ खड़ा होता है इसी प्रकार क्षुद्र अहं को हटाते ही अनन्त आत्मतत्व साधक को दीखने लग पड़ता है। उसी पुण्य- कीर्ति अवस्था की ओर संकेत करनेवाले ये महावाक्य हैं। जितने भी वेदादि सच्छास्त्र हैं वे इसी पूर्ण अहं की आवाजें हैं। मनन में गहरे उतरे हुए लोगों को ही ऐसी ईश्वरीय आवाजें सुनाई पड़ा करती हैं। इसी कारण वेदों को 'अपौरुषेय' कहा जाता है। वेदों को कोई पुरुष बनाता नहीं किन्तु ये तो शुद्ध मन से सुनने की बातें हैं। इसी लिये वेदों को ऋषियों के द्वारा प्रकट होना बताया जाता है। इस प्रकरण में जिन 'महावाक्यों' का वर्णन है उनकी मृतप्राय आवाजें जनसाधारण के हृदयों में भी सुनाई तो पड़ती हैं, परन्तु वे अपने क्षुद्र अहंकार के परवश होने के कारण इनको अनसुनी कर देते हैं। सभी प्राणी अपने जी में अपने आप को बड़े से बड़ा और अच्छे से अच्छा मानते हैं। सभी को अपना आपा सर्वगुणसम्पन्न और सब से अच्छा, प्रतीत होता है। सभी अवसर पाते ही अपनी बड़ाई बघारने से चूकते नहीं हैं। परन्तु ऐसी सर्वहृदयेश्वरी महत्ता का जो गुप्त कारण है उसका किसी को भी पता नहीं है। हम तो इसी गुप्त महत्ता को ही सोया पड़ा हुआ 'अहं ब्रह्मास्मि' कहते हैं। अन्दर जो निःशब्द भाषा में 'अहं ब्रह्मास्मि' की अखण्ड रटना चल रही है, उसी से यह प्राणी अपने को सर्वोत्तम समझ रहा है। हमारे रोम रोम में
महावाक्यविवेक का संक्षेप ३१
महावाक्यविवेक का संक्षेप ३१
'अहं ब्रह्मास्मि' यह महामन्त्र समाया हुआ है। मौत ने सारे संसार को अपने जबड़े में दबा रक्खा है परन्तु उस मौत को भी निगल जानेवाला यह अन्दर का 'अहं ब्रह्मास्मि' कभी मरना जानता ही नहीं। इस अन्दर के 'अहं ब्रह्मास्मि' को इस मांस की चादर ने लपेट रक्खा है। अब तो हमें क्षुद्र देहाभिमान के रूप में इस 'अहं ब्रह्मास्मि' की निर्बल (मुरदा) आवाज़ कभी कभी सुनाई पड़ जाती है। अब इसमें ब्राह्मतेज नहीं रह गया है। अन्दर के इस 'अहं ब्रह्मास्मि' को—सोये पड़े हुए इस ओम् को— हम साधकों को धीरतापूर्वक जगाना पड़ेगा। जब यह पूरा पूरा जाग उठेगा और इस मांस की चादर को तोड़ फोड़ डालेगा, तब यह देहाभिमान को, किंवा क्षुद्र अहंकार को जलाकर राख कर देगा। देहाभिमान के जलने का बहाना पाकर यहीं 'अहं ब्रह्मास्मि' फिर ब्रह्माण्ड भर में फैल जायगा और इस अनन्त ब्रह्माण्ड पर फिर अपना एकछत्र आधिपत्य जमा लेगा। ऐसी दिव्य अवस्था जब आ जाती है तब ही 'अहं ब्रह्मास्मि' आदि महावाक्यों के बोलने का सच्चा अधिकार प्राप्त होता है। नहीं तो कोरे शाब्दिक [शास्त्रीय] ज्ञान से कुछ भी होने जाने वाला नहीं है। गुड़ कहने मात्र से किसी का मुँह मीठा नहीं हो जाता है—राम राम रटने से तोता मुनि नहीं हो जाता है। ऐसी दिव्य अवस्था जब आती है तब शान्ति का अनन्त समुद्र उमड़ पड़ता है। तब शोक भय दीनता आदि ठहर नहीं पाते हैं। जिन लोगों के पवित्र मानस में इस तरह के अपौरुषेय महावाक्य सुनाई पड़ने लगते हैं, जिनके हृदय में पूर्णता की गुंजार रहने लग जाती है, वे ही मुनि हैं, वे ही जीवन्मुक्त हैं, उनको ही विदेह मुक्ति मिल सकती है। जिसकी वाणी के पीछे अनुभव का बल नहीं
३२ पञ्चदशी होता है ऐसी निस्तेज वाणी से बोले हुए 'अहं ब्रह्मास्मि' आदि . महावाक्य उसी तरह बन्धनकारक होते हैं, जिस प्रकार अन्य अपशब्द बन्धनकारक होते हैं। क्योंकि अनुभव रहित पुरुष जब इन महावाक्यों को कहते हैं तब वे आत्मघात कर बैठते हैं क्योंकि उनमें दम्भ आदि दोष बहुतायत से उत्पन्न हो जाते हैं। मुख्य महावाक्य. चार हैं। एक 'प्रज्ञानं ब्रह्म' दूसरा 'अहं ब्रह्मास्मि' तीसरा 'तत्त्वमसि' चौथा 'अयमात्मा ब्रह्म' ब्रह्म और आत्मा की एकता रूप जो मोक्ष का साधन है-उसका ज्ञान इन ( या इन जैसे ) वाक्यों से ही हो पाता है। आत्मा सच्चिदानन्द स्वरूप है, यह ज्ञान तो युक्ति से भी हो जाता है। परन्तु 'यह आत्मा और वह ब्रह्म तत्व दोनों एक ही तत्व हैं, इस बात को जानने का उपाय शब्द प्रमाण के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। प्रज्ञानँ ब्रह्म चक्षु और श्रोत्र के द्वारा जो अन्तःकरण की वृत्ति बाहर निकलती है, उस वृत्ति से उपहित जो चैतन्य किंवा ज्ञान है, उसी से तो यह संसार रूपादि पदार्थों को देखा करता है और शब्दों को सुना करता है। नासिका के द्वारा जो अन्तःकरण की वृत्ति बाहर निकलती है अन्तःकरण की उस वृत्ति से उपहित जो चैतन्य किंवा प्रज्ञान है, उसी प्रज्ञान से तो यह संसार भले बुरे गन्धों को सूँघा करता है। वागिन्द्रिय से ढके हुए उसी चैतन्य किंवा प्रज्ञान से ये सब शब्द बोले जाते हैं। रसना के द्वारा जो अन्तःकरण की वृत्ति बाहर निकलती है, उसको जिस चैतन्य ने अपनी उपाधि बना लिया है, उसी से तो ये स्वादु या अस्वादु रस पहचाने जाते हैं। इतना ही नहीं और भी
महावाक्यविवेक का संक्षेप ३३
महावाक्यविवेक का संक्षेप ३३ इन्द्रियों तथा अन्तःकरण की वृत्तियों से जिस चैतन्य किंवा जिस प्रज्ञान की सूचना जब-तब मननशील पुरुष को मिला करती है उसी को हम 'प्रज्ञान' कह रहे हैं। ब्रह्मा इन्द्र देवता मनुष्य तथा पशु पक्षियों तक में यही ऊपर कहा हुआ प्रज्ञान व्याप्त हो रहा है। वेदादि सब इसी प्रज्ञान सूर्य की बिखरी हुई किरणें हैं। इसी के सहारे से जगत् के जन्म स्थिति और प्रलय हो रहे हैं—इस कारण कहना पड़ता है कि सर्वान्तर्यामी यह 'प्रज्ञान' ही ब्रह्मतत्व है। क्योंकि सर्वत्र व्याप्त यह 'प्रज्ञान' ही ब्रह्म है, इसी से मैं मुमुक्षु अब यह बात बेधड़क होकर कह सकता हूँ कि मुझ में जो 'प्रज्ञान' है वह भी ब्रह्मतत्व ही है। आज से मैं इस महामहिम 'प्रज्ञान' पर झूठा अहंकार ( क्षुद्र अहंकार ) करना छोड़ देता हूँ। इतना जान चुकने पर भी यदि मैं इस सर्वत्र व्याप्त 'प्रज्ञान' पर क्षुद्र अहंकार करूँगा तो मैं ब्रह्मद्रोही हो जाऊँगा। व्यापक ब्रह्म को क्षुद्र अहम् में परिच्छिन्न करने का घोर पातक मुझे लगेगा। अहं ब्रह्मास्मि यों सिद्धान्तरूप से तो सभी देहों में वह परात्मतत्व परिपूर्ण हो रहा है और सभी की बुद्धियों का साक्षी भी है। सभी प्राणी अपने को सबसे बड़ा और सब से अधिक गुणी मान कर 'अहं ब्रह्मास्मि' की रटन अज्ञानपूर्वक करते ही रहते हैं। परन्तु इतने मात्र से साधक का कुछ भी उपकार नहीं हो पाता। जब तो किसी साधक को उसके साथ ही यह स्फूर्ति [प्रतीति] भी हो जाय कि वह सर्वत्र परिपूर्ण परात्मतत्व ही मेरी बुद्धि का साक्षी है, तो वैसे स्फूर्ति- युक्त आत्मा के विषय में ही हम 'अहम्' [मैं] शब्द कह रहे हैं। जब कोई साधक अपने ऊपर पड़ी हुई अविद्या की चादर को बार बार उतार कर फेंकने लगता है, जब कोई साधक मांस के झोंपड़े
३४ पंचदशी में से निकल कर बार बार बाहर बैठने लगता है, तब उस साधक को ही हम अहम् ['मैं'] कहना चाहते हैं। देश काल या वस्तु के परिच्छेद में न आने वाली स्वभाव से ही परिपूर्ण जो वस्तु है वह 'ब्रह्म' कही जाती है। इस 'मैं' को और उस 'ब्रह्म' को परस्पर एक बता देना 'अस्मि' इस तीसरे पद का काम है। जिसका भाव यही होता है कि मैं (साधक) ब्रह्मतत्व ही हूँ अथवा मैं साधक ही तो ब्रह्म हूँ। अविद्या के प्रताप से जो मैं अपने आप को संसारी आदि मान बैठा था वह कुछ भी मैं नहीं हूँ। देहेन्द्रि- यादि की क्षुद्र और संकीर्ण दृष्टि में उलझा रह जाने वाला, देहेन्द्रियादि के साथ जल मरने वाला क्षुद्र प्राणी मैं कदापि नहीं हूँ। अथवा अविद्या के प्रताप से जो मैं ब्रह्मतत्व को अपने से पृथक्—सातवें आसमान पर रहने वाला—तत्त्व मान बैठा था वह ब्रह्मतत्व मुझ से पृथक् पदार्थ नहीं है। तत्त्वमसि जो अभी तक वृथा ही [नामालूम क्यों] शरीरों के वेष्टनों से लिपटा पड़ा था, जो शरीरों के साथ वृथा ही बार बार मर और जी रहा था, श्रवणादि का अनुष्ठान करके महावाक्य के समझने की योग्यता अब जिसमें आ गयी है, जो तीनों देहों से अलग रहने लगा है, जो तीनों देहों के साक्षी की हैसियत में आ गया है, उसी को हम लक्षणावृत्ति से 'त्वं' अर्थात् 'तू' कह रहे हैं। सृष्टि बनने से पहले सम्पूर्ण भेदों से रहित जो एक नामरूप रहित वस्तु थी, सृष्टि बन जाने के बाद अब भी जो वस्तु वैसी की वैसी ही है, जिस सद्वस्तु में अब भी कोई विकार नहीं आया है, उसी निर्विकार सद्वस्तु को हम लक्षणावृत्ति से 'तत्' अर्थात् 'वह' कह रहे हैं। इन दोनों शब्दों के लक्ष्यार्थों की जो छिपी हुई एकता है
महावाक्यविवेक का संक्षेप ३५
महावाक्यविवेक का संक्षेप ३५
उसी गुप्त एकता का ग्रहण असि [ है ] यह पद करा रहा है। परन्तु कितना ही प्रयत्न करो इस लक्ष्यार्थ तक तो केवल अधिकारी लोगों की ही उदार दृष्टि पहुँचेगी । दूसरे अनधिकारी लोग तो इस महावार्ता को हँसी में ही टाल देंगे और परम पद के साथ खिल- वाड़ कर बैठेंगे । मुमुक्षु लोगों को चाहिये कि 'तत्' 'त्वं' पदों की जो एकता प्रमाणपुष्ट हो चुकी है, उसका दिव्यानुभव वे भी ले लें, और वैसा अनुभव करके अनादिकाल की इस वृथा खटपट को भूल जांय । वे अनुभव करें कि क्या हम अनादि काल से इसी भवजाल में उलझे रहने को यहां उतरे हैं ? क्या इस संसार की वेमतलब उखाड़ पछाड़ ही हमारे इस जीवन का चरमलक्ष्य है ? या हमारा अपना कोई स्थायी रूप भी है ? जिसके कि आधार से हमको शान्ति के सुखद दर्शन मिल सकते हैं। इसी गम्भीर प्रश्न का उत्तर तत्त्वमसि [ तुम तो वह हो, तुम्हें तो इस खटपट की कुछ भी आवश्यकता नहीं है ] यह महावाक्य दे रहा है । अयमात्मा ब्रह्म जो तत्व स्वयंप्रकाश होने के कारण ही यद्यपि सबको प्रत्यक्ष हो रहा है परन्तु हुआ करो, फिर भी मायामोहित प्राणी ने इस स्वयंप्रकाशतत्व की भी ऐसी उपेक्षा की है जैसी कदाचित् शत्रुओं की भी कोई न करता हो। कोटिजन्मों के पुण्यों के परिपाक से जब किसी साधक की सूक्ष्म दृष्टि उस तत्व तक जा पहुँचे तब सूक्ष्म दृष्टि से पकड़ लिये हुए उसी तत्व को हम अयम् [यह] कह रहे हैं-अर्थात् यह तत्व कभी किसी से छिपता नहीं है और यह कभी किसी का दृश्य नहीं होता है। अहंकार,प्राण,मन इन्द्रिय तथा देह का जो समूह है, उस सभी का अधिष्ठान, सभी क
३६ पंचदशी साक्षी, सभी से प्रत्यक्, सभी से आन्तर, जो कोई तत्व है उसी को हम 'आत्मा' कहते हैं। यह जो आकाशादि संसार हमें दीख रहा है यह सब क्षणभंगुर है। यह क्षणभंगुर संसार अपने स्वभाव के अनुसार जब शेष नहीं रह जायगा, तब जो तत्व शेष बचेगा उस तत्व को ही हम 'ब्रह्म' कहते हैं। वह ब्रह्मतत्व साधक की समझ में आया हुआ, यह ऊपर कहा हुआ,खयंप्रकाश आत्मा ही तो है। इस आत्मा से भिन्न कोई ब्रह्मनाम का पदार्थ होता होगा यह विचार प्रमाणानुमोदित नहीं है। इस आत्मा से भिन्न किसी को ब्रह्म समझना भारी से भारी भूल है।
6. Chitradipa
[६] चित्रदीप का संक्षेप तसवीर वाले कपड़े की जैसे चार अवस्थायें हैं—धुला हुआ, मांडी लगाया हुआ, चिह्न किया हुआ और रंगभरा हुआ, इसी प्रकार परमात्मा में भी चार अवस्थायें हैं ( १ ) चेतन ( २ ) अन्तयोमी ( ३ ) सूत्रात्मा ( ४ ) तथा विराट् । खयं तो वह चेतन है, माया का ध्यान करें तो वह 'अन्तर्यामी' है, सूक्ष्म सृष्टि को देखें तो वह 'सूत्रात्मा' कहाता है, स्थूल सृष्टि पर दृष्टि डालें तो उसे विराट् कहना होगा । जो देव मनुष्य पशु आदि के शरीर चैतन्य में अध्यस्त हैं, उनमें जीव नाम के जो चिदा- भास पड़े हैं ये ही तो संसार में भ्रमण कर रहे हैं । चेतनतत्व व्यापक है, पर है, अखण्ड है, वह तो संसार भ्रमण कर ही नहीं सकता । जीव के संसार को ही जो कि चेतन का संसार समझते हैं वे सब भूलते हैं । चिदाभास के विषय में ज्ञातव्य बात यह है कि—देहों में ही चिदाभास पड़ता है, मिट्टी पत्थर आदि में चिदा- भास नहीं पड़ता । जीवभाव अविद्या के कारण उत्पन्न होता है । दीखनेवाला संसार 'परमार्थ है, सब अपने आपे में लगे हैं, ऐसा सम- झना ही 'अविद्या' है—यही बेसमझी है। यह संसार जीव का है 'आत्मतत्व का संसार हो ही नहीं रहा, ऐसा ज्ञान 'विद्या' कहाती है। यह विद्या विचार करते रहने से हाथ आजाती है । उसको पाने के लिए जगत्, जीव और परात्मा का विचार सदा ही करना चाहिये । जीवभाव और जगत् भाव जब हट जायगा, तब आत्मा ही आत्मा
३८ पञ्चदशी
शेष रह जायगा—तब कैवल्य आ धमकेगा। आत्मतत्व केवल रूप में ज्योंही आ विराजेगा त्यों ही विचार स्वयं छूट जायगा। आत्मतत्व को केवल रूप में लाने के लिये विचार की सहायता की ज़रूरत पड़ती है, उसके लिये आत्मतत्व पर थोड़ा सा विचार करलें। 'कूटस्थ' और 'जीव' तथा 'ब्रह्म' और 'ईश्वर' यों चार तरह का चेतन,चेतनतत्व को समझने के लिये कल्पित कर लिया है। दोनों देहों के अन्दर जो चेतना रहती है, उसमें तो कभी भी कोई विकार नहीं आता। उतनी चेतना 'कूटस्थ' चेतना कहाती है। उस कूटस्थ चेतना में पहले बुद्धि की कल्पना हुई, फिर उसमें चेतना का प्रतिबिम्ब पड़ा; फिर उसमें प्राणशक्ति उत्पन्न हुई, बस यही जीव है। यही संसार में फंसने वाली चीज़ है। इसने अन्दर के कूटस्थ चेतन को पूरा पूरा ढक डाला है। अब तो यह इस तत्व को पृथक् रूप में कभी भी नहीं जानता। इसका यह न जानना, अनादि काल से है। यही 'मूलाज्ञान' कहाता है। यह अज्ञान दो रूप में काम करता है—एक तो यह स्वरूप को ढकता है, दूसरे यह स्वरूप को किसी विकृतरूप में (शरीर आदि के रूप में) दिखाता है। यही 'आवरण' और 'विक्षेप है'। आवरण से अपने रूप की प्रतीति रुक जाती है-- अपना आपा दूसरे पदार्थों में रिलमिल जाता है। ये दोनों ही बातें तत्वज्ञान होते ही नष्ट हो जाती हैं। परन्तु विक्षेप के नष्ट होने में, तत्वज्ञान के बाद भी कुछ समय लगता है। क्योंकि विक्षेप की उत्पत्ति कर्मों से और अज्ञान से, दो से मिल कर होती है। कर्मों का प्रभाव जितने दिनों तक रहना चाहिये, उतने दिन रहकर ही विक्षेप नष्ट होता है। यही कारण है कि ज्ञान हो जाने पर भी ज्ञानी का प्रारब्ध कर्म नष्ट नहीं होता। आत्मा के
चित्रदीप का संक्षेप ३९ विषय में लोगों को बहुत से भ्रम हैं कोई इसको कुछ मानता है और कोई कुछ। इसके परिमाण के और स्वरूप के विषय में भी बहुत से विवाद हैं। सारे विचारों में जो सार है वह तो यही है कि मायी महेश्वर है और माया उसका एक औज़ार है। उस माया का जो अधिपति है उसके [कल्पित] अवयवों ने इस सब जगत् को व्याप्त कर रक्खा है। उसकी इस माया पर यदि कुछ विचार न करें तो यह सच्ची मालूम होती है, विचार करें तो वह अनिर्व- चनीय सिद्ध होती है, श्रुति का कहना मानें तो यह तुच्छ है। यह माया शक्ति चेतन के बिना प्रतीत नहीं होती, इससे यह स्वतन्त्र नहीं है, तथा असंग को ससंग बना देने के कारण यह स्वतन्त्र भी है। जब तक माया को समझ लिया नहीं जाता, तब तक आश्चर्य मालूम होता है। जब यह समझ में आ जाती है तब माया समझ लेने से ही आश्चर्य नहीं रहता। निद्रानाम की जो जीव की माया है, उसमें जैसे कोई कानून लागू नहीं हो सकता—वह जैसी दीखे वैसी ही ठीक है। इसी प्रकार यह माया जैसी उल्टी-सीधी दीखे वैसी ही ठीक है। इसको तर्क की कसौटी पर कसने से इसके स्वरूप को समझने में चूक हो जायगी। श्रद्धा के मार्ग से चलते-चलते जो बात ज्ञान के यौवन में दीखने वाली थी उन्मार्ग में पड़ जाने से उससे वंचित रह जाना पड़ेगा। सम्पूर्ण आक्षेप जगत् को सत्य मानने वालों पर ही लागू हो सकते हैं। नींद की तरह माया पर कोई आक्षेप चल नहीं सकता। माया पर आक्षेप न करके उसको तो हटाने के उपाय सोचने में ही आत्मकल्याण है। जिसका निरूपण न हो और दीखे भी 'लौकिक माया' का यह लक्षण इस 'ऐश्वरी माया' में भी है। जिस कारण में अचिन्त्यरचना की शक्ति है, उस माया
४० पंचदशी नाम के बीज का अनुभव सुषुप्ति में सभी को होता है। बीज में पेड़ की तरह सारा जगत् उस सुषुप्ति में लीन रहता है। उस माया में सारे जगत् की वासनायें रहती हैं। उन वासनाओं में जो चैतन्य है वह स्पष्ट नहीं होता। इसी से अपनी वासनाओं का पता किसी को नहीं होता कि वे कैसी कैसी हैं। चेतन के आभास से युक्त वह माया ( अज्ञान ) जब बुद्धिरूप में प्रकट होती है तब उसमें का वह चिदाभास स्पष्ट मालूम होने लगता है। जब वासनाओं की बुद्धिवृत्तियें बन जाती हैं तब मालूम होता है कि ऐसी वासना भी इसमें थी। माया के अधीन जो चिदा- भास है वही तो वेदों का 'महेश्वर' है, वही 'अन्तर्यामी' है, वही 'सर्वज्ञ' है, वही 'जगत् का कारण' भी कहाता है। यह जिस मानस या बाह्य जगत् को बना लेता है, उसे बदल देने का सामर्थ्य किसी में नहीं है, यही तो इस की सर्वेश्वरता है। इसी कारण से जिस पर जो धुन सवार हो जाती है वह किसी के समझाने से हटती नहीं है। इस सुषुप्ति के अज्ञान में ही सम्पूर्ण प्राणियों की बुद्धियों की वे सब वासनायें रहती हैं जिन्होंने इस सब जगत् को घेर रक्खा है। सारा जगत् इन्हीं सूक्ष्म वासनाओं के अधीन होकर अपने अपने कार्यों में संलग्न हो रहा है। इसी से उसे 'सर्वज्ञ' कहा है। इसकी सर्वज्ञता का ज्ञान हमें क्यों नहीं होता, इसका कारण तो यह है कि वासनाओं का प्रत्यक्ष ज्ञान हमें किसी को भी नहीं होता है। जो जो विषय सामने आते जाते हैं उन-उन विषयों की वासनायें प्रकट होती जाती हैं। यों एक काल में न सही किन्तु कालान्तर में सर्वविषयानुभावी होने से उसकी सर्वज्ञता सिद्ध होती है। यों एक समय में उसकी सर्वज्ञता की प्रतीति न होने से उसके सर्वज्ञपन का प्रत्यक्ष नहीं होता। उसको
जैसे उपादान रूप से पट में रहता है, इसी तरह सब-का उपा-
चित्रदीप का संक्षेप ४१
तो अनुमान से जानना पड़ता है। विज्ञानमय आदि कोशों में तथा अन्यत्र भी अन्दर रहकर यह तत्व उन उन का नियमन करता रहता है इसी से उसे 'अन्तर्यामी' कहा जाता है। धागा जैसे उपादान रूप से पट में रहता है, इसी तरह सब-का उपा- दान होने से यह तत्व सर्वत्र ही रहता है। धागा जब हिले तब पट अवश्य हिलता है, इसी प्रकार यह अन्तर्यामी तत्व जिस पदार्थ की वासना से प्रभावित हो जाता है, वह वह कार्य अवश्य ही होकर रहता है। इस अन्तर्यामी में यदि घट की वासना जाग उठे तो घट अवश्य बनता है। इसी भाव से गीता में हृदय में बैठ कर सब यन्त्रारूढ भूतों को घुमाने की बात कही है। वही ईश्वर तत्व पुरुषार्थ का रूप धरकर भी आता है, इसका कारण पुरुषार्थ भी व्यर्थ नहीं होता है। अन्तर्यामी की यह प्रेरणा ध्यान में भले प्रकार आ जाय तो आत्मतत्व का असंगपना भी समझ में आ ही जायगा। इसकी असंगता के ज्ञान से मुक्ति के मिलने की बात जहां-तहां शास्त्रों में कही ही है। यही ईश्वर प्राणियों के कर्मों की अपेक्षा करके कभी तो जगत् को उत्पन्न कर देता है और कभी उसे अपने अन्दर छिपा लेता है। जगत् के पदार्थों के सृष्टि और प्रलय तो ठीक ऐसे हैं जैसे हमारे दिन रात, हमारे जागरण और स्वप्न या हमारे उन्मेष और निमेष या हमारे मौन और मनोराज्य हों। यह ईश्वर और वह ब्रह्मतत्व एक नहीं है। परन्तु सर्वसाधारण को इस भेद का पता नहीं है। वे इन दोनों को एक ही समझते हैं। शास्त्रों का तात्पर्य तो यही है कि ब्रह्मतत्व असंग है। जगत् का सर्जन करनेवाला महेश्वर तो मायावी है। अब दूसरा जो 'सूत्रात्मा' है उसके विषय में भी सुनिये—
जैसे अस्पष्ट दीखता है वैसा ही अस्पष्ट संसार इस 'सूत्रात्मा'
४२ पंचदशी
वह सब सूक्ष्म देहों में अहंभाव रखता है। 'इच्छा' 'ज्ञान' तथा 'क्रिया' नाम की शक्तियें इसमें रहती हैं। मन्द अंधेरे में जगत् जैसे अस्पष्ट दीखता है वैसा ही अस्पष्ट संसार इस 'सूत्रात्मा' में दीखता है। अंकुर फूटने वाले पौधे की जो अवस्था होती है वही अवस्था इस 'सूत्रात्मा' (हिरण्यगर्भ) की है। 'विराट्' नाम की जो तीसरी अवस्था है वह तो धूप में चमकते हुए संसार की-सी है। संसार के बड़े से बड़े और छोटे से छोटे जो भी जड या चेतन पदार्थ हैं वे सब के सब छोटे या बड़े ईश्वर तत्व ही तो हैं। जमी तो लोक में जब कोई किसी की विपत्ति को टाल देता है तब कहते हैं कि तुम तो मेरे ईश्वर होकर आये हो। अस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्। यह सारा संसार इन छोटे बड़े ईश्वरों की पूजा ही तो कर रहा है तथा इन ईश्वरों में जितनी शक्ति है, यह उनसे उतना ही छोटा या बड़ा फल भी पा रहा है। यह सब कुछ है परन्तु ईश्वरों की पूजा से मुक्ति नाम का महाफल तो कभी भी मिलने वाला नहीं 'है। मुक्ति तो ब्रह्मतत्व को जान लेने से ही मिलेगी। जैसे अपने जागे बिना अपना स्वप्न नहीं टूटता इसी प्रकार आत्मज्ञान के बिना यह भवबन्धन कटेगा नहीं। अद्वितीय ब्रह्मतत्व में यह सब जगत् एक महास्वप्न है। इस सुपने में कोई 'ईश्वर' है कोई 'जीव' है कोई 'चेतन' है और कोई 'जड' है। 'आनन्द ॰ मय' ईश्वर है तथा 'विज्ञानमय' जीव है। ईश्वरतत्व अस्पष्ट होता है जीवतत्व स्पष्ट होता है। ये दोनों ही माया के बनाये हुए हैं इनसे अगले संसार को इन दोनों ने ही बनाया है। माया के खिलौने जो 'जीव' और 'ईश्वर' हैं उनके विषय में तो विवाद बहुत होते रहते हैं, परन्तु असंग रहने वाला जो अद्वितीय ब्रह्म
चित्रदीप का संक्षेप ४३
तत्व है उसको लोग जानते ही नहीं हैं। इस अद्वितीय ब्रह्मतत्व को बिना जाने मुक्ति या लौकिक सुख कुछ भी पूरा पूरा प्राप्त नहीं हो सकता। इस लिये मुमुक्षु सदा ही ब्रह्मतत्व का विचार किया करें। यह ब्रह्मतत्व जैसा सृष्टि से पहले था, जैसा इस सृष्टि के नष्ट हो जाने पर रहेगा, वैसा ही अब भी है और मुक्ति में भी यह ऐसा ही रहेगा। यह जितना भी कुछ निरोध, उत्पत्ति, बद्धता साधकभाव आदि बखेड़ा हो रहा है यह सब इस ब्रह्म- समुद्र की केवल ऊपर की सतह पर ही हो रहा है। इसके एकान्त अन्तरतम तक इस किसी भी खटपट की कोई सूचना नहीं पहुँच पाती है। यह तत्व तो शिवलिंग की भाँति शान्त भाव से कभी भी न टूटने वाली मौनमुद्रा में बैठा हुआ है। परन्तु माया ने लोगों को वृथा ही भरमा रक्खा है। वे समझते हैं कि अद्वैत नाम की वस्तु न तो है ही और न वह प्रतीत ही होती है। ज्ञानी का निश्चय इसके विपरीत होता है। एक तो अपने निश्चय से बद्ध है दूसरा अपने ही निश्चय से मुक्त हो जाता है। बद्ध प्राणी रेशम के कीड़े की तरह अपने आपही बंधा पड़ा है। गधे और खच्चर वालों के पास जब उनको बांधने की बेड़ नहीं होती, तब वे उनके पैरों को बांध देने का नाटक करके उनके पैरों को चारों तरफ़ से स्पर्श कर देते हैं। हैं। गधे और खच्चर समझते हैं कि हम बांध दिये गये हैं। वे रात भर अपने उस संकल्प से बंधे खड़े रहते हैं। इसी तरह यह प्राणी अपने ही संकल्पों से अनादि काल से वृथा ही बंधा पड़ा है। जैसे लकड़ी में छेद कर देने वाले भौंरे से कमल का कोमल फूल तक नहीं कटता, इसी प्रकार प्राणी का यह अपने ही संकल्प का बन्धन बड़ा ही दुर्भेद्य हो गया है। यह अब
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इससे टूटता नहीं है। इस संकल्प को धारण किये हुए इसे अनन्त सृष्टियाँ बीत चुकी हैं। इसकी बद्धपन की कल्पना दृढ- मूल हो गयी है। यह समझने लगा है कि मैं तो बद्धप्राणी हूँ। मुझे जन्म-मरण स्वभाव से मिलना ही है, कर्मों का फल मुझे भोगना ही है, मेरा गर्भवास टलना नहीं है, जन्ममरण के चक्र से मेरा छुटकारा कभी भी नहीं होना है, बस इसी तरह के विचार ही तो बन्धन कहाते हैं। बद्धता की प्रतीति के सिवाय और तो कुछ बन्धन है ही नहीं। रेशम का कीड़ा जैसे अपने आपको बांधकर मौत को नौता दे लेता है—अपने हाथ से अपनी क़बर तय्यार कर लेता है, इसी प्रकार अपने को बद्ध मानकर—स्वयं स्वीकृतअपराधी (इक़रारी मुजरिम) होकर अपने आप अपनी मरज़ी से बद्ध हुआ फिरता है और जन्म-जरा-मरण आदि की चौपाल बन रहा है। अद्वैत तत्व का प्रत्यक्ष जब तक नहीं होता, तब तक बद्धपन नष्ट नहीं होता। अद्वैत के प्रत्यक्षपन की बात समझ न पड़ती हो तो यों समझो कि ज्ञानरूप से वह अद्वैत तत्व सभी को प्रत्यक्ष है। द्युलोक, पृथ्वीलोक तथा पाताल लोक सभी को इस ज्ञान ने अपने पेट में रख छोड़ा है। कोई भी देश और काल ऐसा नहीं है जो ज्ञानसमुद्र में डूबा न पड़ा हो। यों स्थालीपुलाक न्याय से थोड़े अद्वैत को समझ कर परिपूर्ण अद्वैत को समझ लेना चाहिये। कार्य और कारण के एक होने की युक्ति से तथा तंजलान् (उसी से उत्पन्न उसी में जीवन तथा उसी में प्रलय) इस न्याय से अद्वैत तत्व का विचार करते रहना चाहिए और मायामय द्वैत जब जब आये तब तब विचार से उसे हटाते रहना चाहिये। जैसे फल पक कर डण्ठल को छोड़ देता है इसी प्रकार साक्षात्कार में जब पूर्णता आती है तब यह विचार
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स्वयमेव छूट जाता है । इस तत्व का ज्ञान होने पर भी यदि भूख प्यास से इस तत्व को चोट लगती हो, यह तत्व, भाग जाने को या ओझल हो जाने को तय्यार होता हो, तो भूख प्यास जिस अहंकार को लगी है उसी में रहने दो । दूसरे के धर्मों को अपने में मत लादो । ये भूख प्यास तादात्म्य कर लेने से ही आत्मा को लगती है। उस अध्यास को हटाकर विवेक की आवृत्तियें सदा करनी चाहिये । क्योंकि अध्यास रूपी शत्रु के हमलों को विवेक की ढाल से ही रोका जा सकता है । चिदात्मा को अलग रक्खा जाय और अहंकार को पृथक् जाना जाय तो अब आप आजाद होकर करोड़ों पदार्थों की इच्छा कीजिये, ग्रन्थि भेद हो चुकने से अब आपको बाधा नहीं होगी । ग्रन्थि भेद हो चुकने पर भी प्रारब्ध के दोष से इच्छायें हो ही सकती हैं । इच्छाओं से घबराने की ज़रूरत नहीं है । देह में व्याधि हों, वृक्ष आदि पैदा हो या सूखे, अहंकार में इच्छा हो तो इससे चेतन आत्मा का क्या बिगाड़ होता है ? आत्म तत्व का बिगाड़ वैसे तो ग्रन्थिभेद से पहले कुछ भी नहीं होता था यह बात अगर समझ में आती है तो इसी को 'ग्रन्थि-भेद' होना कहते हैं । परन्तु अज्ञानी पुरुष इस बात को समझते नहीं हैं, यही तो एक 'ग्रन्थि' है । अज्ञानी और ज्ञानी में इस 'ग्रन्थि' के होने और न होने का ही भेद है । वैसे देखने में-व्यवहार में-तो दोनों एक ही से होते हैं । ग्रन्थि के टूटने की पहचान गीता में यों कही है कि आये हुए दुःखों से द्वेष नहीं करता तथा जाने वाले सुखों से 'और ठहरो' नहीं कहता । किन्तु उदासीन की तरह से काम करता है । अर्थात् अंदर से त्याग और बाहर से संग रख कर काम में लगा रहता है। जो लोग काम करना छोड़ देने को ही
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ज्ञान का फल मानते हैं वे चूक करते हैं। उनकी समझ में आया हुआ ज्ञान तो शरीर आदि को निकम्मा कर देने वाला एक प्रकार का रोग ही है। छोड़ने की चीज़ तो संग है। व्यवहार छोड़ने की चीज़ ही नहीं है। जिसे सुख की इच्छा हो वह संग का परित्याग करे। व्यवहार से किसी का भी कुछ नहीं बिगड़ता। किन्तु संग से बिगाड़ होता है। लोक में भी किसी से मनुष्य- हत्या का व्यवहार हो जाय और उसमें उसकी सक्ति न हो तो वह उस पाप का अपराधी नहीं होता। व्यवहार के बन्द होने का कारण ज्ञान नहीं है। व्यवहार के चलने और बन्द होने की बात को समझने के लिये 'वैराग्य' 'ज्ञान' तथा 'उपरम' को भले प्रकार समझ लेना चाहिये। भोगों में दोषदर्शन से वैराग्य उत्पन्न होता है, भोगों को त्याग देने की इच्छा, वैराग्य का स्वरूप है, भोगों में दीनभाव न रहना वैराग्य का कार्य है। श्रवण, मनन और निदिध्यासन करने से तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है, सत्य और असत्य की पहचान हो जाना तत्वज्ञान का स्वरूप है, ग्रन्थि का फिर न लगना तत्वज्ञान का कार्य है। यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) नियम (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरभक्ति) आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि करते रहने से उपरम पैदा होता है, बुद्धि का रुक कर खड़ा हो जाना उपरम का स्वरूप है, व्यवहार का घट जाना या बन्द हो जाना यह उपरम का कार्य है, तत्वज्ञान होते ही जो लोग जल्दबाजी में आकर बाह्य व्यवहार को बन्द कर देने पर तुल जाते हैं, उनके मनो-व्यापार तो चलते ही हैं। यों ज़बर- दस्ती व्यवहार को त्यागनेवाले की अन्दर अन्दर अवनति होती ही जाती है। उसकी अतृप्त वासनायें कभी भी जाग कर उपद्रव
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खड़ा कर देती हैं। होना यह चाहिये कि तत्वज्ञान होने पर जब हमारा मानस-संसार (या जीव का द्वैत) मर जाय या मार दिया जाय तब हम ईश्वर के संसार को (ईश्वर के द्वैत को) ध्यान में रखकर व्यवहार करने लगें। अर्थात् अब तक जो कर्म हमारे संसार में आसक्ति-पूर्वक हो रहे थे, वे अब ईश्वर के संसार में अनासक्तिपूर्वक होने लगें। यमादि का अभ्यास करने से हमारा मानस जगत् छिपने लगेगा तथा ईश्वर का संसार हमारी आंखों के सामने आ जायगा। यों दैवी सम्पत्ति का विकास होगा और वह भी धीरे-धीरे हमको पूर्ण-तत्व में जाकर जब छोड़ देगा, तब अपने आप स्वाभाविक रीति से व्यवहार क्षीण होगा। उपरति के अभ्यास से ही सच्चा व्यवहार क्षय होगा। यदि व्यवहार क्षय करने में आसक्ति होगी तो वह भी तो व्यवहार की तरह ही बन्धक होगी। व्यवहार का क्षय तो उपरम से होता है ज्ञान से व्यवहार का क्षय कदापि नहीं होता। वैराग्य और उपरम पूर्ण हों बोध रुका हो तो मोक्ष मिलने वाला नहीं है। बोध में पूर्णता हो फिर चाहे वैराग्य और उपरम पूर्ण न भी हो (अधूरे हों) तो भी मोक्ष अवश्य मिलेगा, परन्तु जीवन्मुक्ति का देवदुर्लभ आनन्द नसीव नहीं होगा। ब्रह्म-लोक तक को तृण-तुल्य समझना वैराग्य की अन्तिम सीमा है। देहात्मा की तरह पर तत्व को आत्मा समझ लिया जाय यह बोध की अन्तिम दशा है। सुप्ति की तरह संसार को जागरण में भी भूल जाना उपरम की सीमा है। हमारे आत्म-चैतन्य में जो यह जगत् रूपी चित्र माया ने बना दिया है ज्ञान की महिमा से इसकी ओर न देखकर जब हम अपने आत्म-चैतन्य को शेष रख लेंगे तब जगच्चित्र को देखकर भी मोह नहीं होगा।
7. Triptidipa
:[७] तृप्तिदीप का संक्षेप पुरुष यदि अपने आपे को पहचान जाय कि यह तत्व मैं हूँ ( मेरा स्वरूप यह है ) तो फिर न तो इच्छा करने की कोई वस्तु ही रह जाती है और न कोई इच्छा करने वाला तत्व ही शेष रहता है। यों आत्मज्ञानी को शरीर के सुखदुःखों के साथ साथ सुखी या दुःखी होना नहीं पड़ता। इसी बात का विस्तार पूर्वक वर्णन इस 'तृप्तिदीप' नामक प्रकरण में जीवन्मुक्त महाशयों में रहने वाली तृप्ति को बताने के लिये किया है। इसे समझने के लिये जीव को दो भागों पर विचार कीजिये— एक इसका भ्रम भाग है दूसरा इसका अधिष्ठान भाग है। जब भ्रम भाग की प्रधानता होती है और अधिष्ठान भाग दबा सा रहता है तब तो यह 'जीव' अपने को 'संसारी' माना करता है। जब तो भ्रम भाग को मिथ्या समझ कर उसका अनादर कर दिया जाता है—जब भ्रम को भुला दिया जाता है और अधिष्ठान भाग ही प्रधान बन जाता है तब यही जीव 'मैं तो चिदात्मा हूँ मैं तो असंग हूँ' ऐसा जानने लग पड़ता है। कल्पित सर्प का वहां से नष्ट हो जाना जैसे सत्य नहीं होता है,इसी प्रकार जीवों को होने वाला 'मैं असंग हूँ' इत्यादि ज्ञान भी सत्य तो नहीं होता है परन्तु जैसे कांटों से कांटों को निकाल देते हैं इसी प्रकार इन असत्य ज्ञानों से भी असत्य संसार का नाश तो हो ही जाता है।